सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई को एससी, एसटी एक्ट के बचाव में उतरने के लिए बाध्य होना पड़ा है। गवई ने कहा कि इस एक्ट का दुरुपयोग का उदाहरण बिरले हैं। पर सच्चाई गंवई की सोच से अलग है, बड़े पैमाने पर और बड़े दायरे में लोमहर्षक दुरुपयोग की घटनाएं जारी है। सच तो यह है कि अराजक, हथकंडा, बदले की भावना से ग्रसित, निजी दुश्मनी से संहारकध् विनाशकारी त्रासदी को उपस्थित करने वाले एससीध्एस टी कानून अब चिंता का कारण ही नहीं बल्कि, सामाजिक एकता को तार तार करने, घृणा फैलाने, तकरार की हिंसक परिस्थितियां उत्पन्न करने के साथ ही साथ अवैध वसूली का माध्यम बन गया है। राजीव गांधी ने जब इस कानून को बनाया था तब से लेकर आज तक इस कानून को लेकर बहस जारी है, समर्थन और विरोध जारी है। खासकर सामाजिक चिंतको और कानूनविदों ने भी इस कानून में व्यापक सुधार की आवश्यकता बताई है और कड़े कुछ प्रावधानों को हटाने की अनिवार्यता जताई है। राजनीतिक स्तर पर भी आवाज उठ रही है, लेकिन दलित, आदिवासी वोट बैंक के कारण राजनीति अपने आप को स्वाहा नहीं करना चाहती है। पर जनाक्रोश को कब तक दबाया जा सकता है? आज न कल राजनीति को इस पर खुलकर बोलना ही पड़ेगा, कुछ मानक तय करने ही होंगे। आखिर क्यों ? क्योंकि इस एक्ट ने न सिर्फ राजनीति को ग्रसित किया है बल्कि ग्रामीण समाज के तानें बाणे का भी संहार किया। शिक्षा जगत और नौकरशाही समूह पर भी इसने अपना चाबुक चलाया है। न्यायपालिका को भी लपेटे में ले लिया है, जजो को एससी , एसीटी एक्ट में जेल भेजवाने की धमकियां भी मिली है। मीडिया भी चपेट मे है।कहने का सीधा अर्थ है कि यह एक्ट न केवल विचित्र है बल्कि दुनिया में अकेला कानून है, जो बिना जांच के सीधे जेल भेजने का प्रावधान है। अमेरिका में भी वंचित और भेदभाव के शिकार आदिवासी जिसे रेड इंडियन कहा जाता है के लिए इतना बड़ा कानून नहीं है, जबकि अमरीका में रेड इंडियनों के अस्तित्व पर अंतिम कील ठोकने का प्रयास कोलंबस के समय से लेकर आज तक जारी है।
इस दलितध् आदिवासी एक्ट का अमानवीय दुरुपयोग देखिये और जानिये की इस एक्ट को हथकंडा बनाकर बदले की भावना से प्रेरित करतूत, धन की उगाही, जमीन जायदाद पर कब्जा, प्रशासनिक भ्रष्टाचार को संरक्षण, कार्य स्थलों पर मनमानी और शिक्षा जगत में धांधली करने जैसे अस्वीकार और लोमहर्षक अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है। इतना ही नहीं बल्कि दलित और आदिवासी इस एक्ट के प्रावधानों के अनुसार निर्धारित सरकारी सहायता राशि हड़पी जा रही है। शुरुआत विष्णु तिवारी से करते हैं। विष्णु तिवारी का उदाहरण न केवल अमानवीय है बल्कि विषैला है, घिनोना है, लोमहर्षक है, कल्पना से भी परे है और न्याय प्रणाली पर कलंक है। विष्णु तिवारी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और गरीब रहे हैं, उनका जमीन विवाद था, उनकी जमीन कुछ लोग हड़पना चाहते थे, जिसका वे डटकर विरोध कर रहे थे। उनके खिलाफ साजिश होती है और इसी एक्ट को हथकंडा , मोहरा बना दिया जाता है। एक दलित महिला ने थाने में झुठा बालात्कार का मुकदमा दर्ज करा देती है। उस पर पुलिस एससी और एसटी कानून लगा देती है। विष्णु तिवारी थानेदार को कहते रहे कि वे निर्दोष है, उनकी जमीन हड़पने की यह साजिश रची गई है, इसमें गाँव के दबंगों का हाथ है, थानेदार रिश्वत की मांग करता है, गरीब विष्णु तिवारी रिश्वत देने में असमर्थ होते हैं। पुलिस ने रिश्वत नहीं मिलने पर जमकर गुस्सा उतारती है, मुकदमा को कठोर बना देती है, मनगढ़ंत कहानियां जोड़ देती हैं, मनगढंत सबूत गढ़ देती है। दुष्परिणाम यह होता है कि विष्णु तिवारी जेल चले जाते हैं। मुकदमे में विष्णु तिवारी के खेत बारी बिक जाती है, माता पिता बेटे की जेल पीड़ा के शिकार बन जाते हैं और इस दुनिया को छोड़ कर चले जाते हैं। दो भाइयों की भी इसी गम में मृत्यु हो जाती है। लोअर कोर्ट से सजा हो जाती है। लोअर कोर्ट की सजा के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील होती है, जुगाड़ और पैसे नहीं होने के कारण अपील की सुनवाई वर्षों लंबित होती है। आखिरकार इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई होती है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि यह मुकदमा फर्जी है, झूठ है, इसमें शाजिस है। विष्णु तिवारी जेल से रिहा तो हो जाते हैं पर अपने गांव जाते हैं तो उन्हें कुछ भी नहीं मिलता, जमीन घर बिक चुके थे, माता पिता गुजर चुके थे। कोई एक दो साल नहीं बल्कि पूरे बीस साल विष्णु तिवारी ने जेल की सजा काटी थी? बीस साल बहुत बड़ा होता है। क्या सरकार और कोर्ट विष्णु तिवारी की पीड़ा , उसके माता पिता , भाइयों की मृत्यु और उसकी खेतबारी के दंश की भरपाई कर सकती हैं, कदापि नहीं।
अभी अभी आईआईटी का दलित प्रकरण देश को झकझोंर कर रख दिया है, इस प्रकरण की लोमहर्षक चर्चा भी हुई है। प्रोफेसर सूर्यनारायण ने एक दलित छात्र को आई फोन से नकल करते हुए पकड़ा। नकल करते हुए पकड़े जाने पर परीक्षा से बर्खास्ती आम प्रक्रिया है। दलित छात्र अवसाद ग्रसित हो जाता है। उसने अवसाद में आत्महत्या कर लेता है। हंगामा खड़ा होता है और प्रोफेसर सूर्यनारायण पर दलित एक्ट लग जाता है, उन्हें छुट्टी पर भेज दिया जाता है। जबकि सूर्यनारायण खुद पिछड़े वर्ग से आते हैं और उनकी योग्यता सर्वश्रेष्ठ है। झारखंड के एक सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता श्याम चैधरी ने एक सरकारी हॉस्पिटल के डॉक्टर से गरीबी को महंगी दवा लिखने पर प्रश्न किया तो फिर उसने दलित एक्ट का मुकदमा दर्ज करा दिया, श्याम चैधरी को जेल जाना पड़ा है। मीडियाकर्मी अजित भारती भी मुकदमा झेल रहे हैं। अब तो न्यायपालिका भी इसकी चपेट में आ रही है। राजस्थान के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति को कोर्ट में सरेशाम धमकी दी गई कि मेरे पक्ष में फैसला दो , नहीं तो दलित एक्ट में जेल भेजवा दूंगा। पुलिस कोर्ट में आती है और उस दलित युवक को जेल भेजती है। ज्योति न्यायिक मजिस्ट्रेट थी, इसलिए बच गई, अगर वह आम आदमी होती तो फिर जेल जाना निश्चित था। मै एक ऐसे गांव के चैकीदार को जानता हूं जो कई लोगों के खिलाफ दलित एक्ट का मुकदमा कर लाखों रूपये की सरकारी सहायता राशि लूटी है।ये कुछ चुनिंदा उदहारण है, देश में ऐसे हजारों उदाहरण हैं।
नए प्रावधानों के अनुसार इस एक्ट के तहत लगभग दस लाख तक की सरकारी सहायता राशि मिलती है। यह सरकारी सहायता राशि कम नहीं बल्कि बहुत ज्यादा है। कोई मेहनत नहीं, कोई पसीना बहना नहीं। सिर्फ थाने जाइए और किसी पर झूठ मुकदमा दर्ज करा दीजिए और इतनी बड़ी सहायता राशि लेने के लिए अधिकारी बन जाइए। इसी लालच में एससी, एसटी कानून का खतरनाक और लोमहर्षक दुरुपयोग हो रहा है।
खास कर इस एक्ट का गांवों में आतंक है, सिर्फ अगड़ी ही नहीं बल्कि पिछड़ी जातियां भी इसके शिकार है। उत्तर प्रदेश में इस एक्ट में सबसे ज्यादा जेल जाने वालों में यादव है। राजनीतिक दुश्मनी भी निकाली जाती है। उत्तर प्रदेश में मायावती के शासनकाल में यादवों को चुन चुन कर जेल भेजा गया था। उस काल में मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच दुश्मनी चरम पर थी। दलित एक्ट के कारण आज दलित राजनीति भी प्रभावित हुई है, अगड़े के साथ ही साथ पिछड़े भी दलित पार्टियों को वोट नहीं दे रहे हैं। मायावती की बसपा का उत्तर प्रदेश विधानसभा ही नहीं बल्कि संसद में भी प्रतिनिधित्व नहीं है। किसी अन्य राज्य में भी मायावती जैसा कोई दलित नेता नहीं बन पा रहा है।
आक्रोश भी बढ़ रहा है और गोलबंदी भी हो रही है। पिछड़े और अगड़ों कमेस्ट्री बढ़ रही है। अगड़े तो जगह जगह सम्मेलन आयोजित कर इस एक्ट का विरोध कर रहे हैं और नरेंद्र मोदी को सबक सिखाने के कसम खा रहे हैं। सारा गुस्सा मोदी पर उतारा जा रहा है। क्योंकि मोदी ने राजीव गांधी द्वारा बनाया गया इस एक्ट को और भी लोमहर्षक बना दिया। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के कई प्रावधानों को समाप्त कर दिया था और गैर जरूरी बना बता दिया था।
राजनीति और सरकार को तटस्थता का मार्ग को छोड़ना पड़ेगा, नहीं तो फिर सामाजिक और राजनीतिक ताना बाना लोमहर्षक, हिंसक हो जाएगा। अच्छा तो यह होता कि इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश होती और अराजक प्रावधानों को हटाने की कोशिश होनी चाहिए, वसूली, बदले की भावना और सरकारी कार्य में जिम्मेदारी से बचने के लिए इस एक्ट को हथकंडा बनाने वाले लोगों के लिए सजा की व्यवस्था होनी चाहिए। सबसे पहले तो एक राष्ट्रीय सर्वे होना चाहिए कि इस कानून का कितना प्रतिशत दुरुपयोग हुआ है। इस प्रकरण पर सरकार और राजनीति की उदासीनता इस कानून के दुरूपयोग को बढ़ाने वाली है।
