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Thursday, October 21, 2021

विश्व अनुवाद दिवस या विश्व भाषांतरण दिवस? World Translation Day

आज पूरे विश्व में अनुवाद दिवस का आयोजन किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस हर वर्ष बाइबिल का अनुवाद करने वाले सैंट जेरोम की स्मृति में मनाया जाता है। सबसे पहले समझना होगा कि अनुवाद की परिभाषा क्या है? अनुवाद है क्या? क्या वास्तव में ट्रांसलेशन का अर्थ अनुवाद है? और भारत में इसकी यात्रा क्या रही होगी?

पहले हम अनुवाद को समझते हैं और जानते हैं कि क्या वास्तव में यह ट्रांसलेशन है या अनुवाद कुछ और है, कुछ अधिक है?

अनुवाद ट्रांसलेशन नहीं है: ट्रांसलेशन का अर्थ भाषांतरण हैं!

अनुवाद शब्द मूलत: अनु+वाद से बना हुआ है।  अनु अर्थात पीछे की ओर और वाद का अर्थ है कथन।  किसी भी पूर्वकथन का अनुसरण करके कहे या लिखे गए कथन को ही अनुवाद कहते हैं।  अत: अनुवाद शब्द का अर्थ हुआ किसी कही गयी बात के बाद कहना या पुन:कथन करना।  दूसरे शब्दों में अगर हम कहें तो किसी भाषा में पहले से ही कहे गए या विद्यमान और लिखित सामग्री को किसी दूसरी भाषा में लिखना या कहना ही अनुवाद की श्रेणी में आएगा। 

इसमें आवश्यक नहीं था कि भाषा दूसरी हो!

संस्कृत के कुछ कोशों में इसका अर्थ प्राप्तस्य पुन: कथनम या ज्ञातार्थस्य प्रतिपादनम् मिलता है। प्राचीनकाल में जो हमारे देश में गुरुकुलों में शिक्षा देने की मौखिक परम्परा थी, और जिसमें गुरु या आचार्य लोग जो भी कुछ बोलते या जिन मन्त्रों का उच्चारण करते,शिष्य लोग गुरु के उन कथनों को पीछे पीछे दोहराते थे।

इसी को आम तौर पर अनुवचन या अनुवाद कहा जाता था।  प्राचीन ग्रंथों की अगर और बात करें तो पाएंगे कि पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी में एक सूत्र दिया है “अनुवादे चरणानाम”।  कई टीकाकारों ने इसका अर्थ “सिद्ध बात का प्रतिपादन” या कही हुई बात का कथन बताया है” इसी प्रकार भ्रतर्हरी ने अनुवाद शब्द का प्रयोग दुहराने या पुन:कथन के रथ में दिया है – अनुवृत्तिरनुवादो वा”।  जैमिनीय न्यायमाला में भी अनुवाद का “ज्ञात का पुन:कथन” के अर्थ में हैं। (1)

Translate- Express the sense of (word, sentence, book) in or into another language (as translated Homer into English from the Greek)

हर भाषा की भांति अंग्रेजी में भी अनुवाद धार्मिक ग्रन्थ अर्थात बाइबिल से ही आया। धर्म ग्रंथों से ही अनुवाद पश्चिम में आरम्भ हुआ, तथा बाइबिल में इतनी स्वतंत्रता नहीं थी कि अनुवादक अपनी कुछ व्याख्या कर सके, तो यह अनुवाद मुख्यत: एक सीमा में थे। एक दायरे में कैद। रिलिजन का दायरा। इसलिए अधिक पद्धति परक रहा।

भारत में जो अनुवाद की परम्परा थी, वह श्रुतियों से आई। तभी वाल्मीकि रामायण से प्रेरणा लेकर कंबन ने रामवतारम्‌ लिखी तो वह भारतीय अवधारणा में तो अनुवाद कहलाई जा सकती है, परन्तु वह ट्रांसलेशन नहीं है।

इसी प्रकार रामायण एवं रामचरित मानस एक ही कथा पर दो वृहद महाकाव्य! यह राम कथा का मात्र भाषांतरण न होकर स्वतंत्र रचना थीं।

भारत में जो पुनर्कथन हो रहे थे, वह ट्रांसलेशन नहीं थे! वह बाइबिल की  भांति किसी रिलीजियस दायरे में कैद नहीं थे। प्रभु श्री राम पर कोई भी लिख सकता था, पूरा भक्तिकाल तो जैसे इस प्रकार के पुनर्कथनों की व्याख्या से भरा हुआ है।

परन्तु यह स्वतंत्रता बाइबिल के साथ नहीं थी। विलियम टिंडेल को इसीलिए मार डाला गया था, क्योंकि उन्होंने बाइबिल का अनुवाद, उस आदर के साथ करने का दुस्साहस किया था, जो उनके दिल में जीसस के लिए था।

https://hindupost.in/bharatiya-bhasha/hindi/bible-english-translation-and-murder-of-william-tyndale/

भारत में जहाँ तुलसीदास भी रामचरित मानस लिख सकते थे तो वहीं समर्थ गुरु रामदास भी राम की पूजा की बात कर सकते हैं, कोई बंधन नहीं हैं। कोई भी राम कथा का अपने भाव के अनुसार अनुवाद कर सकता है, परन्तु वह ट्रांसलेशन नहीं है।

ऐसी माला अंतःकरणी।

                        गुंफून पूजा रामचरणी।

                        वोंकारतेत अखंडपणी।

                        खंडू च न ये।

      अर्थात् ऐसी ही सुंदर माला को हृदय में गूँथकर श्रीरामचंद्रजी के चरणों में अर्पण करते हुए उनकी पूजा करो। उस माला में ओंकार का तंतु अखंडरूप से व्याप्त रखो। इसका खंडन न होने पावे। अर्थात् ईश्वर-भक्ति को मत छोड़ो। (2)

आज हमें अनुवाद के उसी प्राचीन स्वरुप की आवश्यकता इसलिए आन पड़ी है क्योंकि जो भारतीय भाषा परिवार हैं, जिनके मध्य एक परस्पर व्यवहार होता था, राम एवं कृष्ण कथाओं से, वह अब अंग्रेजी भाषा के पर्दे के बाद ही मिल पाती हैं।  भारत का प्राचीन साहित्य इस बात का उदाहरण है कि लोक से जुड़ा साहित्य, ही राजनीति की रपटीली राहों से बचा सकता है।  भारत का संत साहित्य, उन सभी बेड़ियों से मुक्त करता है, जो भाषा पर राजनीति करने वाले जनता पर वोटबैंक के लालच में डालते हैं।

आज जब पूरा विश्व ट्रांसलेशन डे मना रहा है और इस बार की थीम रखी है, “यूनाइटेड इन ट्रांसलेशन!” अर्थात ट्रांसलेशन में एक हो जाना! एकता की बात की गयी है। यह वही एकता और एकत्व की भावना है, जो हमारे हिंदी साहित्य में, तब तक थी जब तक वामपंथी साहित्य नहीं आया था।

वर्तमान में कथित मुख्यधारा का जो साहित्य है उसे लोक से सम्बंधित साहित्य नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उसने विमर्श के नाम पर कथाओं का पुनर्कथन तो किया, परन्तु एकता के लिए नहीं बल्कि तोड़ने के लिए और भाषाई राजनीति पर रोटी सेंकने के लिए।  जैसे प्रभु श्री राम को स्त्री विरोधी प्रमाणित करने के लिए तो कहीं वासुदेव श्री कृष्ण को रोमियो जैसी छवि में कैद करने के लिए, एवं हाल ही में आरम्भ हुआ विमर्श कि माँ दुर्गा वैश्या हैं जिन्होनें देवताओं का साथ लेकर असुर राज महिषासुर का वध किया था।

यह जो पुनर्कथन वामपंथी साहित्य के आने के बाद भारत को सांस्कृतिक रूप से तोड़ने के लिए, इसका उद्देश्य वह नहीं था, जो पूर्व में पुनर्कथित साहित्य का हुआ करता था। अत: इसे इस विमर्श से बाहर निकालने के लिए आवश्यक है कि जिसे पश्चिम ट्रांसलेशन कहता है, अर्थात भाषांतरण, और जिसकी थीम एकता रखी है, उसका प्रयोग हम भी अपनी भारतीय भाषाओं के साथ जुड़ने के लिए करें। एकता के लिए आवश्यक है कि मराठी और हिंदी के मध्य, तमिल और हिंदी के मध्य, असमी और हिंदी के मध्य अंग्रेजी की जो दीवार है, अंग्रेजी की जो औपनिवेशिक दीवार है, उसे गिराएं क्योंकि उसे गिराए बिना भारतीय भाषाओं में एकता नहीं आएगी।

अंग्रेजी के लिए समर्थ गुरु रामदास मात्र एक कवि या रचनाकार होंगे जबकि सनातन लोक के लिए वह एक ऐसे प्रेरणादायी स्वर हैं, जिन्होनें शिवाजी को भी प्रेरणा दी।

अंग्रेजों के लिए तुलसीदास मात्र एक कवि हैं, जिन्होनें मिल्टन के जैसे कोई महाकाव्य रचा, जबकि हम पूरे उत्तर भारत ही नहीं, इस कृतज्ञ सनातन समाज के लिए बाबा तुलसीदास ऐसे संत हैं, जिन्होनें अपनी स्थानीय भाषा से प्रभु श्री राम को हर घर की हिस्सा बनाया।

अंग्रेजी के लिए हनुमान monkey man हैं, जबकि मराठी, तमिल और हिन्दी, तीनों में हनुमान, हनुमान ही हैं!

अत: यह आवश्यक है कि एकता की भावना का विस्तार समस्त भारतीय भाषाओं के मध्य परस्पर हो, औपनिवेशिक मानसिकता की भाषा लिए अंग्रेजी के माध्यम से नहीं!

तथा यह भी स्पष्ट हो कि जो यूएन कहता है ट्रांसलेशन, उसका अर्थ मात्र भाषांतरण है, जबकि अनुवाद को समझना है तो संस्कृत के साहित्य को ही पढ़ना होगा! वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, आदि को पढ़ना होगा! यह व्यवहार है तो वहीं पश्चिम सिद्धांत है! समझना होगा कि कैसे कथाएँ नित नए रूप लेकर नवीन होती रहती हैं। कथा के मूल रूप में कोई परिवर्तन नहीं होता है। आवश्यकता यह भी है कि हर शब्द का भारतीय या कहें सनातनी सन्दर्भ खोजा जाए, और उसके अनुसार ही प्रयोग किया जाए.

1- गोस्वामी, कृष्ण कुमार, 2008 अनुवाद विज्ञान की भूमिका राजकमल प्रकाशन प्रा. लिमिटेड, दिल्ली– पृष्ठ 16

2-https://sufinama.org/articles/madhuri-patrika-article-3?lang=hi

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