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Saturday, May 21, 2022

हिजाब और बुर्के की कैद: वोकिज्म और फेमिनिज्म लड़कियों को यही कैद देता है

कर्नाटक में इन दिनों एक ऐसा मामला सामने आ रहा है, जो मजहबी रूढ़ियों से जुड़ा हुआ है, और जिस मजहबी रूढ़ी से ईरान की महिलाएं लड़ रही हैं, वह जेल जा रही हैं परन्तु उस कट्टरता के सामने झुकने से इंकार कर रही हैं, जो उन पर मजहब के नाम पर थोपी जा रही है। परन्तु भारत में वोक और फेमिनिस्ट मुस्लिम लड़कियों को उस जाल की ओर फेंक रही हैं, जिससे निकलने के लिए कट्टर इस्लामी देशों की लडकियां हर प्रकार के अत्याचार का सामना कर रही हैं।

कर्नाटक में इन दिनों हिजाब पहनने को मौलिक अधिकार बताया जा रहा है और वहां पर उडुपी में कॉलेज में लडकियां प्रदर्शन कर रही हैं। सरकारी कॉलेज में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने पर रोक लगा दी गयी है। बार बार हिजाब को लेकर इस प्रकार के विवाद सामने आते रहे हैं। परन्तु इसमें सबसे दुखद यह है कि महिलाओं के कथित अधिकारों के लिए लड़ने वाले सभी संगठन मुट्ठी भर ही नहीं बल्कि उँगलियों में गिनी जाने वाली इन कट्टर लड़कियों के पक्ष में जाकर खड़े हो जाते हैं। वह उस मानसिकता के सामने अपने हथियार डाल देते हैं, जो लड़कियों को परदे में रखने की हिमायती है।

वामपंथी मानसिकता वाली यह फेमिनिस्ट हिन्दू लड़कियों को उनके धर्म की अच्छी बातों के खिलाफ भड़कती हैं, देह से मुक्ति की बात करते हुए उन्हें बाजार के सामने मांस के रूप में परोसने की वकालत करती हैं, वही मुस्लिम लड़कियों द्वारा हिजाब पहनने को उनकी “धार्मिक पहचान” के प्रति प्रतिबद्धता बताती हैं।

जितनी भी कट्टर फेमिनिस्ट पत्रकार और लेखिकाएँ हैं, वह कभी भी हिजाब डे का विरोध नहीं करती हैं, इसे वह मुस्लिमों का मजहबी अधिकार बताती हैं, अब जरा कल्पना करें कि यदि कोई हिन्दू महिला “घूँघट” को अपनी धार्मिक पहचान बताते हुए घूँघट दिवस मनाना आरम्भ करे तो?

कर्नाटक में कुछ मुस्लिम लडकियां यह दावा कर रही हैं कि हिजाब पहनने की आजादी उन्हें संविधान देता है। परन्तु यही संविधान स्कूल और कॉलेज को भी आजादी देता है कि वह ऐसा नियम बनाएं जिनसे किसी भी प्रकार की असमानता न परिलक्षित हो।

shethepeople एवं feminisminindia जैसे पोर्टल्स की इस दौरान वास्तविकता सामने आती है। शीदपीपल में हिन्दू धर्म को लेकर, हिन्दू धर्म की महिलाओं को लेकर हमेशा ही जहर भरी बातें होती हैं, उनमें बार बार हिन्दू धर्म के खिलाफ भड़काया जाता है, ओपिनियन के नाम पर हिन्दू धर्म को लक्षित करके लेख लिखे जाते हैं, परम्पराओं को जाने बिना उन्हें स्त्री विरोधी प्रमाणित कर दिया जाता है। और जब इस्लाम की बात आती है तो वह भी हिजाब को मजहबी अधिकार मानती हैं, जैसे उनकी एक तस्वीर में भी दिखता है।

और अपने आप में विरोधाभासी बात यह है कि जहां यह लोग सिन्दूर लगाने जैसी पवित्र परम्परा को पति का गुलाम कहते हुए नहीं थकती हैं, तो वहीं अपने लेख में हिजाब के लिए वह यह कहती हैं कि यह तो मजहबी अधिकार है या पश्चिम देशों द्वारा इस्लाम का जो शोषण किया जा रहा है यह उसका प्रतिरोध है।

हिन्दुओं के भगवान का लगातार मजाक उड़ाना वाला यह पोर्टल हिजाब के बारे में लिखता है कि कई औरतें इसलिए हिजाब पहनती हैं क्योंकि वह ऊपर वाले के लिए अपना प्यार और समर्पण दिखती हैं और यह लगातार इस्लामी विश्वास स्थापित कने के लिए होता है, कि जरूरतमंदों की मदद करना आदि!

और जो सबसे खतरनाक बात है वह यह कि हिन्दू धर्म के खिलाफ लगातार जहर घोलने वाले और इस्लामी “हिजाब” को महिमामंडित करने वाले इन पोर्टल्स को बड़े बड़े उद्योगपति जैसे आनन्द महिन्द्रा स्त्री विमर्श के नाम पर आर्थिक निवेश प्रदान करते हैं।

ऐसा ही एक और पोर्टल है फेमिनिज्मइनइंडिया। इसमें भी मूलनिवासियों आदि आदि के प्रोपोगैंडा के साथ हिन्दू धर्म की आस्था पर कई प्रहार होते हैं, या कहें यह हिन्दू धर्म को ही निशाना बनाने के लिए है, परन्तु वह भी हिजाब को महिमामंडित करता है।

एक लेख में लिखा है कि विश्व हिजाब दिवस: जो अजनबी है, उससे नफरत न करें! और फिर इसमें लिखा है कि क्यों हिजाब एक पहचान के रूप में जरूरी है। यह कहा गया है कि यह इस्लामोफोबिया से लड़ने के लिए एक बड़ा हथियार है।

जब ऐसे पोर्टल्स जो कहने के लिए महिलाओं के लिए लड़ने का दावा करते हैं, उनकी सूची से वह सभी महिलाएं नदारद क्यों होती हैं, जो इस्लामी कट्टरता से लड़ रही हैं, जो तालिबान के खिलाफ लड़ रही हैं, जो इस्लाम छोड़कर एक्स-मुस्लिम हो चुकी हैं और जिन्हें बार बार धमकियां मिल रही हैं। क्यों इन पोर्टल्स पर 72 हूरों की अवधारणा के खिलाफ कोई विरोध नहीं दिखता है?

ईरान सहित कई इस्लामी देशों में लड़कियां हिजाब हटाने के लिए कर रही हैं संघर्ष

ईरान, अफगानिस्तान और मध्य पूर्व की कई महिलाऐं इस इस्लामी कट्टरता का विरोध कर रही हैं, जो उन्हें रोकती हैं, जो उन्हें बांधती हैं, उनके कोड़े पड़ रहे हैं, उन्हें जेल भेजा जा रहा है और उन्हें मूलभूत आजादी की मांग करने के लिए उनके देश से निकाला जा रहा है।

लडकियां इसे रेप कल्चर बता रही हैं और अपने साथ हुए अत्याचारों को बता रही हैं

पूरी दुनिया से लडकियां कह रही हैं कि यह चॉइस नहीं है

वहीं एक लड़की ने पाकिस्तान की एक तस्वीर साझा की जिसमें पाकिस्तानी महिलाएं जिया उल हक द्वारा इस्लामी नियम थोपने के खिलाफ हिजाब जला रही थीं, और वह 1983 की बात है

बांग्लादेश में भी लडकियां इस के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। एक लड़की ने लिखा कि हिजाब पहचान नहीं हो सकता है, हिजाब आजादी नहीं है, यह केवल मर्दों द्वारा औरतों पर थोपा गया अत्याचार है

बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने सितम्बर में एक ट्वीट किया था कि बांग्लादेश में एक एथलीट को खेल छोड़कर बुर्का पहनना पड़ा था, वह यह कह सकती है कि यह उसकी चॉइस है, परन्तु बुर्का किसी भी भले इंसान की पसंद नहीं हो सकता, यह औरतों के लिए आदमियों की पसंद है

दुःख इस बात का होता है कि भारत में फेमिनिज्म है वह हिन्दू लड़कियों को इसी हिजाब की तरफ सॉफ्ट स्टैंड लेना सिखाता है। वह उन्हें उस अँधेरे में धकेलने का काम कर रहा है, जहाँ से वह कभी भी वापस नहीं आ सकती हैं।

कमला दास का उदाहरण हम सभी के सामने है। वह कथित रूप से स्त्री विमर्श में बहुत बड़ा नाम हैं, परन्तु अंत उनका कहाँ होता है? अंत होता है बुर्के में? अंत होता है प्यार में मुस्लिम नाम अपनाकर, मुस्लिम मजहब अपनाकर! कहाँ गया वह स्त्री विमर्श जो पूरी जीवन वह लिखती रहीं कि लड़की का अपना नाम और पहचान होनी चाहिए, अंत में जाकर वह सुरैया बन गईं! अगर पति का नाम पसंद नहीं था, तो मुस्लिम प्रेमी का नाम कैसे पसंद आ गया?

ऐसे एक नहीं कई मामले दिखेंगे, जिनमें हिन्दू लड़कियों पर प्रभाव डालने वाली कथित फेमिनिस्ट इस्लामी कुरीतियों पर फ़िदा होती जाती हैं। फिर चाहे वह हिजाब हो, या फिर तीन तलाक! उनका कहना होता है कि मुस्लिम समाज को स्वयं अपनी कुरीतियों के खिलाफ बोलना होगा, हम नहीं बोलेंगे! यह ठीक है कि आप नहीं बोलेंगी, परन्तु जो बहादुर लडकियां आवाज उठा रही हैं, आप उनका साथ तो दीजिये, पर आप तो खुद ही विश्व हिजाब दिवस मनाकर उन लड़कियों के विरोध में खड़ी हो गयी हैं, जो अपनी मूलभूत आजादी के लिए लड़ रही हैं और साथ ही जब आप कमला दास उर्फ़ सुरैया को अपना आदर्श मानती हैं, तो आपके भीतर कहीं न कहीं यौन लिप्सा और अत्याचार करने वालों के प्रति सॉफ्ट दृष्टिकोण दिखाई देता है। फिर ऐसे में आप कैसे आवाज उठा पाएंगी।

कोई भी वामपंथी फेमिनिस्ट भारत में हिजाब का विरोध नहीं करती दिखाई देती है, बल्कि वह तो स्वयं ही हिजाब पहने हुए दिखाई पड़ जाती हैं। ऐसे में पूछना स्वाभाविक है “तुम्हारी पोलिटिक्स क्या है, डियर फेमिनिस्ट?”

सच मानिए जो कमला दास के साथ हुआ, फेमिनिज्म हिन्दू लड़कियों को वही देता है, हिजाब और बुर्के की कैद!

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