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Saturday, May 28, 2022

1857 की क्रान्ति में गुमनाम आम स्त्रियों का बलिदान

10 मई 1857 का दिन बहुत आम नहीं था। वह ऐसा दिन था जो देश की चेतना में सदा के लिए रह जाने वाला था। वह समस्त विश्व को यह बताने वाला था कि अभी शिवाजी का साहस देश के नौजवानों की रगों में दौड़ता है। उन्हें अपनी स्वतंत्रता सभी से प्यारी है। वह अपने शत्रुओं का जमकर सामना करने के लिए तैयार हैं। १० मई 1857, जब भारत का इतिहास बदलने को था और उसमें से ऐसे नायक और नायिकाओं का प्रस्फुटन होना था, जिन्हें इतिहास तो बिसरा भी दे, पर चेतना न बिसराए!

१० मई 1857, जब विद्रोह का स्वर संगठित होकर फूटा। १० मई 1857 जब अंग्रेजों के विरुद्ध जो स्वर फूटा उसमें सब साथ हो लिए। कोई वर्ग संघर्ष न था, कोई आयातित फेमिनिज्म की पीड़ा न थी और न ही थी कोई भी ओढी हुई विवशता! था तो मात्र एक जूनून कि बस अंग्रेजों को भगाना है। जब यह संघर्ष आरम्भ हुआ तो कई लोग तो इतिहास का हिस्सा बन गए, परन्तु असंख्य वह थे जो विस्मृत हो गए। वह खोते गए और चेतना में ही रहे। क्योंकि चेतना में यह प्रश्न उत्पन्न होता था कि क्या स्वतंत्रता का नायक एक ही है या एक ही परिवार है? क्या वास्तव में यह धरती उन स्त्रियों से रिक्त हो चुकी है, जिन्होनें मुगलों से लोहा लिया था?

क्या यह धरती मुगल काल के बाद वीरांगनाओं से रिक्त होकर निष्प्राण हो चुकी थी? यह प्रश्न चेतना में कुलबुलाते थे। परन्तु उत्तर कहाँ से प्राप्त हो सकता था? उत्तर था उन पुस्तकों में जो प्रचलित इतिहास से कहीं परे थीं, जो प्रचलित इतिहास से कहीं दूर थीं?

1857 की क्रान्ति जिसमें भाग लेने वाला हर व्यक्ति नायक था। जिसमें भाग लेने वाली हर महिला नायिका थी। एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों महिलाओं ने हँसते हँसते अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए थे। हँसते हँसते अंग्रेजों की आग का शिकार हुई थीं तो हँसते हँसते गोली और तोपों का भी शिकार हुई थीं। परन्तु वह महिलाएं कौन थीं? कहाँ से थीं? और क्या किया था? आज कुछ महिलाओं के माध्यम से हम उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी।

1857 की क्रान्ति पर एक पुस्तक का प्रकाशन नेहरु युवा केंद्र दिल्ली द्वारा किया गया था। इस पुस्तक का नाम था “साझी शहादत के फूल!” इस पुस्तक में कई उन नायिकाओं के विषय में बात की गयी है जिन्हें इतिहास में एकदम ही विस्मृत कर दिया है। कौन हैं, कहाँ हैं? कोई नहीं जानता। इस पुस्तक के 132वें पृष्ठ पर मुजफ्फर नगर जनपद की क्रान्तिकारी महिलाओं के विषय में जानकारी प्रदान की गयी है, तो आज वही पढेंगे, शेष हम धीरे धीरे और पढेंगे:

  1. श्रीमती आशा देवी गुज्जर: इनके पति मेरठ सैनिक विद्रोह में अग्रणी स्थान पर थे। जो पहला जत्था मेरठ से दिल्ली vijay के लिए गया था, वह उसके सदस्य थे। 11 मई को जैसे ही आशा देवी को यह समाचार प्राप्त हुआ, तो वह अपनी ससुराल तहसील कैराना के एक गाँव में थीं। उन्होंने वहीं पर संकल्प ले लिया कि वह हर मूल्य पर अंग्रेजों से मोर्चा लेगी? फिर उन्होंने नवयुवतियों की टोली बनाकर उसका संचालन किया। इसके साथ ही उन्होंने एक छापामार हमला करके 13 मई को कैराना के आसपास के सरकारी कार्यालयों एवं 14 मई को शामली तहसील पर हमला बोलकर अंग्रेज सरकार को आर्थिक हानि पहुंचाई।
  2. भगवती देवी त्यागी: यह अद्भुत वीरांगना थीं। उन्होंने मुजफ्फरनगर का नाम रोशन किया था। 22 दिनों तक अपनी टोली के साथ जाकर प्रचार करती रही और गाती रही कि अंग्रेज अब बस जाने ही वाले हैं। जन जागरण करती थी और फिर अंतत: अंग्रेजों की पकड़ में आ गयी और उन्हें तोप से उड़ा दिया गया।
  3. शोभा देवी ब्राह्मणी: यह अद्भुत योद्धा थीं, जिन्हें अंग्रेजों ने पकडे जाने पर फांसी दे दी थी। इन्होने अपनी महिला टोली बनाई थी और साथ ही जो उनकी टुकड़ी थी उसमें आधुनिक हथियारों से लेकर, तलवार, गंडासा, कृपाण आदि धारण किये गए सैनिक भी थे। एक दिन उनका सामना अंग्रेजी टुकड़ी से हुआ। सैकड़ों की संख्या में पुरुष और कई महिलाओं ने लड़ते लड़ते प्राण दिए। यह पकड़ में आ गईं और उन्हें फांसी दे दी गयी।

इस पुस्तक में इस लेख को लिखने वाले अरुण गुप्ता और रघुनंदन वर्मा के अनुसार कई महिलाओं ने अपने प्राण देकर मुजफ्फरनगर की धरती को उस क्रान्ति में अमर कर दिया था। इन महिलाओं में और नाम थे भगवानी देवी, इन्द्र्कौर जाट उम्र 25 वर्ष, जमीला पठान उम्र 22 वर्ष, रणबीरी वाल्मीकि आदि। इन सभी ने अपनी अपनी टोली बनाकर अंग्रेजों का सामना किया था और उनमें से सभी को फांसी पर चढ़ा दिया गया था।

इनके अनुसार 255 महिलाओं को फांसी पर चढ़ाया गया था और कुछ लड़ती-लड़ती मारी गयी थीं और थानाभवन काजी खानदान की श्रीमती असगरी बेगम को पकड़ कर जिंदा जला दिया गया था।

तो बार बार यह कहना कि भारत में स्त्रियों की स्थिति बुरी थी, या उन्हें अस्त्र शस्त्र का ज्ञान नहीं था, और उनकी उद्धारक कोई अंग्रेज या मिशनरी हैं, एक ऐसे झूठ से बढकर कुछ नहीं है जो हिन्दू स्त्रियों को अपमानित करने के लिए जानबूझकर गढ़ा गया था।

यह श्रृंखला आगे जारी रहेगी ——————–

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