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Sunday, September 26, 2021

मनोचिकित्सकों का खुला पत्र मीडिया के नाम: बहुत हुआ कोविड-19 के नाम पर मानसिक अत्याचार

कोरोना को लेकर जिस तरह मीडिया ने नकारात्मक रिपोर्टिंग की है। और एक खौफ पैदा कर दिया है। एक ऐसा खौफ जिसमें ऑक्सीजन की जरासी कमी होते ही लोग पागल हो जाते हैं एवं डर के कारण अस्पतालों के कारण बाहर भीड़ लगा रहे हैं। आधे से ज्यादा लोग तो अवसाद का ही शिकार हो रहे हैं।  मीडिया रोज ही नकारात्मक ख़बरें चला रहा है, इतना ही नहीं वह जलती हुई चिताओं की तस्वीर दिखा रहे हैं।

वाशिंगटन पोस्ट में बरखादत्त की एकतरफा एवं बेहद नकारात्मक रिपोर्टिंग के बाद टाइम्स में राणा अयूब ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए, उन्हें ही भारत के कोविड 19 की आपदा के लिए उत्तरदायी ठहराया है।  और भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को लेकर न जाने कितने अपुष्ट स्रोतों के माध्यम से बात की है।  और इतना ही नहीं इन पत्रकारों के आधार पर डिजिटल मीडिया भी अब दिन रात कोरोना के कारण होने वाली समस्याओं और मौतों की ही रिपोर्टिंग कर रहा है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यही हो रहा है कि जहाँ एक ओर कोरोना बढ़ रहा है वहीं यह डर के कारण और बढ़ रहा है।

ऑक्सीजन का स्तर नीचे जाते ही लोग घबराकर अस्पताल की ओर भाग रहे हैं। और इससे संसाधनों पर न केवल दबाव बढ़ रहा है बल्कि जो अधिक गंभीर मरीज हैं, वह और भी अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

इन्हीं सब समस्याओं का सामना कर रहे चिकित्सीय समुदाय ने मीडिया संस्थानों से अपील की है। यह अपील दरअसल बेहद आवश्यक थी। क्योंकि यह अपील न केवल स्वास्थ्य फ्रंटलाइन कर्मियों के लिए आवश्यक है बल्कि साथ ही यह आवश्यक है आम जनता के मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी।  उन्होंने अपील की कि

“मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित क्षेत्र में काम करने वाले पेशेवरों के रूप में हम पिछले कुछ सप्ताहों की घटनाओं को देखकर आप सभी को एक खुला पत्र लिखने के लिए बाध्य हुए हैं। विशेषकर मीडिया में अपने मित्रों से!

चूंकि सत्ता या शक्ति कुछ अधिक जिम्मेदारियों के साथ आती है, तो यह कहा जा सकता है कि कोविड 19 महामारी जैसी आपदा में जिम्मेदारी की बहुत महत्ता है।

मास मीडिया के पास एक ही समय में लाखों लोगों से बात करने की अद्भुत ताकत होती है।  जब आप बहुत ज्यादा लोगों तक पहुँच सकते हैं तो हर शब्द, हर चित्र एक ख़ास प्रभाव पैदा करते हैं। हालांकि जो भी हम आज टीवी स्क्रीन, मोबाइल स्क्रीन और अखबारों में देख रहे हैं, वह परेशान करने वाला है।

शमशान घाट में जलती चिताओं की तस्वीरें, मृत मरीजों के रिश्तेदारों का विलाप और अपने परिजनों के लिए परेशान लोगों के आजूबाजू में पागलों की तरह घूम रहे कैमरामैन के साथ हिस्टीरिकल पत्रकार के चित्र, यह सब ध्यान तो खींच सकते हैं, मगर इनकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

और चूंकि कोविड के कारण लोग अपनी सामान्य ज़िन्दगी नहीं जी पा रहे हैं, तो वह मनोरंजन के लिए केवल टीवी पर ही निर्भर हैं।  इस समय वैसे ही लोग बीमारी और महामारी के कारण एक मानसिक महामारी का भी सामना कर रहे हैं, और अवसाद में जा रहे हैं, अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं और बेचैन हो रहे हैं।  मगर जब वह ऐसे परेशान करने वाले और निराशाजनक दृश्य देखते हैं, तो वह और भी ज्यादा तनाव में चले जाते हैं।

यह हमारा विश्वास हैं, कि संवेदनात्मक मुद्दों पर रिपोर्टिंग और विशेषकर इस कठिनाई के समय में पत्रकारों के लिए रिपोर्टिंग सरल नहीं है।  अगर जिन समाचारों की रिपोर्टिंग करते समय आप इतना प्रभावित हो सकते हैं, तो फिर उस प्रभाव के विषय में सोचिये जो उन लोगों पर पड़ेंगे जो उन्हें देख रहे हैं।

जरा सोचिये, एक व्यक्ति जो अभी अभी कोविड 19 से संक्रमित हुआ है और उसने आपकी शमशान घाट की रिपोर्टिंग देख ली तो उसके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा, और उसके परिवारीजन क्या सोचेंगे। उनके लिए यह तथ्य एकदम मायने ही नहीं रखता है कि कितने लोग इस रोग से ठीक हो गए हैं।  उनके दिमाग में केवल और केवल वही तस्वीरें रह जाती हैं जो आप दिखाते हैं।”

इसके बाद एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड, नेशनल मेडिकल कमीशन, नई दिल्ली के अध्यक्ष बीएन गंगाधर, निमहंस बंगुलुरु में मनोचिकित्सा विभाग के हेड और प्रोफ़ेसर प्रतिमा मुर्थ, गौतम साहा, अध्यक्ष इंडियन साइकेरटी सोसाइटी, और एम्स नई दिल्ली के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफ़ेसर राजेश सागर ने अपनी इस सामूहिक अपील में आगे कहा है कि ऐसी रिपोर्टिंग के मनोचिकित्सक प्रभाव होने के साथ साथ, अन्य परिणाम भी हो रहे हैं।

किसी खास वस्तु की कमी की रिपोर्टिंग करना एक सही बात हो सकती है, जिससे उसके विषय में कदम उठाए जाएं। मगर यह भी आवश्यक है की आखिर कमी कहाँ है बजाय इसके कि आप इसे वैश्विक कमी बता दें। चूंकि यह एक मानवीय मानसिकता है कि जितना ज्यादा कमी का शोर होगा उतना ही लोग उसे जमा करना शुरू कर देंगे। इससे और भी ज्यादा कमियों का एक चक्र बनता है और लोग पैनिक होने लगते हैं क्योंकि उन्हें जरूरत के समय चीज़ें नहीं मिली है।

मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर होने के नाते हम आपको यह बता सकते हैं कि कौन कौन सी सूचनाएं लोगों को सशक्त करती हैं और उन्हें किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करती हैं। मगर पैनिक उन्हें कमज़ोर करती है।

कौन सी दवाइयों की जरूरत है? कब मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत होनी चाहिए? उन्हें कब अस्पताल जाना चाहिए? कितने प्रतिशत लोग घर पर ही रहकर ठीक हो गए? क्या कोई ऐसा संस्थान है जो उनकी मदद के लिए काम कर रहा है? क्या मानवीय विजय की कोई कहानियां हैं?

यह आपको याद रखना होगा कि आपको हर उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति का ज्ञान नहीं है, जो आपका शो देख रहा है या आपको पढ़ रहा है। और आपको भी नहीं पता कि कब कौन सा चित्र उसे परेशान कर सकता है। यहाँ तक कि वह उनकी मानसिक स्थिति को नुकसान पहुंचाने वाला अंतिम प्रहार हो सकता है। इसलिए जिम्मेदारी जरूरी है।

ऐसे समय में मीडिया के पास यह शक्ति है कि वह सकारात्मक समाचारों के बारे में लोगों को समझाएं, शिक्षित करे और लोगों में उम्मीदें जगाए। असली सूचनाएं साझा करें और डर का नाश करे। यह इस महामारी से बचने के लिए हमारे सबसे महत्वपूर्ण हथियार हैं।

उन्होंने मीडिया से अनुरोध करते हुए लिखा है कि आप ही हमारी आँखें और कान हैं। आप मायने रखते हैं, आप जो भी लिखते या दिखाते हैं वह मायने रखता है। आप इस दर्द को भरने के लिए और इस दुःख के समय में उम्मीद देने के लिए हमारे साथी हैं।

यह अपील मीडिया के संस्थानों पर कितना असर दिखा पाएगी, यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा।


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