सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?

“सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?”, हाहाकर, जुलाई 25, 2026

“दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी…….”

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