कम्युनिस्टों की दुर्गति पर प्रकाश करात से जुडी एक घटना मुझे याद आ रही है। मनमोहन सिंह के कार्यालय के दौरान नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई भारत आए थे। प्रसिद्ध समाजवादी नेता शरद यादव ने भट्टराई के स्वागत में एक समारोह आयोजित किया था। समारोह में कांग्रेस, बीजेपी और कम्युनिस्ट सहित अन्य दलों के नेता भी आमन्त्रित थे। अपनी बारी आने पर प्रकाश करात ने भारत के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया और कहा कि नेपाल को भारत कभी बढने नहीं देना चाहता है, दबाकर कर रखना चाहता है। प्रकाश करात की ऐसी बात सुनकर और बिना विरोध किए ही मोतिलाल बोरा, सुषमा स्वराज आदि चले गए। फिर बाबूराम भट्टराई ने अपने संबोधन में प्रशंसा कर भारत को बडा भाई बताया था और मिलकर विकास करने पर प्रतिबद्धता जताई थी। प्रकाश करात की इस बात पर खुद बाबूलाल भट्टराई, सुषमा स्वराज, शरद यादव आश्चर्य चकित थे। उपस्थित जनता की प्रतिक्रिया थी कि कम्युनिस्ट देश हित के पक्ष में कभी भी खडा नहीं हो सकते हैं। कम्युनिस्टों के राज्यसत्ता से मुक्त होने के पीछे ऐसा ही कारण रहा है।
यह पहली बार हुआ है जब देश के किसी राज्य में कम्युनिस्टों की सरकार नहीं होगी। 1957 के बाद केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में से किसी न किसी राज्य में कम्युनिस्टों की सरकार जरूर रही थी। कभी केरल, तो कभी त्रिपुरा, तो कभी पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की जीत होती रहती थी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कम्युनिस्टों को पैदल कर कम्युनिस्टों की सरकार का संहार किया था, त्रिपुरा में बीजेपी ने कम्युनिस्टों की सरकार का संहार किया था और अब केरल में कांग्रेस ने कम्युनिस्टों की सरकार का संहार कर दिया। कम्युनिस्टों की केरल में पिछले दस साल से सरकार चल रही थी? केरल में कम्युनिस्टों की हार क्यों हुई, कांग्रेस की जीत क्यों हुई, इसके पीछे जनता का गणित क्या है? जनता का गणित स्पष्ट था, कम्युनिस्टों की सरकार को दफन करना, केरल की जनता के पास विकल्प का अभाव था, बीजेपी मजबूत नहीं थी, बीजेपी के पास सत्ता बनाने लायक समर्थन शक्ति नहीं थी। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ ही विकल्प था। राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिस्टों की वर्तमान मे कोई पहचान नहीं है और न ही जनता की उल्लेखनीय शक्ति उनके पास है, ये राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की बी टीम के तौर पर ही सक्रिय हैं, कभी ये कांग्रेस और राहुल गांधी के पक्ष में शतरंज खेलते नजर आते हैं तो कभी ये मुस्लिम समर्थक जिहादी पथ पर चलते रहते हैं, हिंदुओं का विरोध करना, राष्ट्रहित के खिलाफ बोलना और भारतीय संस्कृति का संहार करने की मानसिकता से ग्रसित रहते हैं। माओ, मार्क्स, लेनिन और स्टालिन को छोड़कर इनका कोई भारतीय महापुरुष आईकॉन नहीं है। वामपंथ एक विदेशी विचार है, यह अवधारणा आम भारतीय के अंदर बैट गयी है, इस कारण आम भारतीय के अंदर वामपंथ प्रेरक बन नही सकता है, स्वीकार नहीं हो सकता है। यही कारण है कि केन्द्रीय सत्ता के लायक वामपंथ को कभी स्वीकार नहीं किया गया।
कम्युनिस्टो को विकास विरोधी कहना सही होगा क्या? कम्युनिस्टों को स्थिरता विरोधी कहना सही होगा क्या? कम्युनिस्टो को शांति विरोधी कहना सही होगा क्या? कम्युनिस्टों को उद्योग धंघों का विरोधी कहना सही होगा क्या? सही तो यही है कि इन्हें विकास चाहिए नहीं, इन्हें शांति चाहिए नहीं, इन्हें स्थिरता चाहिए नही, इन्हें प्रतिस्पद्र्धा चाहिए नहीं। फिर इन्हें क्या चाहिए? इन्हें हिंसा चाहिए और तानाशाही चाहिए, लोकतंत्र का विनाश चाहिए। भारत के परिपेक्ष्य में तानाशाही चल नहीं सकती है, हिंसा स्वीकार हो नहीं सकती है। भारत की शासन व्चवस्था लोकतांत्रित है। देश की आजादी के बाद भारत ने लोकतांत्रिक संविधान बनाया और संविधान आधारित शासन पद्धति को भारत ने चुना था। कम्युनिस्टों के पास समस्या यह थी कि वे चुनाव से दूर रहें या फिर बन्दूक की क्रांति का इंतजार करे। बन्दूक की क्रांति की कोई संभावना नहीं थी, क्योंकि महात्मा गांधी के विरासत और अहिंसा का सिद्धांत बहुत गहरी थी, आजाद भारत में जवाहर लाल नेहरू और राममनोहर लोहिया का व्यक्तित्व और कृतित्व के सामने कम्युनिस्टों की बन्दूक क्रांति हो ही नहीं सकती थी। कम्युनिस्ट यह मानते हैं कि उन्हें महात्मा गाधी के अहिंसा के सिद्धांत और नेहरू-लोहिया का विशाल व्यक्तित्व और पहचान ने साम्यवाद के विकास में अवरोधक का काम किया। कम्युनिस्टों ने मजबूरी में भारतीय लोकतंत्र के अंदर अपनी सक्रियता के लिए रंजामंद हुए। 1957 में उन्होंने संसदीय चुनाव लडने का फैसला किया। केरल में उनकी पहली सरकार बनी थी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था, कुछ निर्दलीय विधायकों के सहयोग से सरकार बनायी थी। लेकिन उनकी बंदूक की क्रांति की मानसिकता गयी नहीं, हिंसा और अराजकता के प्रति इनका समर्पण गया नहीं। राजनीतिक विरोधियों के प्रति इनकी हिंसा थमी नहीं, ये संवाद के पक्षधर बने नहीं। जवाहरलाल नेहरू सोवियत संघ के प्रति सहानुभूति रखते थे फिर भी जवाहरलाल नेहरू ने केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया था।
केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में इन्होंने लंबे समय तक राज किया है। पश्चिम बगाल में इन्होंने तीस साल से ज्यादा समय तक शासन किया है, त्रिपुरा में भी इन्होंने लगभग तीस साल तक शासन किया है। लेकिन विकास और शांति की कसौटी पर उनकी कोई अच्छी तस्वीर नहीं बनी थी, कोई खास उन्नति के मांर्ग को मजबूत नहीं किया था। पश्चिम बंगाल अंग्रेजो के समय से ही नहीं बल्कि मुगल काल से ही व्यापार और उद्योग का प्रमुख स्थल था और पश्चिम बंगाल की पहचान विकसित प्रदेश में हुआ करता था। आजादी के आंदोलन मे भी पश्चिम बंगाल की भूमिका अग्रणी थी। सुभाष चन्द्र बोस से लेकर खुदी राम बोस तक एक लंबी और समृद्ध परमपरा थी। टाटा और विडला जैसे औद्योगिक धराने कोलकाता और पश्चिम बंगाल को अपना आश्रय बनाया था। इतना ही नहीं बल्कि देश के अन्य उद्योगपतियों ने भी पश्चिम बंगाल को ही अपना व्यापारिक केन्द्र विन्दु बनाया था। कई उद्योग भी पश्चिम बंगाल में थे। उन्नत खेती थी, मछली उत्पादन भी समृद्ध था। कोलकाता शहर रोजगार उन्मुख था और दिल्ली से भी समृद्ध शहर के रूप में कोलकाता की पहचान थी। जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर मार्क्स वादी कम्युनिस्ट पार्टी ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर कब्जा की थी। सीपीएम ने यूनियनबाजी की हिंसा और अराजकता कायम की थी। औद्योगिक ईकाइंयों के उत्पादन और विकास पर इनकी टेढी और हिंसक नजर हुई, इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पश्चिम बंगाल से उद्योग धंधों का पलायन हो गया, उद्योग धंधे बंद हो गये। पश्चिम बंगाल की गिनती पिछडे प्रदेशों में होने लगी। पश्चिम बंगाल को उन्नत और प्रेरक प्रदेश कम्युनिस्ट क्यों नहीं बना पाये, इस पर मथन की जरूरत है। केरल सबसे शिक्षित प्रदेश है, इतना ही नहीं बल्कि केरल पूर्ण शिक्षित प्रदेश है। पूर्ण शिक्षित प्रदेश होने के कारण केरल की समृद्धि विशाल और प्रेरक होनी चाहिए थी। केरल के लोगों की केन्द्रीय सेवाओं में उपस्थिति भी अग्रणी होनी चाहिए थी। लेकिन केरल की समृद्धि कर्नाटक, आंधप्रदेश और महाराष्ट से भी नीचे है। केरल के लोग खाडी देशो में छोटे-छोटे कार्य के लिए जाते हैं। केरल की अर्थव्यवस्था मनीआर्डर पर निर्भर है। कम्युनिस्ट अपने लंबे समय तक के शासन में केरल को भी समृद्ध प्रदेश के रूप में ढाल नहीं सके। त्रिुपरा में कम्युनिस्टो की सरकार के खिलाफ आदिवासियों ने बगावत की थी। त्रिपुरा की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार ने आदिवासियों के विकास और भावनाओं की अर्थी निकाल रखी थी।
भारत के कम्युनिस्ट आज भी उसी विफल और खारिज सिद्धांत के प्रति समर्पित है और प्रेरक है जो अब लगभग विलुप्त हो चुका है। सोवियम संघ के पतन के बाद साम्यवाद की कब्र खुद गयी थी। माओत्से तुंग की मौत के बाद चीन ने बन्दूक की क्रांति से मुंह मोड लिया था और पूंजीवाद को अपना लिया था। पूजीवाद के लिए अपने दरवाजे खोल लिये थे। दुनिया भर की पूजीपतियों के लिए आज भी चीन सबसे पंसदीदा जगह है। चीन में पूजीपतियों के लिए संरक्षण की नीति है। चीन की हायर और फायर नीति दुनिया भर के पूजीपतियो को आकर्षित करती है। हायर और फायर नीति के तहत पूंजीपतियों को मजदूर रखने और उन्हें हटाने का अधिकार प्रदान करता है। सोवियत संघ के कम्युनिस्ट और चीन के कम्युनिस्ट अपने देश के हित पर कभी भी कोई आंच नहीं आने देते थे, कभी कोई परहित को समृद्ध नहीं करते थे। सबसे बडी बात यह है कि मजदूर कभी भी मालिक नहीं हो सकता है, मजदूर को आवश्यक और उसकी मेहनत की कीमत मिलनी ही चाहिए पर मजदूर को मालिक का अधिकार कैसे मिलेगा? फिर कोई धनी व्यक्ति कोई फैक्टरी लगायेगा क्यों? उद्योग धंघे खडा करेगा क्यों? भारत के कम्युनिस्ट इस अनिवार्य सिद्धांत को समझने के लिए आज भी तैयार नही है।
भारत एक उत्सव धर्मी देश है, भगवान राम और भगवान कृष्ण भारत के विरासत और आदर्श हैं। राममनोहर लोहिया कहते थे कि भगवान राम और भगवान कृष्ण का आर्दश और प्रताप ही भारत को महान बना सकता है। राममनोहर लोहिया राम मेला भी लगाते थे। पर कम्युनिस्ट तो राम कृष्ण और सनातन पर कीचड उछालने, लांछित करने में ही गौरव की अनुभूति करते हैं। हिंदू विरोध में ममता बनर्जी की सरकार दफन हो गई, राहुल गांधी और सोनिया गांधी भी हिंदू विरोधी होकर हाशिए पर है। फिर कम्युनिस्ट सनातन विरोधी बनकर शक्तिशाली कैसे रहेंगे? उद्योग धंधों, देश हित का विरोध कर सत्ता प्राप्त करने की मानसिकता हमेशा जनता के हाथों कुचली जाएगी। अति सनातन विरोधी होना और मुस्लिम जिहाद के प्रति उदासीन रहना भी हानि कारक है। फिर भी कम्युनिस्ट अपने आप को बदलने के लिए तैयार नहीं है। कम्युनिस्टों पर जनता का बुलडोजर केरल की तरह आगे भी चलता रहेगा।
— आचार्य श्रीहरि
