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Sunday, June 4, 2023

नेटफ्लिक्स की “डी-कपल्ड” की एक क्लिप से गुस्से में क्यों हैं कट्टरपंथी मुस्लिम और हिन्दू वोक

हाल ही में नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज आई है डी-कपल्ड! यह एक ऐसे जोड़े की कहानी है, जो तलाक लेने की प्रक्रिया में है। एक अंग्रेजी लेखक और उसकी निवेशक पत्नी के बीच की यह कहानी है। इस कहानी में कुछ एक ऐसे दृश्य हैं, जिनपर आपत्ति की जा रही है। हालांकि जिस दृश्य पर आपत्ति है उससे पहले भी एक दो दृश्य ऐसे थे जिन पर बवाल मचना चाहिए था, क्योंकि वह कथित रूप से राष्ट्रवादियों पर हमला थे, पर उन पर बवाल नहीं हुआ।

परन्तु जैसे ही नमाज की बात आई, लोगों को समस्या हो गयी।

एक दृश्य है, जिसमें माधवन दिल्ली एयरपोर्ट पर प्रार्थना कक्ष में जाता है और एक्सरसाइज करने लगता है। जब उस पर एक नमाज पढने वाला आपत्ति करता है कि आप यहाँ पर एक्सरसाइज नहीं कर सकते तो माधवन मन्त्र पढ़ना आरम्भ कर देता है। अब दृश्य पर शोर मचा है। इसे इस्लाम पर हमला जैसा कुछ कुछ बताया जा रहा है। समस्या दरअसल यह है कि इस्लाम और नमाज का इतना तुष्टिकरण किया गया कि अब वह हल्का सा मजाक भी सहन नहीं कर सकते हैं। माधवन का चरित्र इसमें कुछ अजीब है ही, और यदि उसे वास्तव में समस्या है तो क्या वह बिना डिस्टर्ब किए नमाज पढ़ने वाले के पास खड़े होकर एक्सरसाइज नहीं कर सकता?

एक यूजर ने लिखा कि इस वीडियो में नमाज में कैसे बाधा पहुंचाई जाए, इसका वर्णन किया गया है। नेटफ्लिक्स, मनु जोसेफ और माधवन को खुद पर शर्मिंदा होना चाहिए

परन्तु इस पूरे दृश्य में कहीं भी बाधा डालते हुए नहीं दिखाया गया है। एक व्यक्ति नमाज पढ़ रहा है और माधवन जाता है और अपनी एक्सरसाइज करने लगता है। वह बाधा नहीं पहुंचाता, वह कुछ नहीं कहता, वह बस अपना काम करता है। वह न ही बात करता है और न ही कुछ! मगर दूसरा व्यक्ति ही उससे कहता है कि यह प्रेयर रूम है!

और यदि किसी व्यक्ति के आने से नमाज में बाधा पड़ती है, तो सड़क पर जब खुले में नमाज पढ़ी जाती है, तो वहां पर यह बाधित नहीं होती? यही प्रश्न कुछ यूजर्स ने पूछे:

एक यूजर ने लिखा कि वह मुस्लिम के साथ ऐसे क्यों डील करना चाहते हैं? क्या मुस्लिम इंसान नहीं है? क्या उन्हें नमाज पढने का अधिकार नहीं है? और इसमें ब्राह्मणवादी मानसिकता की बात गयी है। अनीस आलम सईद ने लिखा कि नमाज पढ़ रहे मुस्लिमों का मजाक उडाना ब्राह्मणवादी मानसिकता और मुस्लिमों के प्रति नफरत को दिखाता है!

बल्कि यह उलटा है! परेशान व्यक्ति की समस्या न सुनना हिन्दुओं के प्रति नफरत को दिखाता है। कोई भी यह प्रश्न नहीं कर रहा है कि क्या नमाज किसी व्यक्ति के दर्द से बढ़कर है? कोई भी यह प्रश्न नहीं कर रहा है!

नमाज पढने के अधिकार पर किसी ने भी आपत्ति नहीं की है, और कोई कर भी नहीं सकता, परन्तु कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी इसे नमाज का अधिकार बताने के साथ साथ, सर्वधर्म प्रार्थना कक्ष को “designated muslim prayer” अर्थात “नमाज के लिए निर्धारित कक्ष’ बता रहे हैं।

बताते चलें दिल्ली एयरपोर्ट पर जो प्रार्थना कक्ष है, उसमें प्रार्थना करने वाले व्यक्ति की जो मुद्रा है वह नमाज का ही संकेत दे रही है,परन्तु वह दिल्ली एयरपोर्ट अधिकारियों के अनुसार सर्वधर्म प्रार्थना कक्ष है:

जो पिछले ही महीने एक यात्री की शिकायत पर एयरपोर्ट अधिकारियों ने स्पष्ट किया था। उनके अनुसार यह सभी धर्मों के लिए है। इसलिए इरेना अकबर का यह कहना झूठ है कि वह मुस्लिमों के लिए ही निर्धारित स्थान है। फिर उन्होंने गुडगाँव पर नमाज की बात की। गुडगाँव में जब नमाज की बात आती है तो एक बात ध्यान रखने वाली है कि नमाज पर कहीं रोक नहीं है। हाँ, सडकों पर और सार्वजनिक स्थानों पर, नमाज पढने पर आपत्ति है!

इरेना अकबर, वक्फ बोर्ड से यह नहीं पूछती हैं कि वक्फ बोर्ड के पास जो जमीन है, उसका क्या किया जा रहा है? और गुरुग्राम में, हरियाणा में वक्फ बोर्ड के पास कितनी जमीन है? वक्फ किस आधार पर जमीन लेता है, यह सब बात नहीं करती हैं! खैर इरेना अकबर के पास गुडगाँव मामले पर बात करने का अधिकार है और इस फिल्म पर बात करने का भी अधिकार है, और वह बोल रही हैं, परन्तु उनका बोलना सीमित है और केवल और केवल अपने मजहबी एजेंडे तक ही सीमित है।

उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार की गाय के लिए एम्बुलेंस चलाने पर आपत्ति है और लिखते हैं कि “ह्युमेंस लाइव्स मैटर्स!”

खैर मामला अभी उस फिल्म के दृश्य का है। उस फिल्म में शुरू में ही भक्तों या राष्ट्रवादियों पर प्रहार है, पर उन्होंने इसे पिंच ऑफ साल्ट के रूप में लिया, पर कथित सेक्युलर लोगों ने इसे अल्पसंख्यकों पर हमले के रूप में लिया

यह स्पष्ट है कि वह लोग प्रार्थना कक्ष को अपने लिए ही आरक्षित मानकर चल रहे हैं, जबकि कोई भी प्रार्थना कर सकता है, और क्या नमाज किसी परेशान व्यक्ति द्वारा एक्सरसाइज करने से बाधित हो सकती है, जब वह सड़क के शोर से या सार्वजनिक स्थानों के शोर से बाधित नहीं होती?

और सबसे बड़ा प्रश्न यही कि जो लोग मुनव्वर फारुकी द्वारा सीता माता के उपहास का आनन्द उठाते हैं, और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताते हैं, वही लोग अपने लिए इतने संवेदनशील क्यों होते हैं?

संवेदना की परिभाषा इतनी सीमित क्यों है?

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