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Sunday, May 29, 2022

अश्विनी उपाध्याय ने दायर की दिल्ली उच्च न्यायालय ने वक्फ अधिनियम के विरुद्ध याचिका, कहा कि वक्फ अधिनियम धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के विपरीत है!

उच्चतम न्यायालय के वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की है, जिसमें अन्य धर्मों के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हुए वक्फ कानून 1995 के प्रावधानों को चुनौती दी गयी है। उपाध्याय ने याचिका में मांग की है कि न्यायालय यह घोषित करे कि संसद को वक्फ और वक्फ संपत्ति के लिए वक्फ कानून 1995 बनाने का अधिकार ही नहीं है। संसद सातवीं अनुसूची की तीसरी सूची में दिए आइटम 10 और 28 के दायरे से बाहर जाकर ट्रस्ट, ट्रस्ट संपत्ति, धर्मार्थ और धार्मिक संस्थाओं और संस्थानों के लिए कोई कानून नहीं बना सकती।

गैर इस्लामी समुदायों की संपत्तियों पर लागू न हो अधिनियम

उपाध्याय ने न्यायालय से यह आदेश देने की मांग की है कि वक्फ अधिनियम 1995 के तहत जारी कोई भी नियम, अधिसूचना, आदेश अथवा निर्देश हिंदू अथवा अन्य गैर इस्लामी समुदायों की संपत्तियों पर लागू नहीं होगा। वक्फ कानून के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देते हुए उपाध्याय ने कहा है कि इनमें वक्फ की संपत्ति को विशेष दर्जा दिया गया है जबकि ट्रस्ट, मठ और अखाड़े की संपत्तियों को वैसा दर्जा प्राप्त नहीं है।

न्यायालय ही विवादों का समाधान करे

याचिका में मांग है कि न्यायालय घोषित करे कि दो धार्मिक समुदायों के बीच के संपत्ति विवाद को ट्रिब्युनल या अर्ध न्यायिक मंच (क्वासी ज्युडिशियल फोरम) तय नहीं कर सकते। ऐसे विवाद सिर्फ न्यायालय द्वारा ही निपटाए जाएंगे। याचिका में वक्फ कानून की धारा 4, 5, 8, 9(1)(2)(ए), 28, 29, 36, 40, 52, 54, 55, 89, 90, 101 और 107 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। कहा गया है कि ये धाराएं संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 25, 26, 27 और 300ए का उल्लंघन करती हैं। इसके अलावा वक्फ कानून की धारा 6, 7, 83 को भी निरस्त करने की मांग की गई है।

गैर मुस्लिम के साथ भेदभाव

याचिका में कहा गया है कि वक्फ कानून के तहत वक्फ बोर्ड को किसी भी संपत्ति को वक्फ संपत्ति दर्ज करने की असीमित शक्ति दी गई है। इसमें हिंदू और गैर इस्लामिक समुदाय को अपनी निजी और धार्मिक संपत्तियों को सरकार या वक्फ बोर्ड द्वारा जारी वक्फ सूची में शामिल होने से बचाने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है। यह हिंदू और अन्य गैर इस्लामिक समुदायों के साथ भेदभाव है।

विशेष अधिकार देती है कानून की धारा-40

वक्फ कानून की धारा-40 वक्फ बोर्ड को किसी भी संपत्ति के वक्फ संपत्ति होने या नहीं होने की जांच करने का विशेष अधिकार देती है। अगर वक्फ बोर्ड को यह विश्वास होता है कि किसी ट्रस्ट या सोसाइटी की संपत्ति वक्फ संपत्ति है तो बोर्ड उस ट्रस्ट व सोसाइटी को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकता है कि क्यों न इस संपत्ति को वक्फ संपत्ति की तरह दर्ज कर लिया जाए। इस बारे में बोर्ड का फैसला अंतिम होगा उस फैसले को सिर्फ वक्फ ट्रिब्युनल में चुनौती दी जा सकती है। इस तरह ट्रस्ट और सोसाइटी की संपत्ति वक्फ बोर्ड की इच्छा पर निर्भर है।

तीसरे नंबर का भू-स्वामी

याचिका में कहा गया है कि आंध्र प्रदेश हाई न्यायालय ने एपी सज्जादा नसीन बनाम भारत सरकार के केस में 2009 में कहा था कि देशभर में वक्फ की करीब तीन लाख संपत्तियां दर्ज हैं जो करीब चार लाख एकड़ जमीन है। इससे वक्फ देश में रेलवे और डिफेंस के बाद तीसरे नंबर पर सबसे बड़ा जमीन का मालिक है।

तेजी से संपत्तियों पर अधिकार जमाता जा रहा है वक्फ बोर्ड

याचिका में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछले दस साल में वक्फ बोर्ड ने तेजी से दूसरों की संपत्तियों पर कब्जा करके उसे वक्फ संपत्ति घोषित किया है। इसका नतीजा है कि इस समय वक्फ मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ इंडिया की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई, 2020 तक कुल 6,59,877 संपत्तियां वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज हैं जिसमें देशभर की करीब आठ लाख एकड़ जमीन है। याचिकाकर्ता उपाध्याय का कहना है कि वक्फ बोर्ड को अवैध कब्जे हटाने का विशेष अधिकार है। वक्फ संपत्ति का कब्जा वापस लेने के लिए लिमिटेशन यानी समयसीमा से छूट है। जबकि ट्रस्ट, मठ, मंदिर, अखाड़ा आदि धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधक, सेवादार, महंत और प्रबंधन व प्रशासन देखने वालों को इस तरह का अधिकार और शक्तियां नहीं मिली हुई हैं।

इसी याचिका को लेकर अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए उत्तर माँगा है

देखना होगा कि केंद्र सरकार इस मामले पर न्यायालय में क्या उत्तर देती है क्योंकि न्यायालय में भारत सरकार का पक्ष रखने वाले अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने इसे स्वीकार किया है कि यह याचिका बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाती है।

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