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Monday, January 24, 2022

विश्व हिंदी दिवस: हिंदी की शक्ति से भयभीत क्यों हैं वामपंथी?

भारत में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया गया। यह देखना बहुत ही रोचक है कि पिछले कुछ वर्षों से हिंदी को दूसरे प्रकार से अपमानित करने का एक षड्यंत्र आरंभ हो गया है। यह कहा जाने लगा है कि हिंदी अब ऊंचाइयों से नीचे गिर रही है। हिंदी में अब वह बात नहीं रह गयी है। हिंदी अब अपना स्तर खो रही है। आदि आदि!

परन्तु ऐसा अचानक से क्या हुआ है कि वामपंथियों को हिंदी में स्तरहीनता दिखाई दे रही है?  जबकि वास्तविकता यही है कि हिंदी में अब अधिक पुस्तकें आ रही हैं। सोशल मीडिया पर भी हिंदी का बोलबाला है और राजनीति में भी हिंदी के भाषण ही सुने जा रहे हैं। मीडिया, राजनीति, विज्ञापन, गीत,संगीत हर क्षेत्र में हिंदी इस समय उस स्थिति में है जहां से आज से बीस वर्ष पहले सोचा नहीं जा सकता था।

आज से कुछ वर्ष पहले तक हिंदी में बात करना लोग अपनी शान के विरुद्ध समझते थे, एवं हिंदी में लेखन भी बहुत गिना चुना था। हाल ही के कुछ वर्षो में तो हिंदी या तो अकादमी की भाषा रह गई थी या फिर मात्र स्कूलों तक सीमित। परन्तु 1990 के बाद से हिंदी की स्थिति में परिवर्तन होना आरम्भ हुआ। बाजार के खुलने के बाद जैसे जैसे बड़ी कम्पनी भारत में आईं, उन्होंने जनता से जुड़ने के लिए हिंदी में संवाद करना आरम्भ किया।

इंटरनेट पर ब्लॉग्गिंग के आने और सोशल मीडिया के आने के बाद स्थिति एकदम बदल गयी। इसने लोगों को मंच दे दिया। दरअसल, उससे पहले तक हिंदी का कथित “साहित्य” जगत मात्र वामपंथी विचारधारा तक तो सीमित था ही, इसके साथ ही उन लोगों तक ही सीमित था, जिन्होनें अपने परिवार या किसी जुगाड़ के माध्यम से प्रोफेसरशिप, फेलोशिप आदि पाई होती थी।

हिंदी साहित्य पर अकादमी का कब्ज़ा था, या अकादमी पर इन जुगाडू लोगों का कब्जा था, यह नहीं पता, परन्तु ऐसी कविताएँ लिखी जाती थीं या प्रकाशित हुआ करती थीं, जिनका लेना देना जन सरोकारों से नहीं होता था। दरअसल इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री रहते हुए सरकार चलाने के लिए वामपंथियों की सहायता लेनी पड़ी थी और इसके बदले में वामपंथियों ने अकादमिक संस्थानों पर कब्जा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

साहित्य का अर्थ ही हिंदुत्व का विरोध हो गया। राजनीतिक सेक्युलरिज्म जो इंदिरा गांधी ने आरम्भ किया, वह रचनाओं में मुख्य हो गया। एवं हिंदी साहित्य का अर्थ पूरी तरह से हिन्दुओं का विरोध बनकर रह गया। अकादमी में भी वही थे, प्रोफेसरशिप भी उन्हीं की थीं, सारा साहित्य प्रगतिशीलता के नाम पर हिंदुत्व का विरोध बनकर रह गया। हालाँकि उस दौरान भी श्री अटल बिहारी वाजपेई जैसे लोग कविता लिख रहे थे एवं श्री नरेंद्र कोहली जैसे साहित्यकार वह लिख रहे थे, जिनके कारण पाठक हिंदी से जुड़ा हुआ था।

परन्तु देश के खिलाफ या कहें हिन्दुओं के खिलाफ लिखने वाले वर्ग ने न ही अटल बिहारी वाजपेई को और न ही नरेंद्र कोहली को साहित्यकार माना।

यह बहुत रोचक रहा कि जिन्होनें हिन्दू इतिहास से जुड़कर हिंदी लिखी, वह इन वामपंथियों की दृष्टि में हिंदी को नीचा दिखाने वाले या स्तरहीन लेखक हो गए और जिन्होनें हिन्दू विरोधी लाल सलाम वाली कविताएँ लिखीं, वह महान हो गए। हिंदी कविता से रस हटा दिया, अलंकार हटा दिए गए और उसके स्थान पर डाले गए कथित रूप से किसान और मजदूर के स्वर!

और उसमें भी किसान और मजदूर की धार्मिक आस्था पर चोट की गयी। एक काल्पनिक लाल सेना और उसकी जीत की कामना करने वाला साहित्य रचा गया। जैसे शिव मंगल सिंह सुमन की यह कविता

“तना वृक्ष, ज्वालामुखी श्वास में भर,

लुटेरों की दुनिया पे बन कर बवंडर,

समय की डगर पर प्रलय के कदम धर,

चली आ रही है बढ़ी लाल सेना!

———————————–

युगों की रूढ़ियों को कुचलती,

जहर की लहर सी लहरती मचलती,

अंधेरी निशा में मशालों सी जलती,

चली आ रही है बढ़ी लाल सेना!”

लाल सेना एक ऐसा रोमांस बन गयी थी, जो सारे समाधान ला सकती थी। परन्तु लेखकों का लाल के प्रति मोह था, उसने यह नहीं बताया कि लाल ने आखिर कितनी हत्याएं की थीं, और पूंजीवाद का विरोध करते करते वह कैसे उन्हीं का शिकार करते हैं, यह सब इन कविताओं में नहीं बताया गया।

कथित साम्प्रदायिकता का हव्वा दिखाती हुई कविताओं ने हिन्दुओं को ही कठघरे में खड़ा करना आरम्भ कर दिया। और अयोध्या आन्दोलन के बाद से तो यह और भी बढ़ा। बाबरी ढांचा ढहने के बाद और वर्ष 2002 के बाद हिन्दुओं को एकदम कठघरे में खड़े करने वाली कविताएँ लिखी जाने लगीं, कहानियाँ लिखी जाने लगीं।

फिर सोशल मीडिया आया, और सोशल मीडिया पर वह वर्ग मुखर हुआ, जिसपर यह प्रगतिशील आरोप लगाते रहे थे। वह लच्छेदार विमर्श में सिद्धहस्त थे तो यह वर्ग आया पहले तो वह भी इन्हीं की कविताओं की दुनिया में प्रसन्न था। परन्तु धीरे धीरे एकतरफा प्रगतिशीलता की कलई खुलने लगी। और जैसे ही उस वर्ग को यह अनुभूति हुई कि वह वर्ग तो उन्हें ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, उन्होंने इतिहास की वह सच्चाई अपने लोगों के सामने लानी आरम्भ की। जो इन कथित प्रगतिशीलों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से आने नहीं दी थी।

जो ढांचा ढहा था, उस ढाँचे के पीछे का हिन्दुओं का दर्द नहीं दिखाई दिया था, बाबरी मस्जिद पर कविताएँ लिखी गईं:

अयोध्या कहाँ है

जहाँ बाबरी मस्जिद है वहाँ अयोध्या है

अयोध्या में क्या है

अयोध्या में बाबरी मस्जिद है

अयोध्या की विशेषता बताइए

अयोध्या में बाबरी मस्जिद है

अयोध्या में और क्या है

अयोध्या में और बाबरी मस्जिद है

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के अलावा क्या है

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के अलावा बाबरी मस्जिद है

ठीक है तो फिर बाबरी मस्जिद के बारे में बताइए

ठीक है तो फिर बाबरी मस्जिद अयोध्या में है

अपने प्रभु श्री राम के जन्मस्थान से उस अत्याचारी ढांचे को गिराने वाले हिन्दुओं को इन कवियों ने महमूद गजनवी लिखा

इतिहास के बहुत से भ्रमों में से

एक यह भी है

कि महमूद ग़ज़नवी लौट गया था

लौटा नहीं था वह

यहीं था

सैकड़ों बरस बाद अचानक

वह प्रकट हुआ अयोध्या में

सोमनाथ में उसने किया था

अल्लाह का काम तमाम

इस बार उसका नारा था

जय श्रीराम।

ऐसे ही जब 2002 में गुजरात में दंगे हुए, तो गोधरा पर किसी ने नहीं लिखा, और दंगों पर हिन्दुओं को कोसने के लिए न जाने कितनी कविताएँ लिख दी गईं।

परन्तु सोशल मीडिया के आने के बाद गोधरा में जले हुए कारसेवकों के विषय में लोगों ने बातें करनी आरम्भ कीं। और उसके बाद उन्होंने इतिहास से इस्लाम के नरसंहारों की कहानियाँ बतानी आरंभ कीं, और फिर उन्होंने इन लाल सेनाओं ने कितना खून पिया, उसकी कहानियाँ बतानी आरंभ कीं

और फिर हिंदी बेल्ट के ही लोगों ने इन प्रगतिशीलों की प्रिय कांग्रेस को दहाई के आंकड़ों तक पहुंचाया। बार बार हिंदी को इन्होनें साम्प्रदायिक स्थापित करने का प्रयास किया, बार बार हिंदी बेल्ट के साधारण लोगों ने इन जुगाडू फूले गुब्बारा लेखकों को तथ्यों से दर्पण दिखाया।

जिस बाबरी ढाँचे को उन्होंने बार बार अपनी रचनाओं में शहीद बताया, उसके पीछे के इतिहास पर इसी हिंदी ने बात की।

आज का कथित “वाम” बौद्धिक समाज हिंदी के लोक की इस शक्ति से भयभीत है क्योंकि वह अब तथ्यों पर बात करती है। पहले उनका वह उपहास करता था क्योंकि उसे लगता था कि यह वर्ग पढ़ा लिखा नहीं हैं। अब उसी वर्ग ने न जाने कहाँ कहाँ से सन्दर्भ लाकर उन्हीं “वाम” बौद्धिकों के मुंह पर मारने शुरू कर दिए हैं, इसलिए उन्हें हिंदी अब पिछड़ी लग रही है।

जब तक बाबरी को शहीद बताने वाले हिंदी में छाए थे, गुजरात में हिन्दुओं को गाली देने वाले लोग हिंदी में अपनी मर्जी की कहानी छाप रहे थे, हिंदी बेहतर थी, जब तक हिंदी में प्रभु श्री राम को अपशब्द कहे जा रहे थे, हिंदी महान थी, परन्तु जैसे ही अब हिंदी में “जय श्री राम” का नारा लगाने वाले लोग आ गए, और यह पूछने वाले लोग बढ़ गए कि “कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा पर मौन क्यों थे?” तो हिंदी पिछड़ी हो गयी!

इनके लिए हिंदी में प्रतिभा का अभाव हो गया, बाजार ने हिंदी को मार दिया आदि आदि! जैसे ही हिन्दुओं ने स्वर मुखर किया, इनकी ओर से आवाज आने लगी कि हिंदी समाज को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए!

हमें यह स्मरण रखना होगा कि यही वर्ग है जिसने यथार्थ के नाम पर कविता को मार डाला है, जिसने यथार्थ के विवरण के नाम पर हिन्दुओं के इतिहास को समाप्त करने का पाप किया है, इसने यथार्थ के विवरण के नाम पर हिन्दुओं की आस्था को अपमानित किया है और कट्टर इस्लामिक साहित्य रचा है।

और अब अपने षड्यंत्रों की पोल खुलते देख हिंदी को ही नीचा दिखा रहा है, परन्तु “कामरेड”, इतना सुन लीजिये कि भाषा किसी भी लाल सेना से बढ़कर है! आज हिंदी के लेखक उन सभी मिथकों को तोड़ रहे हैं, जो इन लाल प्रेमी हिंदी लेखकों ने लिखे थे, इसलिए सब कुछ ध्वस्त करने का सपना देखने वाले अब स्वयं को ध्वस्त होते देखकर बिलबिला रहे हैं!

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