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Sunday, December 4, 2022

राजा अज एवं इन्दुमती के दाम्पत्त्य प्रेम की कहानी: आज आवश्यकता है ऐसी कथाओं की

आज जब दाम्पत्त्य प्रेम तमाम तरह की शर्तों एवं उलाहनों में दबकर रह गया है, एवं न्यायपालिका, विधायिका, एनजीओ, साहित्य, मीडिया सभी हिन्दू पुरुषों को एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने लगे हैं, विवाह की वैधता पर ही जैसे प्रश्न चिह्न उठाने लगे हैं तो ऐसे में कई बार आवश्यक है कि हम पढ़ें हमारे धार्मिक उल्लेखों में किस प्रकार से दाम्पत्त्य प्रेम का वर्णन है। एवं दाम्पत्त्य प्रेम ही वह कड़ी है जो वैवाहिक संबंधों को बनाए रख सकती है, शेष कुछ नहीं!

आज पढ़ते हैं राजा अज एवं उनकी पत्नी इन्दुमती के दाम्पत्त्य जीवन की कहानी, जिसे वैद्य यशोदा देवी ने अपनी अद्भुत पुस्तक विवाह विज्ञान में इसलिए बताया है ताकि लोग वामपंथी जाल में न फंसे। परन्तु लोग फंस रहे हैं क्योंकि हिन्दू जीवन के इतने सुन्दर रूप को सहज लेने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है।

कौन थे राजा अज?

सबसे पहले तो लोगों को यह पता ही नहीं होगा कि आखिर राजा अज कौन थे? राजा अज का इतिहास क्या है? राजा अज राजा दशरथ के पिता थे। यशोदा देवी ने महादेव एवं माँ पार्वती, प्रभु श्री राम एवं माता सीता तथा राजा अज एवं रानी इंदुमती के प्रेम से भरे जीवन के माध्यम से दाम्पत्त्य प्रेम की व्याख्या की है। महादेव एवं पार्वती तथा प्रभु श्री राम एवं माता सीता की कहानी हम सभी को ज्ञात है, परन्तु राजा अज की कहानी से लोग अनजान हैं।

यशोदा देवी लिखती हैं कि महाराजा रामचन्द्र के बाबा अर्थात अज का विवाह अत्यंत सुन्दर राजकुमारी इंदुमती से हुआ था। इन्दुमती और राजा अज का उल्लेख उन्होंने कालिदास के रघुवंशम महाकाव्य से किया है। इसमें लिखा है कि राजा अज और इन्दुमती के दशरथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। और एक दिन इन्दुमती सहित राजा अज वन विहार के लिए गए थे उसी समय गोकर्णनाथ जी को वीणा सुनाने के लिए नारद जी आकाश मार्ग से जा रहे थे। पवन के लगने से उनकी वीना के ऊपर से फूलों की माला उड़कर इन्दुमती के हृदय पर गिरी और रानी उसके लगते ही मर गयी।

रानी की मृत्यु के उपरान्त राजा अज की व्याकुल मनोस्थिति का वर्णन दाम्पत्त्य प्रेम की पराकाष्ठा है

कालिदास लिखते हैं कि

वपुषा करणोंज्झितेन सा निपतन्ति पतिमप्ययातयत

ननु तैलनिषेकबिन्दुना सह दीपाचिरुपैति मेदिनीम

अर्थात इन्द्रियों के छोड़े हुए शरीर से गिरती हुई उसने पति को भी गिराया, टपकते हुए तेल की बूँद के संग दीपक की लोय भी धरती पर गिरती है।

इधर पत्नी की देह निर्जीव हो रही है और उधर राजा अज जैसे निष्प्राण हुए जा रहे हैं। इस समय कालिदास उस विरह की पीड़ा को लिखते हैं कि दोनों स्त्री पुरुषों के सेवकों का महारुदन होने लगा एवं राजा की मूर्छा तो दूर हो गयी, परन्तु वह उसी प्रकर स्थित रही कारण कि आयु के शेष रहने पर ही औषधि आ उपाय फल देता है। और फिर राजा ने चेतना दूर हो जाने से बिना तार चढ़ी वीणा के समान उस प्रिया को “अतिप्रेमी” ने उठाकर उचित अंक (गोदी) में रखा!

यहाँ पर पति की पीड़ा कितनी भावुक करने वाली है। पढ़ते ही हृदय बींध जाता है, पाठक उस पीड़ा को अनुभव करता है, जिससे होकर राजा अज गुजर रहे हैं। यह साधारण पीड़ा नहीं है, यह आयुपर्यन्त रहने वाली पीड़ा है। परन्तु इस पीड़ा को आज के समय समझने वाला वर्ग कम ही है।

अब आगे उनका विलाप थम नहीं रहा है। कालिदास लिखते हैं कि

मनसापि न विप्रियं मया कृतपूर्व तव किम जहासि माम

ननु शब्द्पति: क्षितेरहं त्वयि में भावनिबंधना रति:

अर्थात अज विलाप करते हुए कहते हैं कि मैंने पहले कभी मनसे भी तेरा विप्रिय नहीं किया, फिर तू मुझे त्यागन करती है। पृथ्वी का पति तो मैं नाममात्र से हूँ, परन्तु मन की प्रीति तो तुझमें ही है!”

फिर आगे अज अपनी प्रिया इन्दुमती को बुद्धि देने में सहायक के रूप में बताते हुए विलाप करते हैं कि

गृहणी सचिव: सखी मिथ: प्रिय शिष्या ललिते कहा विधौ

करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां किन न में हृतम!

अर्थात तू मेरी भार्या, बुद्धि देने में सहायक, एकांत की सखी, गान आदि ललित कलाओं की मेर्री प्रिय शिष्या थी, तुझे कठोर मृत्यु ने हर बता मेरा क्या नहीं हर लिया?

कालिदास रघुवंश- अष्टम सर्ग

कालीदास ने इस कथा को जिस प्रकार लिखा है, वह दाम्पत्त्य प्रेम की वह कहानी है, जिसे आजके भौतिक समय में, छोटे छोटे विषयों को लेकर सम्बन्ध विच्छेद के युग में पढ़ा जाना चाहिए, इन्हें कहानियों में गुंथा जाना चाहिए, जिससे प्रेम की यह कहानियां जीवन के हर क्षण में रच बस जाएं!

होता यह है कि हमारी लड़कियों के सामने प्रेम कहानियों के नाम पर लैला मजनू, शीरी फरहाद, सोहनी महिवाल, रोमियो जूलियट आदि की कहानियां आती हैं, जिनमें मिलन तो है ही नहीं। है तो बस या तो मिलन से पहले का ही विरह! कहीं पूर्णता है ही नहीं, कर्तव्य बोध है ही नहीं!

राजा अज एवं इन्दुमती की कहानी में प्रेम है, विरह है, तो वहीं कर्तव्यबोध भी है, कि राजा अज का कर्तव्य अपने पुत्र एवं जनता के प्रति है! वह राजा दशरथ का पालनपोषण करते हैं, दूसरे विवाह का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है, अत: जो यह आक्षेप लगाते हैं कि भारत में अनिवार्य बहुविवाह रहा था, उन्हें प्रभु श्री राम एवं उनके ही परिवार के राजा अज की कथा कम से सुननी चाहिए।

हमारी लड़कियों एवं लड़कों के सम्मुख दाम्पत्त्य की मधुर कथाओं को लाने का उत्तरदायित्व कथाकारों का है, ताकि वह प्रेम के वास्तविक रूप को समझें एवं छोटे छोटे झगड़ों को लेकर न्यायालय में न चले जाएं, जहाँ पर वह एक दूसरे ही षड्यंत्र का शिकार हो जाते हैं!

तभी यशोदा देवी ने भी विवाह विज्ञान पर लिखने से पूर्व भूमिकाओं में तमाम प्रेम कहानियों का उल्लेख किया है, जिससे लोग प्रेम एवं कर्तव्य को समझ सकें!  तभी वामपंथी विमर्श में से वह गायब हैं!

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