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Thursday, October 6, 2022

राजनीतिक अल्पसंख्यकवाद के चलते समाज में विष घोलता एवं हिन्दू पीड़ा पर अट्टाहास करता हिन्दी साहित्य

हमने अपने पिछले लेख में यह बात की थी कि कैसे प्रगतिशील हिन्दी साहित्य ने हिन्दुओं की लाशों पर साहित्य रचना आरम्भ किया और कैसे विष घोलना आरम्भ किया. आज उससे आगे बढ़ते हैं कि कैसे राजनीतिक पुरस्कारों के लालच में, हिन्दुओं की पीड़ा और हिन्दुओं के निरंतर जीनोसाइड को साहित्य के तौर पर नकारा गया:

राजनीति में जैसे-जैसे अल्पसंख्यक वाद आता गया, वैसे वैसे हिन्दी की रचनाओं में अल्पसंख्यकवाद आता गया। जहाँ प्रगतिशीलता का अर्थ हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को सामाजिक एवं सामान्य ग्रन्थ मानकर अकादमिक विमर्श के नाते नीचा दिखाना होता गया, तो वहीं अल्पसंख्यक की भावनाओं का आदर करते हुए, उनकी भावनाएं आहत न हों, इसका पूरा ध्यान रखा गया। हालांकि अल्पसंख्यक की परिभाषा न ही संयुक्त राष्ट्र संघ में निर्धारित है और न ही भारतीय संविधान में। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350A तथा 350B में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का प्रयोग किया गया है लेकिन इसकी परिभाषा कहीं नहीं दी गई है।

और हाल ही में उच्चतम न्यायालय में यह भी मुकदमा चल रहा है कि प्रदेशों के आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यक का निर्धारण किया जाना चाहिए। आखिर फिर कौन है अल्पसंख्यक, जिनके अधिकारों के हनन के विरोध में हिंदी साहित्यकार पन्ने रंगते रहते हैं और मजे की बात यही है कि उनके लिए बाबर जिसने हिंदुस्तान पर बेइन्तहा जुल्म किए थे, उसका नाम इतना पवित्र हो गया कि उन्होंने कथित बहुसंख्यकों की शताब्दियों की पीड़ा को भी भुला दिया। वर्ष 1992 का विवादित ढाँचे का गिरना, उस वर्ग के लिए कच्चा माल साबित हुआ, जो बार बार हिन्दू साम्प्रदायिकता को कोसते तो थे, परन्तु उसका कोई प्रमाण उनके पास नहीं था।

उनके पास विमर्श था, परन्तु उनके पास उदहारण नहीं था। हालांकि जब विवादित ढाँचे का विमर्श चल रहा था तो उसी समय पूरे देश में कथित अल्पसंख्यक परन्तु कश्मीर में बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय, वहां के अल्पसंख्यक समुदाय के साथ अत्याचारों की हर सीमा पार कर रहा था। परन्तु देश का कवि उसकी ताप को अनुभव नहीं कर पा रहा था, कश्मीर से उठता हुआ पीड़ा का स्वर दिल्ली के मैदानों में आकर दम तोड़ रहा था, क्योंकि जो अत्याचार कर रहे थे, वह तो कथित अल्पसंख्यक थे, तो वह अत्याचार कैसे कर सकते थे?

उन्होंने गिरिजा टिक्कू को मजहबी नफरत के आधार पर जिन्दा ही आरी से काट दिया था, परन्तु गिरिजा टिक्कू का शव वह विमर्श उस वर्ग में हलचल पैदा नहीं कर सका, जो वर्ष 1992 में विवादित ढाँचे ने विध्वंस ने कर दी। उससे पहले भी कारसेवकों पर गोली चलाने की घटना के परिणामस्वरूप मारे गए लोगों के शव भी उस वर्ग के विमर्श में स्थान नहीं पा पाए थे, क्योंकि प्रगतिशीलों के लिए तो रामायण और महाभारत कथाएँ थीं, इतिहास नहीं, और कश्मीर में गिरिजा टिक्कू को जो मार रहे थे, वह कथित अल्पसंख्यक थे, तो कहीं न कहीं राजनीतिक विचारधारा ने साहित्य के एक बड़े वर्ग को मानसिक पंगु कर दिया था।

गिरिजा टिक्कू, जिन्हें जिंदा ही आरे से चीर दिया था

गिरिजा टिक्कू पर कश्मीर के कवि दिलीप कौल ने लिखा है

शहीद गिरिजा रैना का पोस्टमार्टम

सर के बीचोंबीच

चलाई गई है आरी नीचे की ओर

आधा माथा कटता चला गया है

आधी नाक

गर्दन भी आधी क्षत विक्षत सी

बिखर सी गई हैं गर्दन की सात हड्डियां

फिर वक्ष के बीचों बीच काटती चली गई है नाभि तक आरी

दो भगोष्ठों को अलग अलग करती हुई

दो कटे हुए हिस्से एक जिस्म के

जैसे एक हिस्सा दूसरे को आईना दिखा रहा हो

……………………

मूर्ख हो तुम

उसे तो दो टुकड़ों में काटा ही इसलिए गया था

कि पीढ़ियों तक बहती रहे यह पीड़ा

तुम बोलो न बोलो

कान सुनें न सुनें

आरी चलती रहे खोपड़ी को बीच में से काटकर पहुंचे भगोष्ठों तक

कि तुम्हें याद रहे

मातृत्व का राक्षसी मर्दन

……………………

हां कटी हुई अंतड़ियों के छेद को दबाया तो

हरे साग और भात के अंश मिले

घर से खाना खाकर निकली थी यह

कि शाम को वापस आएगी,

देखो अलग अलग पड़े दोनों हिस्सों के

अलग अलग भगोष्ठों को देखो

देखो जमे हुए काले पड़ रहे रक्त के साथ मिला हुआ

श्वेत द्रव्य

मध्य युगीन रेगिस्तानी वासनाओं का

विक्षिप्त, नृशंस वीर्य

चिल्लाता हुआ ऐ काफ़िरो ऐ ज़ालिमो

किसी को सज़ा नहीं मिलेगी

……………………

यह एक लम्बी कविता है, और इसमें गिरिजा टिक्कू के बहाने हिन्दुओं का वह दर्द है, जो सदियों से रिस रहा है, परन्तु साहित्य में दिखाई नहीं देता!

गिरिजा टिक्कू को वर्ष 1990 में आरे से जिंदा ही काट दिया गया था!

परन्तु दिलीप कौल की यह कविता और इस कविता का पोस्टमार्टम भी राजनीतिक अल्पसंख्यकवाद की मलाई चाट रहे साहित्यिक वर्ग को इस सत्य को स्वीकारने पर बाध्य नहीं कर सका कि गिरिजा टिक्कू सहित कई और स्त्रियों के साथ क्या अन्याय हुआ है, बल्कि जो राजनीति थी कि जगमोहन ने पंडितों को भगाया क्योंकि “अल्पसंख्यकों” को बदनाम किया जा सके, यह विमर्श साहित्य में छा गया।

और उसके बाद उन्होंने अपने इसी राजनीतिक विमर्श को स्थापित करने के लिए वर्ष 1992 में विवादित ढाँचे के विध्वंस का सहारा लिया। उससे पूर्व कश्मीर में टूटे हुए मंदिर उन्हें नहीं दिखाई दिए, उन्हें पाकिस्तान में टूटते हुए मंदिर नहीं दिखाई दिए, परन्तु इस घटना ने उन्हें कच्चा माल दे दिया और फिर उन्होंने “राजनीतिक अल्पसंख्यकवाद” को पूरी तरह से अपनी कविताओं में समाहित कर दिया।

सोमनाथ जब तक हिन्दू पीड़ा दिखा रहा था, तब सज्जाद जहीर ने उसकी बात करने वाले कन्हैया लाल मुंशी को प्रगतिशील मानने से इंकार कर दिया था, परन्तु उसी प्रगतिशील साहित्य ने अपने प्रभु श्री राम के जन्मस्थान के लिए बलिदान होने वाले कारसेवकों को महमूद गजनवी की संज्ञा दे दी, नरेश सक्सेना ने लिखा:

इतिहास के बहुत से भ्रमों में से

एक यह भी है

कि महमूद ग़ज़नवी लौट गया था

लौटा नहीं था वह

यहीं था

सैकड़ों बरस बाद अचानक

वह प्रकट हुआ अयोध्या में

सोमनाथ में उसने किया था

अल्लाह का काम तमाम

इस बार उसका नारा था

जय श्रीराम।[1]

इसके बाद जैसे हिन्दुओं को और प्रभु श्री राम को हिंसक स्थापित करने का अभियान आरम्भ हो गया, एवं जैसे जैसे राजनीति की दिशा बदलती गयी, हिन्दुओं के विरुद्ध नैरेटिव और तेज होता गया। गोधरा में आग अपने आप लगी थी या कारसेवकों ने ही लगाई थी, यह विमर्श जब जब राजनीति में आया, गोधरा काण्ड में जलने वाले कारसेवकों की पीड़ा साहित्य की मुख्यधारा में स्थान नहीं पा पाई जबकि उसके बाद हुए दंगे जिनमें हिन्दू भी मारे गए थे, परन्तु राजनीतिक अल्पसंख्यक वाद के चलते मात्र मुस्लिम पीड़ा पर ही बात हुई, कविताएँ लिखी गईं।

प्रगतिशील मंगलेश डबराल ने गुजरात दंगों पर लिखा

गुजरात के मृतक का बयान

पहले भी शायद मैं थोड़ा थोड़ा मरता था

************************

अल्युमिनियम के तारों से छोटी छोटी साइकिलें बनाता बच्चों के लिए

इस के बदले मुझे मिल जाती थी एक जोड़ी चप्पल एक तहमद

दिन भर उसे पहनता रात को ओढ़ लेता

आधा अपनी औरत को देता हुआ

मेरी औरत मुझसे पहले ही जला दी गई

वह मुझे बचाने के लिए खड़ी थी मेरे आगे

और मेरे बच्चों का मारा जाना तो पता ही नहीं चला

वे इतने छोटे थे उनकी कोई चीख़ भी सुनाई नहीं दी

************************************

और मुझे इस तरह मारा गया

जैसे मारे जा रहे हों एक साथ बहुत से दूसरे लोग

मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मक़सद नहीं था

और मुझे मारा गया इस तरह जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मक़सद हो[2]

यह अभी लगता है कि राजनीतिक अल्पसंख्यकवाद साहित्य को प्रभावित करता है, जबकि इसकी नींव उसी दिन पड़ गयी थी, जब वर्ष 1935 में प्रोग्रेसिव लिटरेचर एसोसिएशन की स्थापना की गयी थी और हिन्दू पीड़ा के इतिहास को जबरन विमर्श से बाहर कर दिया गया था। जब पीड़ा ही नहीं रहेगी तो उसका विमर्श कहाँ से रहेगा और उसके बाद जिस प्रकार राजनीतिक विचारधारा ने आकर उस लेखक संघ का समर्थन किया, उससे भी अंतर पड़ा।

सबसे रोचक यह रहा कि इस कथित प्रगतिशीलता में भी फैज़ अहमद फैज़, जो पूरी तरह से एक मजहब विशेष की बात करते थे, वह प्रगतिशील हो गए और जो बुत गिरवाने की बात करते थे, जो मुस्लिम श्रेष्ठता का विमर्श करते थे वह क्रांतिकारी हो गए,

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो लोह-ए-अज़ल में लिखा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां

रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव तले

ये धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

यह राजनीतिक अल्पसंख्यक वाद का ही प्रभाव था कि स्त्रियों की स्वतंत्रता के लिए लिखने वाले तुलसीदास पिछड़े हो गए, और

गर हो कशेशे शाहे खुरासान तो सौदा,

सिजदा न करूँ, मैं हिन्द की नापाक जमीं पर!

लिखने वाले सौदा प्रगतिशील हो गए।

औरतों को परदे में रखने वाले शेर प्रगतिशील हो गए

“बेपर्दा नज़र आयीं जो कल चन्द बीबियां

  अकबर ज़मीं में ग़ैरत-ए-क़ौमी से गड़ गया

  पूछा जो आप का पर्दा वह क्या हुआ

  कहने लगीं के अक़्ल के मर्दों पे पड़ गया”

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथा लिखने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान पिछड़ी हो गईं, तो वहीं हिन्दू धर्म को बदनाम करने वाली लेखिकाएं प्रगतिशीलता का पर्याय हो गईं।

वर्ष 1935 में स्थापित हुए प्रगतिशील आन्दोलन ने राजनीतिक अल्पसंख्यक वाद का चोला पहना और अपने एजेंडे के अनुसार चलने वाली सत्ता का साथ दिया।

(कथित प्रगतिशील साहित्य की पोल खोल चलता रहेगा!)


[1] https://www.hindwi.org/kavita/ayodhya/naresh-saxena-kavita-7

[2] http://www.pratirodh.com/arts-and-aesthetics/%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4-%E0%A4%A6%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B6-%E0%A4%A1%E0%A4%AC/

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