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Wednesday, October 27, 2021

“डॉटर्स डे” मनाएं, पर फेमिनिज्म के चलते हिन्दू धर्म को पुत्री विरोधी तो न बताएं!

कल विश्व भर में डॉटर्स डे मनाया गया! अर्थात बेटियों का दिन! इस दिन पूरे विश्व में लोग अपनी अपनी बेटियों के साथ गर्व से तस्वीरें पोस्ट करते हैं। बेटियों पर गर्व करना ही चाहिए, क्योंकि हिन्दू धर्म में पुत्र एवं पुत्री का स्थान समान ही प्रदर्शित किया है। स्त्री का मान जितना हिन्दू धर्म में है, उतना शायद ही कहीं मिले। परन्तु होता यह है कि कोई भी पश्चिमी दिन, हिन्दू धर्म को कोसने का दिन बन जाता है।

यह देखना अत्यंत दुखद है कि जिस देश में दक्ष का नाम उनकी पुत्री सती के कारण प्रसिद्ध है, हिमालय और मैना अपनी पुत्री पार्वती के आगमन पर प्रसन्न होते हैं, तो वहीं राजा जनक तो धरती से प्राप्त सीता को ही अपनी पुत्री बना लेते हैं। वह उनके आगमन से उतने ही प्रसन्न होते हैं, जितने किसी पुत्र से हो सकते थे।

यह राजा जनक थे, जिन्होनें अपनी धरती से निकली पुत्री के गुणों के आधार पर ही यह निश्चित किया कि जो भी महादेव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही उनकी पुत्री का वर होगा। महाराज जनक ने अपनी गुणी पुत्री के लिए वर के पराक्रम की परीक्षा ली। 

वाल्मीकि रामायण में बालकाण्ड में लिखा है कि राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के लिए वर के पराक्रम की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वहीं दूसरी ओर वह प्रभु श्री राम एवं लक्ष्मण को देखकर स्वयं आनंदित हो गए हैं, परन्तु परीक्षा वह तब भी लेते हैं! जब महर्षि विश्वामित्र उनसे उस धनुष के विषय में बताने के लिए कहते हैं तो राजा जनक कहते हैं कि हे मुनिश्रेष्ठ, जब मैंने कहा कि मैं अपनी कन्या बिना वर के परीक्षा नहीं दूंगा तो सब राजा इकट्ठे होकर अपने पराक्रम की परीक्षा देने के लिए मिथिलापुरी में आए। उनके बल की रक्षा के लिए मैंने यह धनुष उनके सम्मुख रखा।

फिर उनमें से कोई भी राजा उस धनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया। हे महर्षि, जब मैंने देखा कि कोई भी उस धनुष को उठाने में सफल नहीं है, तो मैंने सभी “अल्पवीर्य” (अत्यधिक दुर्बल) जानकर अपनी कन्या नहीं दी।  हे मुनिराज! तब उन लोगों ने क्रुद्ध होकर मिथिलापुरी को घेर लिया।

इसके बाद क्या कहते हैं, राजा जनक उसे समझना चाहिए और डॉटर्स डे के बहाने हिन्दू पिताओं और माताओं को नीचा दिखाने वालों को अवश्य पढ़ना चाहिए। वह कहते हैं कि उन लोगों ने अत्यंत क्रुद्ध होकर मिथिलावासियों को बड़े बड़े कष्ट दिए, एक वर्ष तक लड़ाई होने से मेरा धन भी नष्ट हुआ, इसका मुझे बड़ा दुःख हुआ और फिर मैंने तप द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया। देवताओं ने मेरी सहायता की तथा अपनी सेना दी, अपनी वीरता की झूठी डींगे हांकने वाले वह सभी राजा अपनी सेना एवं मंत्रियों समेत भाग गए।

अर्थात, अपनी उस पुत्री के लिए, जो उन्हें भूमि से प्राप्त हुई थीं, उनके लिए भी वह इस सृष्टि के सबसे शक्तिशाली राजाओं से लड़ने के लिए तैयार थे, परन्तु उन्होंने अपनी कन्या किसी गलत हाथों में नहीं दी।

विडंबना यही है कि पिता के रूप में अत्यंत उच्च स्थान रखने वाले जनक को भी आज ऐसे पिता के रूप में माना जाता है, जिन्होनें अपनी पुत्री के साथ अन्याय किया। यह कुपढ़ता की सीमा है।

दो और उदाहरण हैं, एक है सूर्या सावित्री का एवं सावित्री का।

सूर्या सावित्री का उल्लेख ऋग्वेद में है। उन्हें सूर्य की पुत्री कहा जाता है, एवं उन्होंने ही विवाह सूक्त की रचना की है। विवाह में वर, वधु को कैसे ले कर जाए, कैसे उनकी समस्त विपदाएं राह से मिट जाएं, कैसे सभी देव आकर वर वधु को आशीर्वाद दें एवं क्या पति, पत्नी, श्वसुर गृह वालों के कर्तव्य हैं, उस सूक्त में सूर्या सावित्री ने लिखा है।

पुत्री को दी जाने वाली स्वतंत्रता में सबसे उच्च नाम है, मद्र नरेश अश्वपति का। उनके कोई संतान नहीं थी, अत: उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए सावित्री देवी की उपासना की, जिसके परिणामस्वरूप एक अत्यंत ही सुन्दर कन्या की प्राप्ति उन्हें हुई। महाराज अश्वदेव ने उस कन्या का नाम ही सावित्री रख दिया।

सावित्री इतनी रूपवती एवं गुणों से परिपूर्ण थी कि महाराज अश्वपति ने स्वयं को उनके लिए कोई योग्य वर खोजने में सक्षम नहीं माना तथा उन्होंने अपनी पुत्री से ही कहा कि वह अपने लिए अपने योग्य वर खोजने के लिए पूरे देश की यात्रा करें। यह किसी भी पिता द्वारा अपनी पुत्री पर किया गया सबसे बड़ा विश्वास है। यह पुत्री का मान है। उसके उपरान्त यह जानते हुए भी कि सत्यवान की आयु मात्र एक ही वर्ष है, अपनी पुत्री के प्रेम की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए, वह उनका विवाह सत्यवान से तब करते हैं, जब वह राजा नहीं हैं।

अर्थात उन्होंने अपनी पुत्री के प्रेम का ही सम्मान नहीं किया, बल्कि अपनी पुत्री के चयन पर आँखें मूँद कर विश्वास किया।

जिस देश में ऐसे पिता हुए हैं, जिस देश में पिताओं ने आगे बढ़कर अपनी पुत्रियों को हर प्रकार की स्वतंत्रता प्रदान की, सत्यवती के पिता निषादराज का पुत्री प्रेम हालांकि स्वार्थ से भरा हुआ है, परन्तु वह अपनी पुत्री के लिए है। उन्होंने स्वयं के लिए तो कुछ नहीं माँगा!

परन्तु यह अत्यंत दुखद है कि पश्चिम से उधार लिया गया कोई भी दिवस हो, उसकी परिणिति हिन्दू धर्म को ही नीचा दिखाने के साथ होती है। जबकि वेदों से लेकर अब तक हिन्दू माता-पिताओं द्वारा अपनी पुत्रियों पर किया गया विश्वास एवं सहज आचरण में स्वतंत्रता परिलक्षित होती है।

महाभारत में कुंती भी दत्तक पुत्री ही थीं। कालान्तर में मजहबी आक्रमणकारियों के कारण कुरीतियों का आगमन हुआ और हिन्दू समाज कई बेड़ियों में फंस गया, परन्तु यह देखना दुखद है कि जब भी भारत में पश्चिम से आयातित कोई भी दिवस मनाया जाता है, तब कुरीतियों को लाने वाले समुदाय पर कोई प्रश्न नहीं उठाता, न ही यह कोई बताता है कि आज भी हिन्दू धर्म में ही स्वयं में आई कुरीतियों से लड़ने का साहस है तथा वह स्वयं ही कुरीति को मिटाता है, परन्तु एक बड़ा वर्ग है वह हिन्दू धर्म को दूषित करने वाले, भारत को तोड़ने वाले मजहब को उद्धारक या मसीहा ही बताकर काले बुर्के में कैद हो जाता है,  या फिर ननों पर कविता लिखने की पाबन्दी लगाने वाले सफ़ेद जहर में खो जाता है!

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