बारा नरसंहार: नक्सली आतंक की वह खौफनाक रात जिसे देश नहीं भूल सकता

12 फरवरी 1992 की रात बिहार के गया जिले के बारा गांव पर ऐसी आफत टूटी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी के आतंकियों ने 34 ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी। इस घटना ने नक्सली हिंसा के उस क्रूर चेहरे को सामने रखा, जिसे भुलाना आसान नहीं है।

टेकरी प्रखंड का बारा गांव गया शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है। उस समय गांव में करीब 50 घर थे। इनमें से लगभग 40 परिवार भूमिहार समाज के थे। इसके अलावा छह ब्राह्मण, एक बढ़ई, एक तेली और दो अनुसूचित जाति के परिवार यहां निवास करते थे। अधिकांश परिवारों के पास तीन से चार बीघा तक जमीन थी, जबकि किसी के पास भी छह बीघा से अधिक भूमि नहीं थी। गांव का कुल रकबा लगभग 300 बीघा था। आसपास के खुलुनी, देहुरा और नेन बिगहा जैसे गांवों में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी रहती थी।

12 फरवरी की रात करीब साढ़े नौ बजे गांव में अचानक बम धमाकों की आवाज गूंजी। लगभग 300 ग्रामीण गहरी नींद में थे। तभी करीब 500 हमलावरों की भीड़ ने गांव को चारों ओर से घेर लिया। भीड़ के साथ एमसीसी के हथियारबंद सदस्य भी थे। हमलावरों ने घरों में आग लगाई और “एमसीसी जिंदाबाद” जैसे नारे लगाए। उन्होंने सवर्ण लिबरेशन फ्रंट के कमांडर रामाधार सिंह उर्फ डायमंड और उनके सहयोगी हरद्वार सिंह के बारे में पूछताछ शुरू की।

कुछ हमलावर खाकी जैसे कपड़े पहनकर घरों में घुसे। उन्होंने तलाशी का बहाना बनाया, लेकिन जल्द ही उनका असली इरादा सामने आ गया। उन्होंने गांव के पुरुषों को घरों से बाहर निकाला, उनके हाथ बांध दिए और महिलाओं व बच्चों को अलग कर दिया। करीब 100 पुरुषों को पास की नहर के किनारे ले जाया गया। वहां उनके पैरों को भी बांध दिया गया।

इसके बाद हमलावरों ने एक भयावह प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने पूछा कि कौन भूमिहार नहीं है। बुधन सिंह, सतीश सिंह और बुंडा सिंह ने खुद को ब्राह्मण बताया और जान बचा ली। एक अन्य व्यक्ति ने भी इसी तरह खुद को अलग बताया और छूट गया। सुरेश सिंह नामक व्यक्ति ने खुद को एमसीसी समर्थक बताया, लेकिन हमलावरों ने उसे भी नहीं बख्शा। इसके बाद हमलावरों ने महिलाओं और बच्चों को वहां से हटने को कहा।

Dramatic protest scene with distressed women and burning background.

फिर नहर किनारे चीखें गूंज उठीं। हमलावरों ने बंधकों के गले तेज हथियारों से काट दिए। जो लोग भागने की कोशिश करते, उन्हें गोली मार दी। पोस्टमार्टम में 34 लोगों की मौत की पुष्टि हुई। चार लोगों को गोली लगी, जबकि बाकी को धारदार हथियारों से मारा गया। यहां तक कि जिन लोगों को गोली लगी, उनके भी गले काटे गए। इस क्रूरता ने पूरे इलाके को सन्न कर दिया।

माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर उस दौर में बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में सक्रिय था। संगठन ने लंबे समय तक सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया। उसने खुद को गरीबों का हितैषी बताया, लेकिन उसने अपने विरोधियों को खत्म करने के लिए हिंसा को हथियार बनाया। बारा नरसंहार भी उसी रणनीति का हिस्सा था। संगठन ने इसे तथाकथित वर्ग संघर्ष की लड़ाई बताया।

साल 2004 में एमसीसी ने पीपुल्स वार ग्रुप के साथ मिलकर भाकपा माओवादी का गठन किया। केंद्र सरकार ने भाकपा माओवादी और उससे जुड़े संगठनों को आतंकी घोषित किया। इसके बावजूद संगठन ने कई इलाकों में हिंसा जारी रखी।

बारा नरसंहार ने साफ कर दिया कि नक्सली विचारधारा डर और खून-खराबे पर टिकी है। हमलावरों ने विचारधारा के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया। उन्होंने न्याय का नारा लगाया, लेकिन उन्होंने इंसानियत को रौंद दिया। उन्होंने सामाजिक संघर्ष का दावा किया, लेकिन उन्होंने सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाया।

इस घटना ने बिहार ही नहीं, पूरे देश को चेताया। समाज ने देखा कि बंदूक और हिंसा से कोई न्याय नहीं मिलता। बारा की वह रात आज भी याद दिलाती है कि जब विचारधारा पर हिंसा हावी हो जाती है, तब सबसे पहले इंसानियत मरती है।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra contributes articles to select media organisations. He is the founding editor of The Tilda Times and holds a postgraduate degree in journalism and mass communication.

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