508 ईसवी में आदि शंकराचार्य केरल में जन्मे थे . परंपरा अनुसार यज्ञोपवित संस्कार के समय ब्रह्मचारी प्रथम भिक्षा अपनी माँ से ही मांगता है . पर आचार्य शंकर ने गाँव में सफाई का कार्य करने वाली महिला के सम्मुख जाकर पाँव पड़े और प्रार्थना करी – माँ, भिक्षाम देहि ! और अन्न ग्रहण किया.
केरल से चलकर ओंकारनाथ तीर्थ में नर्मदा तट पर पहुंचे . और वहां रहकर उन्होंने श्री गोविन्द्पाद से सन्यास की दीक्षा ली. करुणा अवतार बुद्ध को भगवान विष्णु का नवम अवतार मानकर, समाज के एकीकरण में क्रन्तिकारी कदम उठाया. और साथ ही बुद्ध की अनेक शिक्षाओं को सनातनी हिन्दुओं के चिंतन से एकाकार कर दिया, जिससे समाज में व्याप्त भेदभाव को कम करने में सफलता मिली.
देश की अखंडता के लिए आदि शंकराचार्य ने चार दिशाओं में गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मय पीठ स्थापित करे । इसके साथ ही सन 547 में दशनामी सन्यासी परंपरा (श्री पंच नाम आह्वान आखड़ा ) स्थापित करी। ये दस हैं: तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती , गिरी, पुरी। इसके बाद दो अखाड़े गुरु नानक देव के पुत्र श्रीचंद ने स्थापित किये। 13 वां आखड़ा निर्मल अखाड़े के रूप में अस्तित्व में आया, जिनके अनुयायी समस्त सिख गुरु और गुरु ग्रंथ साहिब के उपासक होते हैं। शुरू में सन्यासी, बैरागी और उदासीन अखाड़े मणि, अणि, धुनि, और धुआँ के अंतर्गत आते थे।
धर्म की अलख जगाने हैतु अखाड़ों ने मुग़ल-काल में सक्रिय रूप ग्रहण किया । साधुओं के अक्खड़ स्वभाव के कारण भी इन्हें अखाड़ा कहा जाता है। विवाह हत्या जैसे अपराध के कारण उन्हें अखाड़े से निकाल दिया जाता है। पूर्व में सामान्यतः साधु स्वतंत्र रूप से साधना करते थे। उनको एकजुट करने, साथ ही जिससे कि उनके माध्यम से लोगों में धार्मिक-सामाजिक सद्भाव निर्मित हो शंकराचार्य ने अखाड़ों की स्थापना ।
आदि शंकराचार्य के जीवन से बोध होता है कि सामाजिक सद्भाव कोई नई अवधारणा नहीं , बल्कि भारतीय समाज का स्वाभाविक संस्कार है। आज सज्जन शक्ति के जागरण , आचरण में पंच परिवर्तन( स्वदेशी, समरसता, परिवार प्रबोधन, नागरिक शिष्टाचार, पर्यावरण) और निरंतर संवाद की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। समाज का अर्थ समान गंतव्य की ओर बढ़ने वाला समूह है, जिसको लेकर भारतीय चिंतन में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों दृष्टि से सुख की परिकल्पना की गई है।
कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन समाज को जोड़ने का काम सद्भावना करती है। बाहरी रूप से भिन्न दिखने के बावजूद राष्ट्र, संस्कृति और मूल्यों के स्तर पर सभी एक हैं। सद्भावना केवल संकट के समय नहीं , बल्कि हर समय बनाए रखना आवश्यक है। सामाजिक समरसता और निरंतर संवाद समाज की मजबूती का आधार है।
