राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार थे. चिकित्सा विज्ञान में एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त हेडगेवार संघ के प्रथम ‘सर संघ चालक’ के रूप में याद किये जाते हैं. अगले संघ चालक बने गुरु गोलवलकर, जो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के प्रोफेसर भी रहे. एक बार एक पत्रकार ने उनसे प्रश्न किया कि उनकी दृष्टि में देश की सबसे ज्वलंत समस्या क्या है? उनका उत्तर था- ‘ ज्वलंत समस्या , ज्वलंत बनी रहे . पर, हमारा एकमात्र लक्ष्य हिन्दुओं का संगठन खड़ा करना है. संगठन ही शुरुआत है, संगठन ही अंत है.’
इसी प्रकार एक बैठक में एक जिज्ञासु ने उनसे पूछा मेरे गाँव में एक भी ईसाई या मुसलमान नहीं है। तो मेरे गाँव में संघ का क्या काम? तो गुरुजी ने उत्तर दिया कि संघ ईसाई या मुसलमानों के लिए नहीं चलता है । तुम्हारे गाँव क्या, पूरी दुनिया में अगर एक भी ईसाई या मुसलमान न होता और जात-पात में बंटे हिन्दू समाज की ये दशा होती तो संघ चलता ही चलता।
आज सनातन के अपमान को लेकर एक “अभियान” की तरह जो जुटे हुए हैं उनको अपना नेता मानने वालों में हिन्दू भी हैं। दूसरी और , जिसे देश का सर्वाधिक शिक्षित प्रदेश का दर्जा प्राप्त है ऐसे केरल में एक नेता ने कहा कि मजहब नहीं कहता कि औरत सार्वजनिक स्थल पर मर्दों के साथ बराबरी से उठे -बैठे। उसको चाहिए कि वो घर पर ही रहे । इसको लेकर बिग टीवी मलयालम में चल रहे डिबेट-शो में महिला एंकर को घटना की आलोचना करना इतना भारी पड़ा कि प्रतिक्रिया में सड़कों पर उतरी भीड़ ने प्रदेश में स्थित चैनल के दफ्तरों पर हमले करना शुरू कर दिया। दवाब इतना बढ़ गया कि बिग टीवी को इस शो को अपने प्लेटफॉर्म से हटाना पड़ा, माफी के साथ !
जो जिम्मेदारी हिन्दू समाज में संघ-व्हिप-बजरंग दल के भरोसे छोड़ दी जाती है, वही जिम्मेदारी अन्य समुदाय के लोग मिल-जुलकर उठाते हैं। केरल की घटना दिखाती है कि मनचाहा परिणाम चाहिए तो , सोशल मीडिया पर ऊंची आवाज में बात करने के साथ , मैदान पर संगठन भाव धरण कर अपनी- अपनी भूमिका भी निश्चित करिये ।
एक वो हैं जिन्होंने अमन-भाईचारा ; गंगा-जमुनी तहजीब; मानव-सेवा की बातें बोलने के लिए छोड़ रखीं हैं । और भूल जाने के लिए भी तब जब मजहब और रीलिजन पर कोई बात आ जाए । पिछले दिनों जनजाति सुरक्षा मंच के द्वारा आयोजित संगोष्ठी : ‘राष्ट्र की एकता अखंडता के लिए चुनौती: अलग धर्म कोड का कालम ( Other Religions and Persuasion)’ में मध्य प्रदेश जनजाति राज्य आयोग के सदस्य श्री भगत सिंह कहते हैं, हिंदुओं के मतांतरण में लगे कट्टरपंथी समुदाय रीलिजन और मजहब के लिए जीते हैं, जबकि एक हिन्दू को सामान्यता अपने इष्ट देव भी तब याद आते हैं जब स्वयं या स्वयं के परिवार पर कोई बात आती है।
जिनके मन में ये विचार आता हो कि जरूरत पड़ जाए तो देश के लिए ‘मैँ जान भी देने से पीछे नहीं हटूँगा’ तो इसके लिए सीमा पर और देश के अंदर सुरक्षा बल ही काफी। इतनी सी बात समझने के लिए इतिहास ही काफी है कि हिन्दू-समाज अंदर से पहले कमजोर हुआ है, बाहर से संकट बाद में आये। सामान्य हिन्दू के लिए सदा से एक ही बात की अपेक्षा महसूस की जाती रही है कि “भूल कर भी मुख में जाति पंथ की न बात हो”।
बताया जाता है कि ब्रिटिश इंडिया में मतांतरण को उतनी गति प्राप्त नहीं हो सकी थी, जितनी आजाद भारत में। 1978 में कल्याण आश्रम अरुणाचल प्रदेश में पहुँच गया था। लेकिन उसके बाद 40% से अधिक लोग हिन्दू धर्म छोड़ चुके हैं ! ऐसा इसलिए क्योंकि सामान्यतः हिन्दू समाज को जो-संगठन बल के कार्य एक अभियान की तरह लगते है , वो मिशनरी के लिए नियमित कार्य है।
दूसरे शब्दों में, स्वयं के अस्तित्व से जुड़े जनसांख्यकि-असंतुलन या सीमा-पार घुसपेठ और मतांतरण के जिस कार्य को एक सामान्य हिन्दू , विहिप या आरएसएस का मान कर तसल्ली कर लेता है, वहीं अन्य समुदाय का व्यक्ति और उसका परिवार “मिशन” और “जिहाद” को अपना कार्य ही नहीं, परम कर्तव्य मानकर चलता हैं। इसके चलते मतांतरित लोगों के साथ घुलने-मिलने अपने जैसा बना लेने और अंतत: अपने में मिला लेने की पाचन-शक्ति भी उनका सहज गुण में शामिल हैं। और , कहा जाता है कि इसलिए ही चर्च के अधिकतर बिशप जनजाति समाज से ही निकले हुए मिलेंगे।
