– रामनवमी हिंसा के सबसे चर्चित मुकदमे में सभी 11 आरोपी बरी; गवाहों के पलटने, कमजोर जांच ने बदल दी पूरी तस्वीर
अपराध हुआ, क्या इसे कोई नकार सकता है? उत्तर होगा नहीं, क्योंकि जो खरगौन में 10 अप्रैल 2022 को रामनवमी जुलूस के दौरान घटा था, उसके साक्ष्य किसी न किसी रूप में आज भी मौजूद हैं। अचानक भड़की सांप्रदायिक हिंसा, पथराव, आगजनी, गोलियों की आवाज, तीन सप्ताह तक कर्फ्यू और उसके बाद बुलडोजर कार्रवाई को सभी ने होते हुए देखा है।
मध्य प्रदेश का खरगोन उन दिनों पूरे देश की सुर्खियों में था। पुलिस ने इसे सुनियोजित हिंसा बताते हुए 11 लोगों को आरोपी बनाया और दावा किया कि भीड़ ने घरों और संपत्तियों को निशाना बनाया, लेकिन चार वर्ष बाद, इसी मामले में अदालत ने सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। गवाह अदालत में मुकर गए, आरोपियों की पहचान प्रमाणित नहीं हुई, जांच की कई प्रक्रियागत कमियां सामने आईं।
इसके साथ ही यह फैसला एक बार फिर यह बता गया कि भले ही अपराध किया गया हो, किंतु यदि उसके साक्ष्य समाप्त कर दिए गए हैं, गवाहों को अपने पक्ष में कर लिया गया हो, यदि अपराध करते वक्त अपनी पहचान छिपाने के लिए पूरी तरह से सावधानी बरती जाती है और जो भी डिजिटल सबूत बन सकते हैं, उन्हें यदि घटना या अपराध करते वक्त अपने से दूर रखकर यदि अपराध किया जाए तो अंतत: न्यायालय में जिस प्रक्रिया से दोष सिद्धि होती है, जरूरी नहीं कि उसमें अपराधी पर अपराध सिद्ध हो जाए या कहें जो आरोपित है, उस पर अपराधी होने की सजा न्यायालय सुना दे।
इस मुकदमे के इस तरह से हुए अंत ने यह भी याद दिलाया है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में निर्णय आरोपों पर न होकर प्रमाणों की मजबूती पर आधारित होते हैं।
चार साल बाद आया सबसे चर्चित फैसला
खरगोन के चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश मुकेश नाथ ने 27 जुलाई 2026 को सत्र परीक्षण क्रमांक 75/2022 में फैसला सुनाते हुए सभी 11 आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साबित नहीं कर सका कि आरोपियों ने ही दंगा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया था। आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के लिए आरोपों का ‘संदेह से परे’ सिद्ध होना आवश्यक है और इस मामले में अदालत को ऐसा नहीं लगा।
क्या था पुलिस का दावा?
अभियोजन के अनुसार 10 अप्रैल 2022 की शाम रामनवमी जुलूस के दौरान भाटवाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए। आरोप था कि भीड़ ने पथराव किया, घरों और वाहनों में आग लगाई तथा पेट्रोल बम फेंके। इस हिंसा में कई मकान क्षतिग्रस्त हुए, वाहनों को आग के हवाले किया गया और एक व्यक्ति की मृत्यु भी हुई। पुलिस ने इबादत अली, सादिक, अब्दुल्ला, साहेब उर्फ साहिब, शहरयार, फैसल, आजम, शब्बीर, इमरान, मुश्ताक और राजिक सहित 11 लोगों को आरोपी बनाया। उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया गया।
अदालत में क्यों कमजोर पड़ गया अभियोजन?
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने 13 गवाह पेश किए। इनमें से आठ प्रमुख गवाह, जिनमें स्वयं शिकायतकर्ता भी शामिल थे, अदालत में किसी भी आरोपी की स्पष्ट पहचान नहीं कर सके। कई गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से पीछे हट गए और उन्हें पक्षद्रोही (होस्टाइल) घोषित करना पड़ा।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि केवल किसी व्यक्ति को पहचान लेने का दावा पर्याप्त नहीं है। जब तक गवाह यह स्पष्ट न बताए कि उसने उस व्यक्ति को अपराध करते हुए देखा, तब तक मात्र पहचान के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। यही कारण रहा कि अभियोजन की पूरी कहानी अदालत में कमजोर पड़ती चली गई।
एक गवाह पर टिका था पूरा मुकदमा
मामले का सबसे महत्वपूर्ण आधार वैष्णवी जैन की गवाही थी, जिन्होंने स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बताया। लेकिन अदालत ने पाया कि उनके बयान में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। उन्होंने आरोपियों को चेहरे से पहचानने की बात कही, जबकि उनके पिता और भाई, जो स्वयं गवाह थे, ने अदालत को बताया कि उपद्रवियों ने अपने चेहरे कपड़े से ढक रखे थे।
अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना के 51 दिन बाद उनका बयान दर्ज किया गया और अभियोजन इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सका। इसके अतिरिक्त आरोपियों की कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) भी नहीं कराई गई। ऐसे में अदालत के सामने यह प्रश्न बना रहा कि पुलिस ने भीड़ में मौजूद लोगों में से इन्हीं 11 व्यक्तियों को किस आधार पर आरोपी बनाया।
सवाल अब प्रशासन और स्थानीय लोगों से है, तब ये सभी आरोपित अपराधी नहीं हैं, तो असल अपराधी कौन हैं? क्या यह माना जाए कि खरगौन में 10 अप्रैल 2022 को रामनवमी जुलूस के दौरान कोई घटना घटी ही नहीं थी? जो उस समय जली गाड़ियों के वीडियो आए, घर एवं दुकानों में रखे सामन के जलने के वीडियो आए, एक व्यक्ति जिसमें मारा गया, यह सब जूठ है? कोई व्यक्ति नहीं मरा, कोई दुकान नहीं जली और जो वीडियो तत्कालीन समय में सामने आए थे, वे सभी जूठे थे। हो सकता है उन्हें भी आधुनिक तरीके से फेक रूप में तैयार किया गया हों, कहीं की इंट, कहीं का रोड़ा जोड़ दिया गया हो?
सवाल यह है कि जब कुछ हुआ ही नहीं था तो इतने सालों तक मुकदमा चलाने की क्या जरूरत थी? वे बेचारे इबादत अली, सादिक, अब्दुल्ला, साहेब, शेरयार, फैजल, आजम, शब्बीर, इमरान, मुस्ताक और राजिक निर्दोष थे तो इतने दिन बेकार में उन पर मुकदमा चलाया गया ! हिंसा में 06 पुलिसकर्मियों सहित कम से कम 24 लोग घायल हो गए थे, यह भी सच नहीं है! हिंसा के बाद खरगोन शहर में 3 सप्ताह तक कर्फ्यू लगा था, यह भ जूठ है। और यदि सच में दंगा हुआ, आगजनी हुई, एक व्यक्ति की मौत हुई, लोग घयल हुए, घर, दुकानें, गाड़ियां जलीं तो इसके दोषी भी कोई होंगे ही!
अब सवाल यह है कि यदि ये 11 लोग दोषी नहीं तो असली दोषी कौन? क्या मध्य प्रदेश पुलिस उन्हें ढूंढ पाएगी? क्यो मोहन सरकार का प्रशासन उन्हें यदि वे पाताल लोक में भी छिपे होंगे तो बाहर निकालकर सजा दिला पाएगी या नहीं ? सवाल कई हैं, जिनके जवाब मिलना जरूरी है, अन्यथा यही माना जाएगा कि मुंह पर कपड़ा बांधों, पहचान छिपाओ और अपराध करते रहो, न्यायालयों से तुम दोषमुक्त किए जाते रहोगे, संदेह का लाभ तुम्हें मिलता रहेगा, शासन में हमेशा ऐसे मामलों में आखिर बेबस, बेचारा साबित होता रहेगा!
— डॉ. मयंक चतुर्वेदी
