राष्ट्र-चिंतन: कम्युनिस्ट दुनिया पर भाजपा का परचम

कम्युनिस्टों के सीने पर भाजपा का परचम। भाजपा ने केरल में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करायी है, कम्युनिस्टों की दुनियां और कम्युनिस्टों की सरकार को ऐसी हार दी है जिसकी पडताल करने के लिए चाकचैंबंद कारण भी ढूढने से नहीं मिलेंगे, कम्युनिस्ट दुनिया सिर्फ आश्चर्यचकित ही नहीं है और अपना संहार नजदीक समझ भी रही होगी। तिरूवनंतपुरम नगर निगम की जीत को भाजपा की छोटी जीत के तौर पर समझ कर खारिज करना मुश्किल है, आत्मघाती है और भविष्य के राजनीतिक खतरे के प्रति उदासीनता मानी जायेगी। आखिर क्यों? क्योंकि भाजपा की यह जीत बहुत बडी न होकर भी बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसके संदश काफी दूरदृष्टि वाली है और यह प्रमाणित करती है कि भाजपा ने केरल में अपना जनाधार विकसित करने और कम्युनिस्टां की सरकार को चुनौती देने के लिए दमदार आधार प्राप्त कर लिया है और यह भी प्रमाणित हो चुका है कि केरल में भाजपा के समर्थन बल की शक्ति में वृद्धि हो रही है, भाजपा का नेटवर्क बहुत ही मजबूत हो रहा है तथा भाजपा की विचार धारा भी तेजी से स्वीकार हो रही है। अभी तक केरल दो पार्टी की राजनीति के आगोश में बैठा था। कम्युनिस्ट और कांग्रेस की अगुवाई वाला गठबंधन ही बारी-बारी से सत्ता में आता था, तीसरे पक्ष की कोई गुजाइश ही नहीं बचती थी, तीसरे पक्ष को कोई जनसमर्थन हासिल नहीं होता था। भाजपा का हिन्दुत्व भी कमजोर होता था, भाजपा दमदार ढंग से चुनाव जरूर लडती थी पर दमदार चर्चा के लायक उपलब्धि हासिल नही कर पाती थी। मान्यता यह भी थी केरल में साक्षरता का दर सौ प्रतिशत है, यहां की जनता सबसे अधिक पढी-लिखी है, जागरूक है, समझदार है, सचेत है और कम्युनिस्ट विचार धारा से प्रभावित है, इसलिए भाजपा की धार्मिक घूंटी केरल की जनता को प्रभावित नही करेगी। यह अवधारणा अब पूरी तरह से निर्रथक बन चुकी है, भाजपा की धार्मिक घूंटी अब केरल की जनता के सिर पर नाच रही है।

                 ेजीत और उपलब्धि की प्रशंसा अगर दुश्मन के खेमे से आती है तो जीत और उपलब्धि का अर्थ महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा की जीत की प्रशंसा भाजपा विरोधियों ने भी की है। कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने कहा कि मेरे संसदीय क्षेत्र तिरूवनंतपुरम में भाजपा की जीत का स्वागत है। उन्होंने आगे कहा कि मेरे संसदीय क्षेत्र में भाजपा की जीत अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि तिरूवनतपुरम केरल की राजधानी है और यहां पर पढे-लिखे लोगों की उपस्थिति दमदार है, केरल के हर वर्ग की यहां पर उपस्थिति है। खासकर कम्युनिस्टों ने भी भाजपा की इस जीत को एतिहासिक माना है और भाजपा के बढते प्रभाव का प्रमाण माना है। हालांकि कम्युनिस्टों की दुनियां ने प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा की प्रशंसा करने से बचने का काम किया है। ज्ञातव्य है कि भाजपा ने केरल के तिरूवनंतपुरम नगर निगम के चुनाव में अपना परचन लहाराया है, यानी की शानदार जीत हासिल की है, 101 नगर पार्षद वाले नगर निगम में 50 सीटे जीती है। जानना यह जरूरी है कि तिरूवनतपुरम पर कम्युनिस्टों का एक छ़त्र राज रहा है। तिरूवनतपुरम नगर निगम पर कम्युनिस्टों का 40 साल से कब्जा रहा है, कम्युनिस्टों के इस कब्जे को कांग्रेस भी मुक्त कराने का पराक्रम नहीं दिखा पायी थी। कम्युनिस्ट तिरूवपनंतपुरम नगर निगम पर अपनी पकड और सत्ता पर गर्व करते थे और कहते थे कि पढे-लिखे लोगों के बीच कम्युनिस्ट विचारधारा आज भी जिंदा है और सक्रिय है। सिर्फ तिरूवनंतपुरम नगर निगम पर ही कम्युनिस्टों की हार नहीं नहीं हुई है बल्कि अन्य नगर निगमों और नगरपालिका चुनावों में भी कम्युनिस्टों की हार हुई है, कम्युनिस्टों की तुलना में कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन ने ज्यादा जीत हासिल की है और यह प्रमाणित करने का काम किया है कि अब केरल में कम्युनिस्ट सरकार की छवि धूमिल हो चुकी है और अगले विधान सभा चुनावों में कम्युनिस्टों का सूफडा साफ होने वाला है।

               भाजपा शने-शने ही सही पर केरल में दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही है और अपना जनाधार मजबूत कर रही है। यह विधान सभा और लोक सभा चुनावों में भी साबित हो रहा है। लोकसभा 2024 के चुनावों में भाजपा ने बहुत बडी उपलब्धि हासिल की थी और अपना वोट प्रतिशत बढाया था। भाजपा ने करेल में एक लोगसभा सीट पर कब्जा किया था था जहां से मलयालम फिल्म के अभिनेता ने दमदार जीत हासिल की थी। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तिरूवनतपुरम लोकसभा सीट पर भाजपा ने कांग्रेस के छक्के छुडा दिये थे। तिरूवनंतपुरम लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार शशि थरूर काफी कम वोट से चुनाव जीतने में सफल हुए थे। भाजपा की बढती राजनीतिक शक्ति कम्युनिस्टों के लिए मौत का प्रमाण है। आखिर क्यों? इसलिए कि कम्युनिस्टों के आधार पर भाजपा की पहुंच और जीत हासिल हो रही है। कम्युनिस्टों का आधार उदारवादी हिन्दू और ईसाई हैं। मुस्लिम वर्ग तो कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ रहता है, कांग्रेस की निजी जागिर है। मुस्लिम वर्ग के सपोर्ट के कारण ही प्रियंका गांधी और राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की अपनी परमपरागत सीटों को छोडकर केरल जाकर चुनाव लडने और जीतने के प्रति उत्साहित होते हैं और जीत कर संसद में भी पहुंचते हैं। कहने का अर्थ यह है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को केरल में जीत की गारंटी हासिल होती है। कांग्रेस के घोर मुस्लिमवाद के कारण ही उदारवादी और प्रगतिशील हिन्दू कम्युनिस्टों को अपना हितैषी मानते थे और चुनावो में अपना समर्थन देते थे। ईसाई भी लव जिहाद और कट्टरपंथी मुसलमानों के उपद्रवों तथा जिहाद से त्रस्त होकर अपना समर्थन कम्युनिस्टों को देते थे। मुस्लिम जिहादियो द्वारा एक ईसाई प्रोफेसर के हाथ काटने के बाद ईसाई और मुस्लिम झगडे और तनाव भी बढे हैं। इधर कम्युनिस्टों ने भी मुस्लिम कार्ड खेल दिया। मुसलमानों को खुश करने के लिए अनेक छूट और प्रोत्साहन दिये हैं, मुसलमानों की मजहबी भावनाओं को तुष्ट करने के लिए हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने का कार्य किया है। खासकर हिन्दू मंदिरों पर कब्जा करने और उस पर मुसलमान और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओ को स्थापित कराने के लिए नीतियां बनायी गयी, शबरी माला विवाद इसका उदाहरण है। सबसे बडी बात यह है कि हिन्दू मंदिरों की आय पर कम्युनिस्ट सरकार की गिद्ध दृष्टि लगी रहती है। हिन्दू मंदिरों की आय पर कम्युनिस्ट सरकार कब्जा कर लेती है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि हिन्दू मंदिरों की आय से इस्लाम को बढावा दिया जाता है, कहने का अर्थ यह है कि हिन्दू मंदिरों की आय से इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया जाता है, इस्लामिक प्रतीको का निर्माण किया जाता है और विस्तार किया जाता है। यही कारण है कि उदारवादी और प्रगतिशील हिन्दू अब कम्युनिस्टों को अपना दुश्मन मानने लगे हैं और भाजपा की ओर अपना रूख मजबूत कर रहे हैं। भाजपा की जीत के पीछे असली कारण यही है।

            यह अवधारणा अब समाप्त हो गयी है कि कम्युनिस्ट भ्रष्ट नहीं हो सकते हैं, कम्युनिस्ट हमेशा प्रगतिशील और वैज्ञानिक विकास की अवधारणा से जुडे होते हैं। केरल कम्युनिस्ट सरकार के कई भ्रष्टचार योजनाओं और नीतियों की जांच केन्द्रीय जांच एजेंसियां कर रही हैं। करूवन्नूर सहकारी बैंक घोटाला, मसाला ब्रांड घोटाला, मुख्यमंत्री की बेटी से संबंधित भुगतान घोटाला, पेंशन नीति घोटाला, शबरीमाला मंदिर घोटाला, आय से अधिक संपत्ति का प्रसंग घोटाला, स्वर्ण तस्करी घोटाला, बार रिश्वत घोटाला आदि प्रमुख करतूतों से कम्युनिस्ट की सरकार भ्रष्ट और बईमान साबित हुई हैं। इससे कम्युनिस्ट सरकार की जनवादी छवि पर आंच आयी और जनता के बीच कम्युनिस्टों की छवि खराब हुई। भाजपा ने त्रिपुरा में कम्युनिस्टों की 30 सालों की सरकार का संहार किया था और अपनी सरकार बनायी थी। कम्युनिस्टों के गढ पश्चिम बंगाल में भी भाजपा मुख्य विपक्षी दल है। अभी सिर्फ केरल में ही कम्युनिस्ट सरकार में थे और इनका अस्तित्व सक्रिय था। पर भाजपा की दमदार उपस्थिति के कारण कम्युनिस्ट केरल में भी सत्ता से बाहर होने की स्थिति पहुंच गये हैं। कम्युनिस्टों को अब अधाधूंध भाजपा विरोध और हिन्दुओं से अकारण दुश्मनी लेने की आत्मघाती प्रवृति छोड देनी चाहिए और मुस्लिम पक्षधर नीति का त्याग करना चाहिए, नही ंतो फिर भाजपा के प्रचार-प्रसार के बुलडोजर के सामने कम्युनिस्टों की खुशफहमी का संहार होना निश्चित है।

— आचार्य श्रीहरि

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