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Wednesday, December 1, 2021

सामाजिक ताने बाने तोड़ती एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तकें

“फक हिंदुत्व!” “आईस्टैंड विद फिलिस्तीन” “कश्मीर मांगे आज़ादी” “फक ब्राह्मनिज्म” जैसे नारे इन दिनों युवाओं की प्रथम पसंद बन गए हैं। कई बार ऐसे प्रश्न हमारे मस्तिष्क में आते हैं कि आखिर यह सब इन्हें कौन सिखा रहा है? ब्राह्मणों के प्रति इतनी घृणा इनके मस्तिष्क में कहाँ से आ रही है? वह कौन सा सूत्र है जो इतना विष घोल रहा है? तो आज के इन युवाओं के उस समय को देखना होगा, जब उनका मस्तिष्क कच्चा था।

उस समय उन्हें क्या पढ़ाया गया, आधिकारिक रूप से! यह देखना महत्वपूर्ण है। आज हम एनसीईआरटी की कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों के कुछ उदाहरण लेते हैं। कक्षा 7 की सामाजिक विज्ञान के आमुख में यह लिखा हुआ है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा (2005) यह सुझाती है कि बच्चों के स्कूली जीवन को बाहर के जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।

इस सिद्धांत के आधार पर कई उदाहरण इन्होनें आम जीवन से लिए हैं।  परन्तु यहाँ पर यह ध्यान रखा है इन्होनें कि जो भी बुराई की जाए वह केवल और केवल हिन्दू धर्म को ही ध्यान में रखते हुए की जाए।  प्रथम अध्याय का नाम है भारतीय लोकतंत्र में समानता! जैसा नाम से स्पष्ट है कि यह समाज में समानता को ध्यान में रखते हुए लिखा गया है।  परन्तु जिस संविधान का हवाला देते हुए यह समानता का अध्याय लिखने के लिए प्रेरित हुए हैं, वही हिन्दुओं को मुस्लिम या ईसाइयों के समान नहीं समझता, उनसे नीचे समझता है। तभी हिन्दुओं के व्यक्तिगत जीवन पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए तो वह तमाम क़ानून बनाता है, परन्तु मुस्लिमों के लिए उनका पर्सनल लॉ है। इसी भेदभाव को और आगे लाते हुए इस पुस्तक में समाज में जाति प्रथा को लेकर हिन्दुओं को पिछड़ा घोषित कर दिया गया, पिछड़े के साथ साथ अत्याचारी भी, परन्तु मुस्लिम एवं ईसाई समाज में फिरकों एवं वर्ग को छिपा लिया गया।

इस पुस्तक में यह नहीं बताया गया कि शेख, सैय्यदों एवं पठान आदि में निकाह के क्या नियम हैं, जबकि देवबंद की वेबसाईट पर यह पूरी तरह से लिखे गए हैं;

http://www.darululoom-deoband.com/english/books/nikah.htm

समानता नामक अध्याय में दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन के हवाले से हिन्दुओं की जातिप्रथा और उच्च जातियों द्वारा अत्याचारों के विषय में बताया गया है। और यह पूरी तरह से स्थापित कर दिया गया है कि उच्च जातियां ही समाज में विघटन का कारण हैं।  यह नहीं बताया कि रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट के अनुसार पसमांदा मुस्लिमों अर्थात नीची जाति वाले मुस्लिमों की स्थिति बहुत खराब है और उनके साथ सामाजिक दुर्व्यवहार भी होता है।

यह इस पुस्तक में नहीं बताया गया कि हजाम, जुलाहा और रंगरेज बराबर के नहीं हैं क्योंकि इनके काम नीच और घटिया हैं। और यह दावा आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ (उत्तर प्रदेश) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पेशे से वकील करते हैं। वह एक पुस्तक हेदाया का उल्लेख करते हुए लिखते हैं। हेदाया को इस्लामी क़ानून की और विशेषकर हनफी विचारधारा की सबसे प्रमाणित पुस्तक माना जता है। जिसे बुरहानुद्दीन अबुल हसन मरगनानी नामक व्यक्ति ने अरबी भाषा में 593 हिजरी में इमाम अबू हनीफा, इमाम अबू युसूफ, इमाम मोहम्मद की बातों को आधार बनाकर लिखी थी ये इमाम चारों खलीफाओं के ठीक बाद के दौर के हैं। हेदाया पर फ़तहुल कदीर नाम से इब्ने हमाम ने टीका लिखी जो बेरुत (लेबनान) से प्रकाशित हुई। इस किताब के पेज नम्बर 193 पर कहा गया है कि हजाम, जुलाहा और रंगरेज बराबर के नहीं हैं क्योंकि इनके काम नीच और घटिया हैं। लेखक ने इनके काम के लिए दनीशब्द का प्रयोग किया है। अरबी जुबान में किसी की हीनता दर्शाने के लिए दनीसे सटीक शब्द शायद कोई नहीं है। इसी पुस्तक के पेज नम्बर 188 में कहा गया है कि- सैयद सैयद के बराबर है, शेख फारुकी, उसमानी, सिद्दीकी लोग आपस में बराबर हैं।इसी पुस्तक में ये हिदायत भी दी गयी है कि- बैतार (गाँव में घूम कर ज़ख्म साफ़ करने वाला), अत्तार (तेल, इत्र बेचने वाला) से शादी कर सकता है, बजाज और अत्तार आपस में शादी कर सकते हैं। दर्जी, रंगरेज, हजाम और फर्राश (झाड़ू देने वाला) एक दूसरे के बराबर नहीं हैं।

परन्तु समानता का पाठ पढ़ाती इस पुस्तक में उस समाज में व्याप्त असमानता को दिखाया ही नहीं गया है, बल्कि इससे परे हिन्दुओं को ही एक बार और कठघरे में खड़ा करते हुए एक मुस्लिम दंपत्ति को हिन्दू क्षेत्र में मकान न मिलने की बात की गयी है। जो हकीकत से कोसों दूर है।  जब पुस्तक में अंसारी दंपत्ति के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करते हुए हिन्दू समाज पर निशाना साधा जा रहा था, तब बहुत छिपाया जा रहा था।

मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से हिन्दुओं के सामूहिक पलायन को छिपाया जा रहा था। कश्मीर से धार्मिक पहचान के आधार पर हिन्दुओं को भगा दिया गया। उन्हें केवल इसलिए मारा गया क्योंकि वह हिन्दू थे। उनकी स्त्रियों का बलात्कार केवल इसीलिए कर दिया गया क्योंकि उनकी धार्मिक पहचान वह नहीं थी जो कश्मीर के बहुसंख्यक समुदाय की थी।

कश्मीरी हिन्दू धर्म के आधार पर अपने ही क्षेत्र से निष्कासन का विरोध करते हुए

जब इस पुस्तक में यह उदाहरण लिया गया कि ओम प्रकाश वाल्मीकि के साथ कथित उच्च जातियों ने क्या किया तो वह कहीं न कहीं एक वर्ग के प्रति विष भरने के लिए ही किया गया है। यह दर्शाने के लिए किया गया कि उच्च वर्ग ही है जो समाज के एक विशेष वर्ग को आगे नहीं आने दे रहा है। जबकि यह हिन्दू समाज ही है, जो अपनी कुरीतियों को मिटाने में सबसे आगे है और जो इतना सहिष्णु है कि वह अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं में भी न्यायालय का सम्मान कर लेता है।

अब दूसरे पहलू को देखते हैं। कक्षा 7 में पढने वाला कोई भी बच्चा जब अंसारी दंपत्ति की कहानी पढ़ेगा परन्तु कैराना या कश्मीर की नहीं तो वह अंसारी या मुस्लिम समाज के व्यक्ति की एक भी खरोंच पर रोने लगेगा और वहीं वह कश्मीरी हिन्दुओं के कटे सिरों पर नहीं रोएगा क्योंकि उसके दिमाग में यह है ही नहीं कि मुस्लिम भी बुरे हो सकते हैं?

वह जब देखेगा कि हिन्दुओं में तो जाति के आधार पर विवाह होते हैं और जातिगत आधार पर इतना भेदभाव होता है, और यह हिन्दू ही हैं जो मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ अत्याचार करते हैं, तो वह आराम से “फक हिंदुत्व” कहते हुए खड़ा हो जाएगा।

दरअसल इन बच्चों को जैसे एक प्रयोगशाला में ऑब्जेक्ट बनाकर प्रयोग किया गया है और उसका परिणाम अब हमारे सामने हैं। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि अभी तक इन पुस्तकों में तनिक भी परिवर्तन नहीं किया गया है और यह अभी तक चल रही हैं।

नई शिक्षा नीति की घोषणा हो चुकी है और अब यह देखना होगा कि क्या यह पुस्तकें रुकेंगी या अभी चालू रहेंगी।


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