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Thursday, December 2, 2021

तीनों कृषि कानून वापस! भारत के लिए हार या फिर है राजनीतिक कदम? या विरोधियों के हाथ में एक नया हथियार!

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को गुरुनानक जयंती के अवसर पर तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। राष्ट्र के नाम सन्देश में उन्होंने कहा कि “हमने सभी तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। हम संसद सत्र में इन कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया आरम्भ करेंगे, जो इस माह से आरम्भ हो रहा है।”

उन्होंने आन्दोलन कर रहे किसानों से अनुरोध किया कि वह अपने परिवार के पास वापस जाएँ और हम एक नई शुरुआत करते हैं।”

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जो भी उन्होंने किया, वह किसानों के लिए किया। वह जो भी कर रहे हैं अब देश के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अपनी मेहनत से जरा भी पीछे नहीं हते हैं। देश के नाम संबोधन में उन्होंने कहा कि मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अब और कठिन श्रम करूंगा, जिससे आपके सपने और देश के सपनों को साकार किया जा सके।

देश में पिछले एक साल से लेकर किसान आन्दोलन कर रहे थे और इन तीनों कृषि बिल को वापस लिए जाने का विरोध कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि यह कानून आवश्यक नहीं थे, बल्कि इन कानूनों पर बहस हो रही थी, इनकी अनिवार्यता पर बात हो रही थी।

प्रश्न कई उठते हैं, सरकार का समर्थन करने वाले यह कह रहे हैं कि इन कानूनों को इसलिए वापस लिया गया क्योंकि देश की सुरक्षा आवश्यक थी।  ऐसा हमने भी देखा था कि भारतीय जनता पार्टी के कई विधायकों का अपमान किया गया, यहाँ तक कि उनके कपडे भी फाड़ डाले गए थे। हम सभी ने देखा था कि कैसे एक लड़की का बलात्कार हो गया था और उस पर सरकार से लेकर आन्दोलनकर्ता तक शांत रहे थे।

इस सरकार ने कुछ सुधारों के माध्यम से जनता में यह विश्वास जगाया था कि वह सुधार करना चाहती है, उसका उद्देश्य उन गंदगियों को साफ़ करना है, जो इतने वर्षों से जम गयी थीं।। जनता ने अपना भरपूर समर्थन दिया था। पर आज इन कानूनों को वापस लिए जाने से उस वर्ग में घनघोर निराशा है, जो सुधारों की आस में था।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस हिंसक आन्दोलन के सामने घुटने टेकना और नागरिकता विरोधी आन्दोलन की हिंसा के सामने समर्पण करते देखना बहुत दुखद है। इन दोनों ही घटनाओं के प्रति सरकार का दृष्टिकोण देखकर देश के सभी वह नागरिक दुखी हैं जो कानून का पालन करते हैं और देश की न्यायपालिका और विधायिका सभी में विश्वास करते हैं।

यदि देखा जाए तो इस मामले में सरकार द्वारा कदम वापस लिया जाना जितना निराश करता है, उतना ही निराश करता है न्यायपालिका का इस आन्दोलन के प्रति दृष्टिकोण। हम देखते हैं कि न्यायपालिका द्वारा भी इस आन्दोलन को लेकर एक ढुलमुल रवैया दिखाई दिया। हालांकि अब उच्चतम न्यायलय द्वारा नियुक्त पैनल सदस्य का कहना यह है कि सरकार का कानूनों को वापस लेने का निर्णय अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है; इससे आन्दोलन समाप्त नहीं होगा!”

और वह गलत नहीं कह रहे हैं। राकेश टिकैत यह कह चुके हैं कि यह आन्दोलन समाप्त नहीं होगा, अभी एमएसपी पर आन्दोलन चलाया जाएगा। आदि आदि!

परन्तु ऐसा नहीं है कि राजनीतिक विरोधी ही इस बात से संतुष्ट हैं। चाहे सीएए आन्दोलन से पैदा हुई हिंसा हो या फिर बंगाल में चुनावों के बाद हुई हिंसा से निपटना, या फिर अब किसान आन्दोलन से निपटने में विफलता, इस सरकार ने निराश किया है। वह हिंसा और विरोध का सामना करने में विफल रही है। तथा ऐसा लग रहा है कि सरकार तो यह है, पर चला उसे वही नेहरु युग के संस्थान रहे हैं।

आज सरकार द्वारा इस प्रकार कदम पीछे खींचे जाने को लेकर उनके प्रशंसक ठगे खड़े हैं।

परन्तु एक प्रश्न यहाँ पर यह खड़ा होता है कि जिन लोगों की तुष्टिकरण के लिए प्रधानमंत्री ने यह कदम उठाया है, वह लोग तो उन्हें प्रधानमंत्री नहीं मानते हैं, और वह इस सरकार को भी नहीं मानते हैं। और बार बार नारा लगाते है जैसे “नॉट माई प्राइम मिनिस्टर!”

तो क्या इस प्रकार सड़क घेर कर, लोगों को मारकर एवं कई प्रकार की हिंसा करके यह आन्दोलनकारी मांग करेंगे कि इस सरकार को हटाया जाए या फिर कल को यह आन्दोलन होने लगेगा कि शरिया लागू किया जाए, इसी प्रकार से हिंसा की जाने लगे? तो क्या सरकार इसी प्रकार घुटने टेकती हुई आ जाएगी? जो भी हुआ है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है एवं प्रधानमंत्री की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है।

अब यह सिलसिला नहीं रुकेगा क्योंकि विरोधियों के मुंह में खून लग गया है और उन्हें यह पता लग रहा है कि कैसे मोदी सरकार को झुकाना है। अब आगे यह देखना होगा कि मोदी सरकार क्या कदम उठाती है क्योंकि आन्दोलन तो वापस होगा नहीं, सड़कें नहीं खुलेंगी!

जो नागरिक इस बात से प्रसन्न हैं कि सड़कें खुलेंगी, तो वह यह मानकर चलें कि विरोधियों द्वारा यह मात्र शुरुआत हो सकती है, अंत कहाँ होगा, नहीं पता!

परन्तु हिन्दुओं के लिए सब कुछ स्पष्ट है। उन्हें दीवार पर लिखी हुई इबारत को पढना है। और वह यही है कि उठो, संगठित हो और अपने समुदाय की रक्षा करो! “राष्ट्रीय हितों” के विषय में चिंता करने से आप कहीं नहीं पहुंचेंगे!

क्योंकि इस कथित किसान आन्दोलन ने उनके सामने यह स्पष्ट कर दिया कि कौन उनके विषय में क्या सोचता है? यह आन्दोलन अंतत: हिन्दू विरोधी और ब्राह्मण विरोधी बन ही गया था. इस कथित आन्दोलन ने खालिस्तान के दबे विचार उभार दिए और यह भी दर्शाया कि यह कितना बड़ा नासूर बन गया है! हिन्दुओं के सामने सब कुछ स्पष्ट है!

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