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Wednesday, November 30, 2022

रामायण रचयिता महर्षि वाल्मीकि जयंती

आज प्रभु श्री राम की कथा को भव्य रूप में प्रस्तुत करने वाले महर्षि वाल्मीकि की जयन्ती है। शरद पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि वाल्मीकि कहा जाता है।  प्रभु श्री राम की कथा को जन जन तक पहुंचाने वाले महर्षि वाल्मीकि का हृदय इतना कोमल था कि क्रौंच जोड़े के वियोग को देख नहीं सके और उनके हृदय से उस बहलिये के लिए क्रोध के रूप में श्लोक फूट पड़ा।

महर्षि वाल्मीकि की काव्य यात्रा प्रेम और विरह से आरम्भ होती है। वही प्रेम और विरह प्रभु श्री राम की इस कथा में भी उभर कर आया है। महर्षि वाल्मीकि, एक दिन अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी में स्नान करने के लिए गए। उन्होंने अपने शिष्य के हाथ से वल्कल लिया और विशाल वन की शोभा देखने के लिए चले गए।

जो लोग हिन्दू ग्रंथों को अपनी यौन कुंठा से कारण पिछड़ा कहते हैं, उन्हें एक बार नहीं कई बार महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण पढनी चाहिए, जिसमें महर्षि वाल्मीकि के मुख से प्रणयरत क्रौंच के जोड़े के वियोग को देखकर कविता फूट पड़ती है। वह करुणा के कवि हैं। वह कुछ लिखना चाहते थे और ब्रह्मर्षि नारद ने उनसे कहा था कि वह इक्ष्वाकु वंश में जन्मे श्री राम की कथा लिखें।

महर्षि वाल्मीकि इस सृष्टि के वह व्यक्ति हैं, जिनकी यह सम्पूर्ण मानव जाति ऋणी है। उन्होंने प्रभु श्री राम के गुणों का जो वर्णन किया है, उसीके आधार पर हर किसी ने अपने अपने राम खोजे। महर्षि वाल्मीकि ने प्रभु श्री राम और सीता माता के प्रेम को जो ऊंचाई दी, वह देना सहज कार्य नहीं था। ऐसा प्रतीत होता है जैसे जब नारद जी ने उनसे कहा था कि वह इक्ष्वाकु वंश के राजा राम की कथा का वर्णन करें, तो वह राम में ही खो गए थे। वह उसी क्षण राम मय हो गए थे, उनमें करुणा भर गयी थी।

और जब उन्होंने उस प्रेम रत क्रौंच के जोड़े को देखा, तो वह प्रेम मय हो गए और जैसे ही निषाद के तीर से क्रौंच के प्राण गए, वैसे ही वह उस क्रौंची के साथ समानुभूति पर आ गए। वह उसके साथ अनुभव नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह वही हो गए हैं। उनके भीतर क्रंदन करती क्रौंची ही जैसे बस गयी है और इसी समानुभूति में उनके मुख से वह श्लोक फूट पड़ता है, जो इस सृष्टि का प्रथम श्लोक है।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शास्वती समा।

यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।

अर्थात हे बहेलिये, तूने जो इस कामोन्मत्त नर पक्षी को मारा है, अत: अनेक वर्षों तक इस वन में ना आया, अथवा तुझे सुख शांति न मिले!

फेमिनिस्ट के झूठ का पर्दाफाश

इन दिनों फेमिनिस्ट हिन्दू धर्म का विरोध यह कहकर करती हैं कि यहाँ पर यौन को वह स्थान नहीं प्राप्त होता है, जो होना चाहिए, और दिमागी रूप से हिन्दू बहुत पीछे है, तो उनके इस झूठ की काट तो सृष्टि के इस प्रथम श्लोक में ही है, जिसमे पक्षी की काम भावना को भी इतना पवित्र माना गया है कि प्रणय रत उस क्रौंच जोड़े के वियोग में वह बिलख उठते हैं। उनकी पीड़ा, हर देहवादी कवि और लेखक के उस झूठ का उत्तर है, जो बार बार यह कहते हैं कि संस्कृत में प्रेम नहीं रचा जा सकता है।

महर्षि वाल्मीकि फिर उसके उपरान्त परमपिता ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार, प्रभु श्री राम की कथा लिखते हैं। परमपिता ब्रह्मा उनसे कहते हैं कि जैसे नारद जी ने उनके सम्मुख प्रभु श्री राम का वर्णन किया है, वैसे ही वह भी प्रभु श्री राम के गुणों का बखान करें।

इसके साथ ही उन्हें परमपिता ब्रह्मा यह भी वरदान देते हैं कि श्री रामचंद्र, श्री लक्ष्मण और श्री जानकी के तथा राक्षसों के जो भी प्रकट एवं गुप्त वृत्तांत हैं, वह उन्हें प्रत्यक्ष दिखाई पड़ेंगे और इस काव्य में कहीं भी महर्षि वाल्मीकि की कोई भी बात मिथ्या नहीं होगी।

महर्षि वाल्मीकि रामायण के माध्यम से मात्र प्रभु श्री राम की कहानी ही नहीं लिखते हैं बल्कि मनु महाराज द्वारा बसाई गयी अयोध्या नगरी का इतिहास भी बताते हैं। वह इतिहास को डॉक्यूमेंट कर रहे हैं।

ब्रह्मा जी कह रहे हैं कि वह श्री रामचन्द्र को मनोहर और पवित्र कथा श्लोकबद्ध अर्थात पद्य में बनाएं और जब तक इस धराधाम पर पहाड़ और नदियाँ रहेंगी तब तक इस लोक में श्री राम जी कथा का प्रचार रहेगा। परमपिता ब्रह्मा ने यह भी कहा कि जब तक महर्षि वाल्मीकि की रची हुई इस रामायण कथा का प्रचार रहेगा तक तक महर्षि वाल्मीकि भी अपने शरीर के रहते इस पृथ्वी पर और तदन्तर  ऊपर के लोक में स्थिर रहेगे।

एक और झूठ कई लोग फैलाते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने प्रभु श्री राम के जन्म से पहले ही सब कुछ देख लिया था, परन्तु वह बालकाण्ड के चतुर्थ सर्ग में यह स्पष्ट करते हैं कि जब श्री रामचंद्र जी अयोध्या के राज सिंहासन पर आसीन हो चुके थे, तब महर्षि वाल्मीकि ने विचित्र पदों से युक्त इस सम्पूर्ण काव्य की रचना की।

प्राप्त राज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर् भगवान् ऋषिः ।

चकार चरितम् कृत्स्नम् विचित्र पदम् अर्थवत् ॥

अत: इससे यह स्पष्ट होता है कि यह इतिहास प्रभु श्री रामचंद्र जी का समकालीन इतिहास है।

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