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Monday, May 23, 2022

इस्लाम में संगीत हराम है, परन्तु जिहाद के लिए गीत संगीत और हर कला का प्रयोग किया गया, जैसे कश्मीर का आजादी तराना

कहते हैं इस्लाम में संगीत हराम है। अफगानिस्तान में जबसे तालिबान की सरकार में वापसी हुई है, तब से वहां पर चुन चुन कर संगीतकारों और गायकों को निशाना बनाया जा रहा है। हम देख ही रहे हैं कि कैसे लोगों को मारा जा रहा है। कश्मीर में भी कला और गीत, संगीत को निशाना बनाया गया था। हम सभी ने देखा था कि कैसे हाल तक में प्रगाश नामक म्युज़िक बैंड की लड़कियों ने धीरे धीरे कश्मीर छोड़ दिया था।

आतंकवाद के आरम्भ के दौर में सिनेमाहाल को निशाना बनाया गया था। यहाँ तक कि औरंगजेब के काल में भी संगीत को हराम घोषित किया गया। परन्तु ऐसा नहीं था कि इस्लाम ने संगीत को प्रयोग नहीं किया, कला को प्रयोग नहीं किया। देखा जाए तो कट्टर इस्लाम ने संगीत को माध्यम बनाकर ही इस्लाम का प्रचार प्रसार किया, एवं जैसे ही इस्लाम फैला वैसे ही गीत और संगीत को हराम कह दिया।

अधिक पीछे न जाकर अभी मात्र कश्मीर तक ही सीमित रहते हैं। कश्मीर में आतंक का दौर आने पर या उसके बाद सबसे पहले गीत और संगीत को ही हराम ठहराया गया। परन्तु आज़ादी के तराने खूब गाए जाते रहे? ऐसा क्यों?

कश्मीर में आतंकी दौर के दौरान एक तराना बहुत मशहूर हुआ था,

जागो जागो सुबह हुवी!

पनुन कश्मीर के संयोजक अग्निशेखर जी भी इसी तराने की बात करते हुए लिखते हैं कि

मस्जिदों के लाऊड-स्पीकरों से अब जंगी तराना बजता है: खून-ए-शहीदां रंग लाया/ फतह का परचम लहराया/ जागो जागो सुबह हुई। रूस ने बाजी हारी है/ हिन्द पे लरजा तारी है/अब कश्मीर की बारी है/ जागो जागो सुबह हुई।।।

यह बात स्पष्ट है कि वह तराने में अफगानिस्तान की धरती से सोवियत की सेनाओं को खदेड़ने की बात है, परन्तु उसका निहितार्थ यही है कि इस्लाम जीत चुका है और अब कश्मीर से भी हिन्दुओं को जाना होगा। जब वह लोग सोवियत संघ का यह हाल कर सकते हैं, तो कश्मीर के हिन्दू हैं ही क्या?

वहीं डॉ दिलीप कौल भी अपनी फेसबुक वाल पर एक तराने को साझा करते हुए कहते हैं कि

“1990 में कश्मीर की हर मस्जिद में बजने वाला गीत। कश्मीरी पंडितों के जीनोसाइड के लिये जिहादियों ने संगीत का बेहतरीन इस्तेमाल किया।“

इस तराने को आप सुनेंगे तो कई भ्रम टूटेंगे। सबसे पहले तो यह कि जब नागरिकता संशोधन वाला आन्दोलन चल रहा था, या फिर अभी जब हिजाब वाला आन्दोलन चल रहा है, तो बच्चों का प्रयोग उनकी ओर से किया जा रहा है। ऐसे में कई बार लोग कहते हैं कि “वह लोग बच्चों को प्रयोग कर रहे हैं!”

इस तराने में भी बच्चे की ही आवाज का प्रयोग किया गया है।

प्रगतिशील माने जाने वाले इकबाल ने भी कौमी तराने लिखे हैं। इकबाल का कौमी तराना पूरी तरह से कट्टर इस्लाम का तराना है। वह लिखते हैं:

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा

मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

————

मग़रिब की वादियों में गूँजी अज़ाँ हमारी

थमता न था किसी से सैल-ए-रवाँ हमारा

बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम

सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा

————-

इकबाल ही वह व्यक्ति थे जिन्होनें हिन्दुओं के आराध्य प्रभु श्री राम को मात्र “इमाम-ए-हिन्द” कहकर सीमित कर दिया था।

और क्रांतिकारी कहे जाने वाले फैज़ भी फिलिस्तीन के लिए सोचते हैं, हिन्दुओं के लिए नहीं!

हम जीतेंगे

हक़्क़ा हम इक दिन जीतेंगे

बिल-आख़िर इक दिन जीतेंगे

क्या ख़ौफ़ ज़ी-यलग़ार-ए-आदा

है सीना सिपर हर ग़ाज़ी का

क्या ख़ौफ़ ज़ी-यूरिश-ए-जैश-ए-क़ज़ा

सफ़-बस्ता हैं अरवाहुश्शुहदा

डर काहे का

परन्तु संगीत तब हराम हो जाता है जब वह कट्टरपंथ का एजेंडा नहीं चलाता है। जब वह मात्र संगीत की बात करता है, तब फतवे दिए जाते हैं। जैसे कश्मीर में प्रगाश बैंड के साथ हुआ था। कश्मीर में प्रगाश बैंड वर्ष 2012 में चर्चा में आया था जब उसने वार्षिक बैंड प्रतियोगिता ‘ बैटल ऑफ़ बैंड्स ’ में पहली बार भाग लिया था। इस बैंड में 15 वर्ष की लडकियां थीं, और उनमें संगीत की प्रतिभा थी। परन्तु उन्हें धमकियां मिलनी शुरू हो गयी थीं, और हारकर उन्होंने संगीत ही छोड़ दिया था।

परन्तु जिहाद के लिए जब तराना लिखना हो या जिहाद के नाम पर भड़काना हो तो संगीत का प्रयोग किया जा सकता है। फिर वह कौन सा संगीत है जिसका विरोध तालिबानी करते हैं या फिर कट्टरपंथी मुस्लिम करते हैं। वह जिसे गाने पर संगीतकार के वाद्ययंत्र तक जला देते हैं?

यदि संगीत इस्लाम में हराम है तो फिर कश्मीर में उन्माद फैलाने के लिए जिहादी तराना क्यों? क्यों इकबाल यह तराना गाते हैं कि

सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने

तेरे सनम-कदों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा

जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ा

वाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तिरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है

ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है,

इकबाल ब्राह्मण से तो कहते हैं कि

शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है

धरती के बासीयों की मुक्ती प्रीत में है

परन्तु वह अपने कट्टर इस्लाम की हिंसा को सगर्व बताते हुए लिखते हैं कि

बस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भी

अहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भी

इसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भी

इसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भी

पर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस ने

बात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस ने

थे हमीं एक तिरे मारका-आराओं में

ख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं में

और फिर इकबाल अपनी पहचान क्या बताते हैं इसी नज़्म में वह देखिये:

अजमी ख़ुम है तो क्या, मय तो हिजाज़ी है मेरी।

नग़मा हिन्दी है तो क्या, लय तो हिजाज़ी है मेरी।

इसके अर्थ को समझना होगा। अजमी अर्थात अरब का न रहने वाला, खुम: शराब रखने का घडा, मय: शराब, परन्तु यहाँ पर मय का अर्थ शराब तो है ही, परन्तु इसकी जो प्रकृति है वह अरबी है। और फिर है हिजाजी: इसका अर्थ है, हिजाज का निवासी, हिजाज सऊदी अरब का प्रांत है, हिजाजी का अर्थ है ईरानी संगीत में एक राग!

अब समझना होगा कि जब अल्लामा इकबाल मुसलमानों की तत्कालीन बुरी स्थिति की शिकायत खुदा से कर रहे थे तो अंत में उन्होंने मुस्लिमों की पहचान अरब से जोड़ दी है। उन्होंने लिखा है

कि

घड़ा अरबी नहीं है तो क्या हुआ मय तो अरबी है। यहाँ पर घड़े का अर्थ है भारतीय मुस्लिम! अल्लामा इकबाल ने कहा “मैं कहने के लिए देशी मुसलमान हूँ, मगर मैं मय अर्थात स्वभाव, प्रकृति, और अपनी जीवन पद्धति से तो अरबी हूँ!”

मैं नगमा जरूर हिंदी का हूँ, पर लय तो अरबी ही है! लय का अर्थ हम सभी जानते हैं, नगमे की आत्मा!

अल्लामा इकबाल ने भारतीय मुसलमानों की पहचान को वतन अर्थात भारत से कहीं दूर अरब से जोड़ दिया था।

एक बात इससे स्पष्ट होती है कि वामपंथ और कट्टरपंथी इस्लाम ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कला के हर रूप का सहारा लिया, एजेंडा परक फ़िल्में बनाईं, तराने बनाए, घृणा फैलाने वाला साहित्य रचा, परन्तु हाँ, जब भी इसका काउंटर किया गया, इसका प्रतिकार किया गया, तो उन्होंने उसी सत्य को प्रोपोगैंडा कहा!

जैसा वह अभी कश्मीर फाइल्स को लेकर कह रहे हैं, क्योंकि वह उसी जिहादी तराने को सत्य माने बैठे हैं कि हिन्दुओं को भगा देना क्रान्ति है और कुछ नहीं!

डॉ. दिलीप कौल के ही शब्दों को मैं भी दोहराना चाहूंगी कि कश्मीरी पंडितों के जीनोसाइड के लिये जिहादियों ने संगीत का बेहतरीन इस्तेमाल किया और इससे भी एक कदम आगे कि हिन्दुओं के चहुँमुखी विध्वंस के लिए गीत, संगीत और कला का प्रयोग वामपंथियों और कट्टर इस्लाम ने बखूबी किया!

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