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Friday, September 17, 2021

आरएसएस के बहाने हिन्दू पहचान से विलग होने की हठ

दो दिन पहले शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी की ओर से एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें यह कहा गया कि आरएसएस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है, अत: वह अल्पसंख्यकों की धार्मिक आज़ादी का दमन कर रहा है। प्रस्ताव में यह कहा गया कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों को दबाने के हर प्रयास को सजा सुनानी चाहिए।

यह प्रस्ताव बहुत कुछ राजनीति से या फिर हिन्दू पहचान से पीछा छुड़ाने जैसा प्रतीत होता है। या फिर यह अपने इतिहास से पीछा छुड़ाने जैसा लगता है। इसी के साथ इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार का धार्मिक शोषण मुग़ल काल में हुआ था जब सिख गुरुओं ने उनका विरोध किया था।

यह सत्य है कि सिख गुरुओं ने मुगलों का विरोध किया था, परन्तु दो गुरुओं, पांचवें गुरु अर्जन देव एवं नौवें गुरु तेगबहादुर सिंह के अतिरिक्त किसी गुरु का वध मुगलों ने नहीं किया। जहांगीर की आत्मकथा के अनुसार जहाँगीर इस बात को लेकर गुस्सा था कि गुरु अर्जन देव ने उसके पुत्र खुसरो का साथ दिया था। चूंकि मुगल वंश में गद्दी हमेशा ही अपने भाइयों और पिता के खून से लाल होकर मिली थी तो उसमें जहांगीर भी कुछ अलग नहीं था। जहांगीर की अय्याशियों से उसके पिता खुश नहीं थे और वह जहाँगीर के बेटे खुसरो को अधिक पसंद करता था। खुसरो की सहायता गुरु अर्जन देव ने की थी इसलिए जहाँगीर उनसे नाराज़ था और फिर उसने गुरु अर्जन देव को यातना देकर मृत्यु के घाट उतार दिया।

तुज़्क़-ए-जहांगीरी में जहांगीर ने गुरु अर्जन देव को एक हिन्दू कहकर ही संबोधित किया है। इसमें लिखा है “गोबिंदवल में, जो ब्यास नदी के तट पर स्थित है, अर्जन नामक एक हिन्दू संत के लिबास में रहता है और उसने कई हिन्दुओं और भोले भाले मुसलमानों को अपनी पवित्रता के जाल में फंसा रखा है। …….कई बार मेरे दिमाग में आया भी कि यह सब बंद कर दूं या फिर उसे इस्लाम क़ुबूल करवा दूं……. मगर जब उसने खुसरो का साथ दिया और उसके माथे पर केसर का टीका लगाया, तो मैं समझ गया कि अब इसका अंत करना है और फिर मैंने आदेश दिया कि उसके बच्चों को मुर्तजा खान को सौंप दिया जाए और उसे मार डाला जाए”।

स्पष्ट है कि गुरु अर्जन देव विद्रोह का शिकार हुए थे, बादशाह के खिलाफ विद्रोह करने का उन्हें दंड मिला था। इस पर बात हो सकती है कि यह शहादत धर्म के लिए थी या नहीं, क्योंकि जहाँगीर ने तब तक अर्जन देव का विरोध नहीं किया था जब तक उन्होंने खुसरो का साथ नहीं दिया था। परन्तु यह भी सत्य है कि पांचवे गुरु के बाद से ही सिख आध्यात्मिक से सैन्य शक्ति की ओर उन्मुख होना आरम्भ हुआ।

हाँ, चूंकि औपनिवेशिक इतिहासकार मैक्स आर्थर मैकॉलिफ (Max Arthur Macauliffe) ने एक हिन्दू कर्मचारी चंदू शाह की कहानी गुरु अर्जन देव के इतिहास में घुसेड दी है, जो कहीं भी जहांगीर की आत्मकथा में नहीं है, मगर इसे खुशवंत सिंह ने भी अपनी ‘हिस्ट्री ऑफ़ थी सिख्स’ (History of the Sikhs) में लिखा है, तथा बाद में उन्होंने छोटा सा स्पष्टीकरण दिया है कि ऐसा कोई आधिकारिक अभिलेख नहीं है। और वाकई तत्कालीन किसी भी पुस्तक में ऐसी कोई भी कहानी नहीं है, परन्तु हिन्दुओं और सिखों के मध्य दुश्मनी पैदा करने के लिए इस प्रकार की मन गढंत कहानियां रची गईं।

जोसेफ डेवी कनिंघम (Joseph Davey Cunningham) ने ‘हिस्ट्री ऑफ सिख फ्रॉम द ओरिजिन ऑफ द नेशन टू द बैटल्स ऑफ द सतलुज’ (History Of The Sikhs From The Origin Of The Nation To The Battles Of The Sutlej) में इस बात का उल्लेख करते हैं कि सिखों के छठवें गुरु हर गोबिंद जहांगीर के निकट आ गए थे और वह उनकी सेना में भी शामिल थे। पर ऐसा कोई भी उल्लेख तुज़्क़-ए-जहांगीरी में नहीं मिलता है।

इसके उलट हिन्दू और सिख एकता के प्रमाण प्राप्त होते हैं कि गुरु 1634 से 1640 तक मुगलों के साथ युद्ध करते रहे और वह हिन्दुओं को इस बात के लिए प्रेरित करते रहे कि अत्याचार का लड़कर सामना करना चाहिए। सिखों के छठवें गुरु गुरु हरगोबिन्द को ही सिखों को सैन्य शक्ति बनाने का श्रेय दिया जाता है, तो इसमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह हिन्दू राजपूत ही थे जिन्होंनें छठवें गुरु की रक्षा की थी।

एक और पुस्तक है ‘सिख हिस्ट्री फ्रॉम पर्शियन सोर्सेस’ (sikh history from persian sources) उसमें एक लेख है ‘सिखिज्म एंड सिख्स’ (Sikhism and the Sikhs, 1645-46, From ‘Mobad’, Dabistan-i-Mazahib) और जिसका अनुवाद इरफ़ान हबीब ने किया है उसके अनुसार गुरु हरगोबिंद ने नैना देवी मंदिर में अपनी सेना द्वारा मूर्ति तोड़े जाने का भी समर्थन किया था। (पृष्ठ 69)

इसके बाद जब आगे हम नौवें गुरु, श्रद्धेय गुरु तेग बहादुर सिंह के जीवन के विषय में जानते हैं तो ज्ञात होता है कि उन्होंने मुग़लों का विरोध करते हुए प्राणों की आहुति दे दी थी। यह कदम धार्मिक समाज एवं मानवता के लिए उठाये गए सबसे बड़े क़दमों में से एक है। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि जब गुरु तेग बहादुर अपने प्राणों का बलिदान देने की प्रतीक्षा में थे, तो उससे पहले तीन ब्राहमण युवक असहनीय यातनाओं का सामना कर अपना सर्वोच्च बलिदान दे चुके थे।

दीवान मती दास और सती दास और दयाला तीनों ही ब्राह्मण जाति के थे अर्थात हिन्दू थे। सती दास को रुई में लपेट कर जिंदा जला दिया गया तो वहीं दयाला को पानी में उबाल कर मारा गया था।  अर्थात जब गुरु तेग बहादुर सिंह अपना सर्वोच्च बलिदान दे रहे थे, तो उनके साथ तीन ब्राह्मण भी अपना बलिदान दे चुके थे।

परन्तु इस घटना को बहुत ही रोचकता से सिख इतिहास को दोबारा विवादास्पद तरीके से दर्शाने वाले मैक्स आर्थर मैकॉलिफ ने लिखा है। वह अपनी पुस्तक ‘द सिख रिलिजन इट्स गुरुज़, सेक्रेड राइटिंग्स एंड ऑथर्स’ (The Sikh Religion, Its Gurus, Sacred Writings and Authors) के प्रथम भाग के प्राक्कथन में गुरु तेगबहादुर सिंह के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि “जब तेगबहादुर सिंह औरंगजेब की जेल में बैठे थे तो वह दक्षिण की ओर देख रहे थे, जहाँ पर शाही ज़नाना था। औरंगजेब को यह पसंद नहीं आया तो उसने उन्हें शाही तौर तरीकों का विरोध करने का आरोपी बताया। तो गुरु जी ने कहा कि बादशाह औरंगजेब, मैं अपनी जेल के ऊपरी तल पर तो था, मगर मैं किसी रानी की तरफ नहीं देख रहा था, बल्कि मैं यूरोप की ओर देख रहा था, जो समुद्र पार करकेआ रहे हैं इस साम्राज्य का नाश करने”

श्रद्धेय गुरु श्री तेग बहादुर सिंह जी के सर्वोच्च बलिदान के उपरान्त जब गुरु गोविन्द सिंह ने अपने बच्चों का बलिदान धर्म के लिए दिया तो उन्होंने धर्मनिष्ठा की एक नई परिभाषा लिखी, परन्तु एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि यह बलिदान उन्होंने इस्लाम न स्वीकारने के लिए दिये थे, किसी अन्य हिन्दू समुदाय की रक्षा के लिए नहीं। इसी के साथ यदि यह देखा जाए कि उनके इस बलिदान का प्रतिशोध किसने लिया, तो पता चलेगा कि एक हिन्दू योद्धा बन्दा बैरागी ने इस बलिदान का प्रतिशोध मुगल सेना का भयानक विनाश करके लिया था।

स्पष्ट है कि सिखों और हिन्दुओं का साथ आज का नहीं है, बल्कि यह तो दोनों के योद्धाओं के मेल-जोल से आगे बढ़ा है। ऐसे में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी द्वारा यह कहा जाना कि आरएसएस के नाम पर हिन्दू धर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है, कई प्रकार के प्रश्न पैदा करता है। यह प्रश्न इस लिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि आज पंजाब में सिखों का ईसाईकरण सबसे तेज गति से हो रहा है और जून 2020 में इस समाचार को प्रमुखता से सभी समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया था कि 8500 सिखों को ईसाई धर्म से वापस सिख धर्म में आरएसएस लाया है

ऐसे में भाजपा नेताओं द्वारा यह प्रश्न उठाया जाता है कि गुरुद्वारा समिति आखिर सिखों को ईसाई होने से रोक क्यों नहीं पा रही है और आरएसएस ही क्यों ईसाई धर्म अपना चुके लोगों को वापस सिखों में लाता है?

यह प्रस्ताव कहीं न कहीं उस विष का फल है जो अंग्रेजों ने बोया था, और जो हम आने वाले कुछ लेखों में सविस्तार पढेंगे।


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