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Friday, June 12, 2026

महिला सशक्तिकरण के दावों की खुली पोल… कांग्रेस और INDI गठबंधन ने अहम वक्त पर नहीं दिया साथ

लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर वोटिंग के दौरान कांग्रेस और INDI गठबंधन ने विरोध कर बिल गिराया, जिससे महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का अवसर नहीं मिल सका।

लोकसभा में हुई इस महत्वपूर्ण वोटिंग ने विपक्ष की राजनीति का असली चेहरा सामने ला दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दल लंबे समय से महिला सशक्तिकरण की बात करते रहे हैं, लेकिन जब निर्णायक समय आया, तब उन्होंने समर्थन देने के बजाय शर्तों और बहानों का सहारा लिया। नतीजा यह रहा कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में उचित प्रतिनिधित्व देने वाला यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से निकल गया।

Feminist symbol with Parliament building, representing women's rights and empowerment.

दरअसल, इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी। सदन में 352 वोटों की आवश्यकता थी, लेकिन इसके पक्ष में केवल 298 वोट पड़े। 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। इस विरोध ने स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष की प्राथमिकता महिला अधिकार नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण हैं।

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सीधा विरोध नहीं किया, बल्कि ‘अगर-मगर’ की राजनीति अपनाई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे छलावा बताया, लेकिन जब समर्थन देने का मौका आया, तब पार्टी पीछे हट गई। यदि कांग्रेस वास्तव में महिलाओं के अधिकारों के प्रति गंभीर होती, तो वह पहले विधेयक को पास कराती और बाद में सुधार की मांग करती। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे साफ होता है कि पार्टी ने महिला सशक्तिकरण से ज्यादा राजनीतिक लाभ को महत्व दिया।

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गृह मंत्री अमित शाह ने भी संसद में स्पष्ट कहा कि INDI गठबंधन के सभी सदस्यों ने सीधे विरोध नहीं किया, लेकिन ‘अगर’ और ‘किंतु’ के जरिए विधेयक को रोकने का काम किया। उन्होंने यह भी बताया कि यह विधेयक 2029 के लोकसभा चुनाव से महिला आरक्षण लागू करने के लिए लाया गया था, ताकि समयबद्ध तरीके से महिलाओं को अधिकार मिल सके।

सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, समाजवादी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर भ्रम फैलाने की कोशिश की। अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण के भीतर अलग-अलग वर्गों के लिए कोटा की मांग उठाई। यह मांग न केवल व्यावहारिक रूप से कठिन है, बल्कि संविधान के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है। इस तरह की शर्तें जोड़कर विपक्ष ने प्रक्रिया को जटिल बनाया और विधेयक को आगे बढ़ने से रोक दिया।

यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या विपक्ष वास्तव में महिलाओं के हित में काम करना चाहता है? यदि हां, तो उसने इस ऐतिहासिक अवसर को क्यों गंवा दिया? स्पष्ट है कि विपक्ष अभी भी वोट बैंक की राजनीति में उलझा हुआ है। उसने महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता देने के बजाय राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता दी।

Prime Minister Narendra Modi addressing Parliament during a session.

वहीं दूसरी ओर, सरकार ने इस विधेयक के जरिए स्पष्ट रोडमैप पेश किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में आश्वासन दिया कि परिसीमन की प्रक्रिया किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं करेगी। उन्होंने साफ कहा कि उत्तर, दक्षिण, पूर्व या पश्चिम, किसी भी क्षेत्र के साथ भेदभाव नहीं होगा। इसके बावजूद विपक्ष ने भ्रम फैलाने की कोशिश की।

अमित शाह ने आंकड़ों के जरिए भी विपक्ष के दावों को खारिज किया। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें घटेंगी नहीं, बल्कि बढ़ेंगी। उदाहरण के तौर पर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना में सीटों की संख्या और प्रतिशत दोनों में वृद्धि होगी। इसके बावजूद विपक्ष ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की।

अगर जमीनी स्तर पर देखा जाए, तो कई राज्यों ने महिलाओं को आगे बढ़ाने में ठोस काम किया है। मध्य प्रदेश इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां पंचायत स्तर पर महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। यहां महिलाएं केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि निर्णय लेने की भूमिका में सक्रिय हैं। यह दिखाता है कि जब नीयत साफ होती है, तो परिणाम भी स्पष्ट दिखते हैं।

इसके विपरीत, कांग्रेस और उसके सहयोगी दल केवल सैद्धांतिक बहसों में उलझे रहते हैं। उन्होंने पहले भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर देरी की है। OBC आरक्षण के मामले में भी कांग्रेस ने लंबे समय तक निर्णय नहीं लिया। आज जब वही दल महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं, तो उनके इरादों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि यह सवाल भी उठता है कि पहले के वर्षों में इस दिशा में तेज पहल क्यों नहीं हुई, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में जो स्पष्ट दिखता है, वह यह है कि विपक्ष ने इस विधेयक को पास नहीं होने देने का मन पहले ही बना लिया था। यही कारण है कि उसने हर संभव तरीका अपनाकर इसे रोक दिया।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर संदेश दिया है। देश की आधी आबादी के अधिकार भी अब राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा बन गए हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। महिलाओं को सशक्त बनाने की बात केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे ठोस निर्णयों में भी दिखना चाहिए।

अंत में यही कहा जा सकता है कि कांग्रेस और INDI गठबंधन ने एक ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया। यदि वे वास्तव में महिलाओं के हित में होते, तो इस विधेयक का समर्थन करते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि उनके लिए महिला सशक्तिकरण एक चुनावी मुद्दा भर है, न कि वास्तविक प्रतिबद्धता।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra is a writer and columnist who contributes articles and opinion pieces to various media organisations. He previously served as the Editor of News4Fact and holds a postgraduate degree in Journalism and Mass Communication.

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