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Saturday, May 21, 2022

10 फरवरी 2013 जब प्रयागराज (तब नाम इलाहाबाद) में अर्धकुम्भ स्नान करने गए श्रद्धालु हुए थे अव्यवस्था का शिकार और निर्दोष भक्तों के लहू से हुई तीर्थ नगरी लाल हो गयी थी

11 फरवरी 2013 को पूरा भारत एक ऐसी दुर्घटना के समाचार से दहल गया था, जो प्रशासन के स्तर पर हुई लापरवाही और संवेदनहीनता के कारण हुई थी। प्रयागराज में उन दिनों अर्द्धकुम्भ का आयोजन हो रहा था। मौनी अमावस्या थी और लोग स्नान करने के लिए पहुंचे हुए थे। उस समय अखिलेश यादव की सपा सरकार की और साथ ही उस मेले के प्रशासनिक प्रभारी थे “आजम खान!”

यह भी विचित्र है कि हिन्दू आस्थाओं से अनभिज्ञ लोगों को उस मेले का प्रभारी बना दिया जाता है, जिस मेले का अपना हजारों वर्ष पुराना इतिहास है, जिसकी अपनी वह आस्थाएं और मान्यताएं हैं, जिन पर उस प्रभारी को विश्वास नहीं हो सकता है। उस समय भी इस निर्णय का विरोध हुआ था। परन्तु हिन्दुओं का विरोध कब मायने रखता है। इसलिए अर्धकुम्भ के प्रभारी आजम खान बने रहे थे। और केंद्र में थी हिन्दुओं के प्रति सौतेला व्यवहार रखने वाली यूपीए की सरकार, जिसने साधु संतों को ही आतंकवादी घोषित करने की जैसे नीति बना ली थी। ऐसा लग रहा था जैसे हिन्दू होना इस देश में अपमान और शर्म का विषय बन गया है। उपेक्षा ऐसी कि अर्धकुम्भ की व्यवस्था भी उस व्यक्ति के हाथ में थी, जिसकी आस्था उस धर्म में थी ही नहीं।

10 फरवरी 2013, दिन था मौनी अमावस्या का। उस दिन लाखों लोग कुम्भ में मोक्ष की आस में डुबकी लगाने आए थे। जब प्रशासन को यह ज्ञात था कि श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि होगी, तो भी तालमेल की कमी क्यों रही? रेलवे की ओर से भी अतिरिक्त ट्रेनों की व्यवस्था नहीं की गयी थी। मौनी अमावस्या वाले दिन वहां पर लाखों लोग आ गए थे।

तत्कालीन मीडिया –  न्यूज़ 18– के अनुसार

मौनी अमावस्या के दिन, 10 फरवरी को प्रयागराज स्टेशन पर करीब 20 लाख से ज्यादा लोग आ गए, जबकि प्रयागराज जंक्शन पर 24 घंटों में सिर्फ 250 ट्रेनें ही मौजूद थीं। इतनी भीड़ के आने से पुलिस और प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई, क्योंकि उनका पूरा ध्यान मेला क्षेत्र में था। भारी भीड़ के कारण वहां अचानक भगदड़ मच गई।

चश्मदीदों के अनुसार, वहां लोगों के बीच यह खबर पहुंची कि प्लेटफार्म नंबर छह की ओर जाने वाली ओवरब्रिज की रेलिंग टूट गई है, जिसके बाद वहां अचानक भगदड़ मच गई। एक प्रत्यक्षदर्शी ने मीडिया को बताया था कि स्टेशन पर एक ट्रेन के आने की घोषणा होते ही अचानक लाखों यात्री प्लेटफार्म की ओर तेजी से जाने लगे। इस कारण से हुए हादसे में 36 लोगों की जान चली गई थी। मरने वालों में 26 महिलाएं, नौ पुरुष और एक बच्चा शामिल था।

इस घटना के बाद हालांकि “आजम खान” ने मेले के प्रभारी पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी थी, जिसे अखिलेश यादव ने अस्वीकार कर दिया था। तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकार के बीच आरोप प्रत्यारोपों का एक दौर शुरू हो गया था। जहां प्रदेश सरकार का कहना था कि इसमें प्रदेश सरकार की ओर से कोई चूक नहीं हुई है, यह दुर्घटना केवल और केवल केंद्र सरकार के कारण हुई थी।

वहीं तत्कालीन केन्द्रीय रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा था कि ‘‘भारत में 65000 किलोमीटर के मार्ग पर रेलवे की 12,000 रेलगाड़ियां चलती हैं और ये रोजाना 2.3 करोड़ लोगों को ले जाती हैं। ऐसे में किसी एक स्थान पर सभी रेलगाड़ियां एक दिन में नहीं पहुंच सकतीं क्योंकि रेलवे की अपनी सीमाएं हैं।’’

वहीं वर्ष 2019 में जब केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार थी, तो तालमेल तो परस्पर था ही, साथ ही कुम्भ मेले के लिए अतिरिक्त 800 ट्रेन की व्यवस्था की गयी थी!

https://navbharattimes.indiatimes.com/travel/religious-trip/prayagraj-kumbh-2019-irctc-introduce-800-special-trains/articleshow/66862938.cms

इस दुर्घटना के कारणों के लिए बनाए गए एकल सदस्यीय आयोग द्वारा बनाई गयी रिपोर्ट को वर्ष 2019 में विधासभा में पटल पर रखा गया था।

बीबीसी के अनुसार रेलवे स्टेशन पर जरूरत से ज्यादा भीड़ आ गयी थी, क्योंकि मेले के क्षेत्र से यह प्रयास रहा कि लोगों को जल्दी से जल्दी मेला क्षेत्र से बाहर निकाला जाए, और रेलवे की ओर से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी, जिससे अधिक लोगों को वहां पर आने से रोका जा सके।

और रेलवे और प्रदेश सरकार के बीच तालमेल का स्पष्ट अभाव दिखा था। बीबीसी के अनुसार पुलिस प्रशासन का रवैया भी असंवेदनशील था।  और

मेला के दौरान जिस तरह से स्थानीय पुलिस को लोगों के साथ संयम बरतने और अच्छा व्यवहार करने की ट्रेनिंग दी गई थी वैसी कोई ट्रेनिंग रेलवे पुलिस को नहीं दी गई। जिसके कारण पुलिस ने लोगों को प्यार से डायवर्ट करने की जगह उन्हें भगाना शुरु किया। इससे लोग नाराज़ भी हुए और अफरा तफरी भी मची।

वैसे जिस पार्टी की सरकार में कारसेवकों पर गोलियां चलाई गयी थीं, उस प्रशासन से क्या अपेक्षा की जा सकती थी? हालांकि इस कुम्भ को सफल बताने के लिए और व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए कई प्रशंसात्मक मीडिया रिपोर्ट भी लिखी गईं, परन्तु 36 लोगों के खून के धब्बे धुलना इतने आसान नहीं थे, और वह भी तब वह केवल और केवल अपनी धार्मिक आस्था का पालन करने के कारण उस अव्यवस्था का शिकार हुए थे, जो हिन्दुओं के प्रति असंवेदनशील केंद्र और राज्य सरकार के परस्पर सहयोग की कमी से पैदा हुई थी।

तभी मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी बार बार डबल इंजन की सरकार कहते हैं क्योंकि अब कुम्भ में मौनी अमावस्या पर गुलाब की पंखुरियों से प्रयागराज की भूमि लाल होती है, भक्तों के निर्दोष लहू से नहीं!

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हिन्दुओं के साथ किए गए सरकारी छल में इस घटना का भी नाम सदा के लिए रहेगा!

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