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Monday, March 16, 2026

जिस आतंक को पाला, उसी ने लहूलुहान किया पाकिस्तान की राजधानी को

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुक्रवार को शिया समुदाय की एक मस्जिद में हुए आत्मघाती धमाके ने एक बार फिर उस सच्चाई को सामने ला दिया, जिसे दुनिया वर्षों से देख रही है और पाकिस्तान लगातार नकारता रहा है। इस हमले में कम से कम 31 लोगों की मौत हुई और 169 से अधिक लोग घायल हुए। इस्लामिक स्टेट यानी आईएस ने हमले की जिम्मेदारी ली। यह घटना न केवल राजधानी की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी बताती है कि पाकिस्तान दशकों से आतंक को पालता-पोसता रहा है और आज वही आतंक उसे निगल रहा है।

यह धमाका इस्लामाबाद के बाहरी इलाके तरलाई स्थित इमाम बारगाह क़स्र-ए-ख़दीजतुल कुबरा मस्जिद में उस समय हुआ, जब जुमे की नमाज शुरू हो रही थी। चश्मदीदों के अनुसार, हमलावर ने मस्जिद के गेट पर रोके जाने के बाद खुद को विस्फोट से उड़ा लिया। नमाज के पहले सजदे के दौरान अचानक गोलियों की आवाज आई और फिर तेज धमाका हुआ। कुछ ही सेकंड में खुशियों और इबादत का माहौल लाशों और चीखों में बदल गया।

People mourning and ambulance at the scene of Pakistan attack.

घायलों और मृतकों को अस्पताल पहुंचाने का दृश्य दिल दहला देने वाला रहा। खून से सने कपड़े, स्ट्रेचर पर पड़े बच्चे और रोते-बिलखते परिजन यह साफ दिखा रहे थे कि आतंक मानवता पर सीधा हमला होता है। अस्पताल के बाहर सुरक्षा बढ़ाई गई और मस्जिद परिसर को सील कर जांच शुरू की गई। जमीन पर बिखरे जूते, टूटे शीशे और खून के धब्बे पाकिस्तान की उस नीति की गवाही दे रहे थे, जिसने आतंक को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया।

आईएस ने अपने बयान में साफ कहा कि उसके आतंकी ने विस्फोटक जैकेट से हमले को अंजाम दिया और बड़ी संख्या में लोगों को मारने का दावा किया। यह दावा पाकिस्तान के उस कथन को झूठा साबित करता है, जिसमें वह खुद को आतंकवाद का शिकार बताता रहा है। हकीकत यह है कि पाकिस्तान ने दशकों तक जिहादी संगठनों को संरक्षण दिया, उन्हें प्रशिक्षण दिया और पड़ोसी देशों के खिलाफ इस्तेमाल किया। आज वही आतंकी संगठन पाकिस्तान की सड़कों, मस्जिदों और अदालतों को निशाना बना रहे हैं।

Pakistani politician speaking with flag of Pakistan in background.

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमले के बाद दोषियों को सजा दिलाने की बात कही, लेकिन ऐसे बयान पाकिस्तान में पहले भी कई बार दिए गए। सवाल यह है कि जब आतंकी संगठन खुलेआम पनपते रहे, तब सरकार और सेना ने क्या कदम उठाए। 2008 में इस्लामाबाद के मैरियट होटल पर हुए आत्मघाती हमले के बाद भी यही दावे किए गए थे। तब 60 लोग मारे गए थे। उसके बाद भी आतंक का ढांचा जस का तस बना रहा।

पाकिस्तान की जमीन लंबे समय से आतंकी संगठनों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनी हुई है। बलूचिस्तान में अलगाववादी हिंसा, खैबर पख्तूनख्वा में तालिबान और आईएस की गतिविधियां और शिया समुदाय पर लगातार हमले इस बात का प्रमाण हैं। पाकिस्तान ने एक तरफ कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया और दूसरी तरफ उसे नियंत्रित करने का ढोंग किया। नतीजा यह हुआ कि देश के भीतर ही अलग-अलग आतंकी गुट सक्रिय हो गए।

पाकिस्तान अक्सर अफगानिस्तान पर आरोप लगाता है कि वहां से आतंकी हमले होते हैं, लेकिन वह यह नहीं बताता कि इन संगठनों की जड़ें पाकिस्तानी जमीन में कितनी गहरी हैं। सीमा पर झड़पें बढ़ रही हैं और दोनों देशों के रिश्ते लगातार बिगड़ रहे हैं। इसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जो हर दिन डर के साये में जी रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने हमले की निंदा की और धार्मिक स्थलों पर हमलों को अस्वीकार्य बताया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की दोहरी नीति अब किसी से छिपी नहीं है। एक ओर वह आतंक के खिलाफ लड़ाई की बात करता है, दूसरी ओर उसके शहरों में आतंकी संगठन बेखौफ वारदात करते हैं।

इस्लामाबाद की यह घटना साफ संदेश देती है कि आतंक को पालने वाला देश अंत में उसका सबसे बड़ा शिकार बनता है। यह हमला केवल एक मस्जिद पर नहीं था, बल्कि उस सोच पर भी था, जिसने आतंक को ताकत का साधन समझा।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra is a writer and columnist who contributes articles and opinion pieces to various media organisations. He previously served as the Editor of News4Fact and is currently pursuing a postgraduate degree in Journalism and Mass Communication.

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