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Sunday, June 26, 2022

वामपंथियों का नया कुतर्क: पहले औरंगजेब ने मंदिर तोड़े तो अब आप मस्जिद तोड़ेंगे? जबकि उनके अनुसार इस्लाम तो मोहब्बत से फैला है?

अब इरफ़ान हबीब भी कह रहे हैं कि औरंगजेब ने ही मंदिर तुडवाया था। यह सत्य कुछ सेक्युलर हिन्दुओं को छोडकर सभी मानते हैं कि औरंगजेब ने हिन्दू मन्दिरों को तुड़वाया था। और काशी विश्वनाथ मंदिर के टूटने का उल्लेख तो मासिर-ए-आलमगिरी में भी है। अब प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि आखिर वह क्या फांस है जो इन वामपंथी सेक्युलर्स के दिल में चुभी है?

वह क्या समस्या है जो उन्हें इतना परेशान किये हुए है? यह देखना होगा! आज एनडीटीवी पर एक लेख प्रकाशित हुआ। वहां के वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने इसे लिखा है। और चूंकि वह हिन्दी साहित्य से भी जुड़े हैं तो यह शब्द उनके संकेतों पर नाचने लगते हैं। और इस लेख को उनकी फेसबुक वाल से न जाने कितने ऐसे लेखकों और लेखिकाओं ने साझा किया है, जो कॉलेज वगैर में मंच साझा करते हैं।

दरअसल ऐसे भ्रामक लेख खतरनाक नहीं होते हैं, ऐसे भ्रामक लेख जिस संख्या में साझा किये जाते हैं और कथित बौद्धिकों द्वारा साझा किये जाते हैं, वह खतरे की घंटी है। इस लेख में लिखा है कि

“हिंदुत्व की शक्ति की तथाकथित प्रतिष्ठा का भाव है।  वे नए औरंगज़ेब हैं जो पुराने औरंगज़ेब से बदला लेने चले हैं।  औरंगजेब ने अपने बाप को जेल में डाला, अपने भाई का क़त्ल किया, बादशाहत हासिल की और यह सब करते हुए कई मंदिर भी तोड़े।  उसे भी शायद यह इस्लाम की प्रतिष्ठा के लिए ज़रूरी लगा होगा।  लेकिन इस्लाम हिंदुस्तान में औरंगज़ेब की तलवार से नहीं, उन सूफ़ी कव्वालियों से परवान चढ़ा जो अमीर-गरीब सबको यकसां छूती-जोड़ती रहीं, वह उन मज़ारों और दरगाहों की मार्फ़त लोगों के बीच पहुंचा जहां सभी आस्थाओं के लोग एक सी आस्था के साथ पहुंचते रहे, वह उन शायरों की बदौलत बुलंद हुआ जिन्होंने सबसे ज्यादा मजाक खुदा के नाम पर बरती जाने वाली मज़हबी संकीर्णता का उड़ाया”

यह इस लेख में उस मजहब के बाशिंदों द्वारा की गयी क्रूरताओं को दी गयी क्लीनचिट के साथ साथ उन बेचारे हिन्दुओं और पूरे उस हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा भी करना दिखाया जा रहा है, जिसने मात्र इतना कहा है कि भाई हमारे मंदिर वापस कर दो! उस हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास है, जिसकी अस्मिता को बार बार किसी न किसी विमर्श के चलते दिनों दिन तोडा जा रहा है। उस हिन्दू समाज को लांछित और कलंकित करने का कुप्रयास है, जिस पर तलवारों के साथ साथ शब्दों से भी उतने ही प्रहार हुए।

यह हाल ही में सुधीर पचौरी ने एक पुस्तक लिखी है, तीसरी परम्परा की खोज। उसके हवाले से आलोचक एवं लेखक अनंत विजय ने लिखा था:

इसके साथ ही उन्होंने सूफियों को लेकर यह भी लिखा था कि

“सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में सूफियों को इस्लाम का प्रचारक कहा है। अपनी इस अवधारणा के समर्थन में उन्होंने पूर्व में लिखी गई पुस्तकों और वक्तव्यों का सहारा लिया है। सुधीश पचौरी लिखते हैं, ‘मध्यकाल के इतिहास ग्रंथों में सूफी कवियों की छवि ठीक वैसी नजर नहीं आती जैसा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में नजर आती है। साहित्य के इतिहास में वे सिर्फ कवि हैं जबकि इतिहास ग्रंथों में वो वे इस्लाम के प्रचारक के तौर पर सामने आते हैं। साहित्य के इतिहास का लेखन अगर अंतरानुशासिक नजर से किया जाता तो सूफियों की इस्लाम के प्रचारक की भूमिका स्पष्ट रहती।‘ सुधीश पचौरी ने इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि सूफी लोग सुल्तानों के साथ आते थे। उनका काम इस्लाम का प्रचार होता था लेकिन यहां के यथार्थ की जटिलताओं को देखकर कई सुल्तान कट्टर की जगह नरम लाइन लेने लगते थे उसी तरह सूफी भी अपनी लाइन को बदलते थे।“

आइये अब एक सूफी नूर मुहम्मद नूर की रचनाओं को देखते हैं और देखते हैं कि दरअसल सूफियों का असली उद्देश्य क्या होता था? नूर मुहम्मद नूर ने अनुराग बांसुरी नामक ग्रन्थ में हिन्दी के प्रयोग को लेकर सफाई दी थी और कहा था कि

जानत है वह सिरजनहारा । जो किछु है मन मरम हमारा॥

हिंदू मग पर पाँव न राखेउँ । का जौ बहुतै हिन्दी भाखेउ॥

मन इस्लाम मिरिकलैं माँजेउँ । दीन जेंवरी करकस भाँजेउँ॥

जहँ रसूल अल्लाह पियारा । उम्मत को मुक्तावनहारा॥

तहाँ दूसरो कैसे भावै । जच्छ असुर सुर काज न आवै॥

अर्थात वह जो सृजनहारा है, वह सब जानता है कि उनका मर्म क्या है? वह कभी हिन्दू नहीं बनेंगे, क्या हुआ जो थोड़ी बहुत हिन्दी बोल ली। उनका मन तो इस्लाम में लगा है, और उन्हें रसूल और अल्लाह प्यारा है। उन्हें उम्मत पर विश्वास है और उसमें कोई दूसरा कैसे भा सकता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कहना है कि संवत 1800 तक आते आते मुसलमान हिन्दी से किनारा करने लगे थे। उन्होंनें हिन्दी को हिन्दुओं के लिए छोड़ दिया था और खुद के लिए वह विदेशी ही रखना चाहते थे। और जिसे हम उर्दू कहते हैं, उसका उस समय साहित्य में कोई स्थान नहीं था, इसका स्पष्ट आभास नूर मुहम्मद के इस कथन से प्राप्त होता है:

कामयाब कह कौन जगावा, फिर हिंदी भाखै पर आवा

छांडि पारसी कंद नवातैं, अरुझाना हिन्दी रस बातैं

सूफियों द्वारा हिन्दू प्रतीकों और चेतनाओं को निशाना बनाना बहुत आम बात थी!

अनंत विजय ने अपने लेख में सुधीर पचौरी की पुस्तक के हवाले से इस पूरे षड्यंत्र को लिखा था। उन्होंने लिखा कि

“‘उत्तर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवी के हमलों के साथ ही सूफियों का आगमन हो गया था। तेरहवीं शताब्दी में जब सल्तनत स्थापित हो गया तब सूफियों ने भी अपना विस्तार आरंभ किया’। सूफियों के विस्तार का तरीका बहुत चतुराई भरा था। वो इस्लाम के धर्मगुरुओं से अलग तरीके से काम करते थे लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही होता था कि जिन इलाकों को सुल्तान जीतता था उन इलाकों में इस्लाम को मजबूत करते चलना। इस काम के लिए वो भारत के संतों और महात्माओं से संवाद करते थे और उनकी उन बातों को अपनी रचनाओं में शामिल कर लेते थे जो उनके धर्म को बढ़ावा देने के काम आ सकती थीं।“

तो ऐसे में जिन्हें सूफियों का इतिहास नहीं पता है और जो मंच साझा करने वाले वाम नेटवर्की लेखकों के संपर्क में होते हैं, वह एनडीटीवी में प्रकाशित लेखों के मीठे जहर का शिकार हो जाते हैं और इस बात को नहीं समझते हैं कि कल तक जो वामपंथी औरंगजेब को टोपी सीने वाला पीर बताते थे, वह अचानक से आज औरंगजेब को बुतशिकन क्यों मानने लगे हैं?

क्योंकि उन्हें पता है कि आज नहीं तो कल सही इतिहास लोगों के सामने आएगा ही, और जब वह इतिहास सामने आएगा तो उनकी असलियत भी सामने आएगी, और फिर लोग प्रश्न पूछेंगे, इसलिए वह औरंगजेब को इस किन्तु परन्तु के साथ मूर्ति विध्वंसक तो मानने लगे हैं, परन्तु वह छल करना नहीं छोड़ रहे हैं, वह इस बहाने हिन्दू समाज को ही खलनायक बना रहे हैं, जबकि सबसे बड़े खलनायक कहीं न कहीं वही हैं!

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