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Sunday, May 19, 2024

अक्षय कुमार की फिल्म ‘रक्षाबंधन’ की लेखिका कनिका ढिल्लो भी हैं “गौ-मूत्र” का ताना देने वाली! बॉलीवुड में क्या ऐसे ही लोगों का स्थान है?

अक्षयकुमार की फिल्म रक्षाबंधन पर रिलीज हो रही है और चूंकि यह भाई बहन के संबंधों पर आधारित है, अत: इसके छोटे शहरों में और सिंगल स्क्रीन पर चलने की वह आस इसके निर्माता लगाए हुए हैं। रक्षाबंधन का पर्व हर हिन्दू के हृदय के निकट होता है क्योंकि यही पर्व है जिसके साथ भाई और बहन के प्रेम, नटखटपन और न जाने कितने छिपे रहस्यों की यादे होती हैं। कोई भी भाई इस दिन नहीं चाहेगा कि उसकी कलाई सूनी रहे और जितनी अधिक राखियाँ अर्थात उतनी अधिक बहनें!

स्पष्ट है कि इसी भावुकता का दोहन करने के लिए कथित राष्ट्रवादी कलाकार अक्षय कुमार की फिल्म रक्षाबंधन आ रही है। वैसे यह अक्षय कुमार ही हैं, जिन्होनें ओह माय गॉड जैसी फिल्म की थी, जिसमें भगवान का जो अपमान था, उसे सहज नहीं भुलाया जा सकता, परन्तु उन्होंने बाद में चोला बदला और कथित राष्ट्रवादी फ़िल्में करनी आरम्भ कीं। परन्तु उसके बाद भी लक्ष्मी, एवं अतरंगी रे ऐसी फ़िल्में थीं, जिनमें लव जिहाद था और फ़िल्में पूरी तरह से हिन्दुओं के विरुद्ध थीं। हिन्दुओं को कट्टर ठहराती हुई फ़िल्में थीं, जबकि सत्यता सभी को ज्ञात है।

हाल ही में रिलीज हुई “सम्राट पृथ्वीराज” में तो वोकनेस की सीमा ही पार कर दी थी। और ऐसा लगा था जैसे कि बॉलीवुड के गिरने की यही सीमा होगी, परन्तु नहीं, यह तो कुछ भी नहीं है। अब उनकी फिल्म रक्षाबंधन आ रही है। हालांकि यह फिल्म कहने के लिए मात्र भाई बहन के प्रेम पर है, परन्तु इसमें कहीं न कहीं हिन्दू परिवारों को दहेज़ लोभी और ऐसा दिखाया है कि बिना दहेज़ के हिन्दू परिवारों में विवाह नहीं होते और भाई अपनी चार बहनों के लिए अपनी दुकान अदि बेच रहा है और ट्रेलर में है कि भाई कह रहा है कि मैं अपनी किडनी बेच दूंगा!

आज के समय में ऐसा सहज नहीं होता है, परन्तु फिर भी चूंकि एजेंडा था हिन्दू भावनाओं का दोहन करना और कथित राष्ट्रवादी की इमेज का प्रयोग करना, तो इस बार कथित राष्ट्रवादी ने हमला किया है भारत के उस मध्यवर्ग पर, जो किसी भी समाज की सबसे बड़ी रीढ़ होता है। यह ट्रेलर वास्तव में हैरानी उत्पन्न करता है कि क्या किसी भी प्रकार का होमवर्क नहीं किया गया है, या बस ऐसे ही लिख दी गयी है।

क्यों खतरनाक है ऐसी फ़िल्में?

यह जो तथ्यहीन फ़िल्में होती हैं, वही हमारी चेतना पर प्रहार करती है, वह तथ्यों से परे एक ऐसे नैरेटिव का निर्माण करती हैं, जो दशकों बाद यह बताते हैं कि उस समय समाज कैसा रहा होगा। और समाज का चित्रण करने वाला साहित्य एवं सिनेमा हिन्दू विरोधी ही रहा है।

यह बताने के लिए पर्याप्त होगा कि हिन्दू ऐसे लोग हुआ करते थे, जो एक ऐसी कुप्रथा के चलते जिसे कानूनन भी अपराध माना गया है, अपनी लड़कियों का विवाह नहीं कर पाते थे! अर्थात हिन्दू लोग लालची हैं, लोभी हैं, अपराधी हैं और स्त्री विरोधी हैं और उसके पीछे कारण क्या है? स्पष्ट है धर्म! और संवाद क्या है “भाईसाहब, हर घर में एक बेटी बैठी है, जिसका दहेज़ कम पड़ रहा है, और बस इस उम्मीद में कि वह अपनी छाती ठोंक कर उसे विदा कर सके, उसका बाप एड़िया रगड़ रहा है!”

ऐसे समय में जब लडकियां अपनी सफलता के झड़े हर क्षेत्र में गाढ़ रही हैं, उस समय ऐसे विषय पर फ़िल्में लाना? जो अब हिन्दू मध्यवर्ग से समाप्त प्राय: है क्योंकि लडकियां स्वयं ही इतना कमा रही हैं! वह आत्मनिर्भर हैं!

लाल सिंह चड्ढा के प्रति आक्रोश के चलते लोगों का ध्यान इस हिन्दू विरोधी फिल्म पर नहीं गया:

चूंकि इस समय लोगों का गुस्सा करीना कपूर और आमिर खान के कारण “लाल सिंह चड्ढा” पर था, इसलिए अक्षयकुमार की इस फिल्म के इस एजेंडे की ओर ध्यान नहीं गया होगा,

परन्तु अब लोगों का ध्यान इस ओर गया है! और फिर समझ आया कि दरअसल यह जहर कहाँ से आया होगा। हिन्दू समाज को पिछड़ा बताने का जो जहर है, दरअसल वह किसकी कलम से निकला होगा। जिसने भी इसे लिखा है, उसके विचारों में हिन्दुओं के प्रति ऐसी दुर्भावना रही होगी कि मानसिक विकृति ही कहीं न बन गयी हो।

इस फिल्म को लिखा है कनिका ढिल्लो ने! कनिका ढिल्लो अचानक से ही कल पर twitter पर छाई हैं, दरअसल उनके पुराने ट्वीट वायरल हो रहे थे जिनमें उन्होंने गौमाता पर तंज कसा है, जिसमें उन्होंने हिंदुत्व पर प्रहार किया है और हाल ही में जब कर्नाटक में हिजाब आन्दोलन चल रहा था तो हिजाब गर्ल मुस्कान के लिए लिखा था कि “उन्हें इस लड़की पर गर्व है!”

धीरे धीरे अब उनके किए गए सारे ट्वीट्स सामने आए और फिर पता चला कि कैसे हिन्दुओं से घृणा करने वाली महिला ने एक ऐसी फिल्म लिखी है जो भावनाओं के दोहन के बहाने कहीं न कहीं पूरे हिन्दू समाज को पिछड़ा, लोभी, लालची आदि के रूप में प्रस्तुत करती है। हिन्दुओं से घृणा करने वाली कनिका का ट्वीट कोरोना जैसी आपदा के मध्य था कि “अस्पताल के एक बेड के लिए इंतज़ार करते हुए पार्किंग लॉट में मरना! ये अच्छे दिन है! इंडिया सुपर पावर है! और गौ माता का मूत्र पीने से कोविड चला जाएगा!”

समस्या क्या है ऐसे लोगों की? क्या जहाँ पर गाय को गौमाता नहीं कहते हैं, वहां पर लोग इस आपदा का शिकार नहीं हुए? हुए थे? और जहां पर यह लोग कथित विकसित देशों का ठप्पा लगाए हुए हैं, वही देश कोरोना की आपदा का अधिक शिकार हुए थे। कनिका के ऐसे सभी ट्वीट्स को एक यूजर ने संगठित किया! कनिका इस हद तक इस देश, और हिन्दुओं से घृणा करती हैं कि वह लिंचिस्तान तक कहती हैं।

इतना ही नहीं, हिन्दुओं की भावनाओं का दोहन करने वाली कनिका, पाकिस्तान और बांग्लादेश के उन हिन्दुओं के लिए बने नागरिकता क़ानून का विरोध कर रही थीं, जहाँ पर भाई वास्तव में अपनी बहनों की रक्षा के लिए चिंतित हैं, जहां का हिन्दू भाई यह चाहता है कि उनकी बहन सुरक्षित रहे, परन्तु वह सुरक्षा के लिए भारत नहीं आ सकता है क्योंकि यहां पर मुस्लिम आन्दोलन कर रहे हैं और उनका साथ कनिका जैसे लोग दे रहे हैं, जो अंत में आकर हिन्दुओं की भावनाओं का दोहन और शोषण दोनों करने वाली फ़िल्में बनाते हैं।

उनका यह भी कहते हुए ट्वीट वायरल हो रहा है कि “हम कागज़ नहीं दिखाएंगे”

एक ऐसी फिल्म जिसमें माथे पर टीका लगाए एक हिदू व्यक्ति गोलगप्पे बेच रहा है और एक गर्भवती महिला को बेटा पैदा होने की गारंटी दे रहा है वही व्यक्ति लिख सकता है, जिसके दिल में धर्म को लेकर, गाय को लेकर, अपनी हिन्दू पहचान को लेकर घृणा ही घृणा है। और यह निकलकर आ रहा है कनिका ढिल्लो के ट्वीट्स से!

गाय को लेकर वह अतिरिक्त आक्रामक हैं और उन्हें ऐसा लगता है कि गायों की रक्षा के लिए जो हो रहा है, वह नहीं होना चाहिए! गाय के प्रति ऐसे विचार सहज हिन्दुओं के दिल में नहीं आ सकते।

हालांकि कनिका ढिल्लो ने अपने हिन्दू विरोधी ट्वीट डिलीट करने आरम्भ कर दिए हैं, परन्तु उस मीठे जहर का क्या, जिसे पिलाने के लिए उन्होंने भाई और बहन के प्रेम का पावन दिन चुना है?

कनिका जैसे लोग कभी भी मरते हुए हिन्दुओं पर नहीं बोलते, कनिका जैसे लोग अहमदाबाद में सरेआम आत्महत्या करती हुई उस लड़की पर फिल्म नहीं बनाते, जो “जहेज और शौहर की बेवफाई” का शिकार हुई थी।

रक्षाबंधन जैसी फ़िल्में धार्मिक और सामाजिक चेतना पर सबसे बड़ा प्रहार हैं, यह मीठा जहर है और हिन्दी साहित्य यह वर्षों से करता हुआ आया है। और अब प्रश्न यही है कि क्यों आखिर कथित राष्ट्रवाद का नाम लेने वाले लोग अंतत: उन लोगों की गोद में जाकर बैठ जाते हैं या उनके साथ हाथ मिला लेते हैं, जो हमारे धार्मिक विचारों पर प्रहार करते हैं, उनका उपहास उड़ाते हैं और हिन्दुओं से घृणा करते हैं?

प्रश्न यह भी है कि क्या हिन्दू इन लोगों के लिए इनकी तथ्यहीन और एजेंडापरक फ़िल्में सफल कराने के लिए ही हैं? और क्या बॉलीवुड में मात्र ऐसे ही लोगों का स्थान है? प्रश्न यह भी है कि सरकार का विरोध करने के लिए हिन्दुओं का और गौमाता का अपमान क्यों?

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