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Monday, January 24, 2022

कांग्रेस पार्टी में जाते ही कन्हैया कुमार ने नकारा उमर खालिद को और भडके कट्टरपंथी मुस्लिम लिबरल

वह दिन लोग भूले नहीं हैं, जब कामरेड कन्हैया कुमार और कामरेड उमर खालिद नए नए नेता बनकर उभरे थे। और लिबरल गिरोह की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरे थे। लोगों को लगा था जैसे यही दोनों राम लक्ष्मण बनकर नरेंद्र मोदी सरकार का दहन कर देंगे। लिबरल गैंग के यह दो नायाब हीरे बन गए थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे क्रान्ति की नदिया अभी मुड़कर आएगी और बहा ले जाएगी सरकार को और दलीय राजनीति को!

इसी मोह में कन्हैया कुमार और उमर खालिद के उत्तेजक भाषणों को भी मीडिया ने क्रातिकारी बताया। हर गलत कदम को सही ठहराया। पर जैसे ही कन्हैया कुमार राजनीति में आए वैसे ही स्थिति बदल गयी। इस परिवर्तन का कारण क्या है, इसका उत्तर जानने का हर कोई प्रयास कर रहा है। परन्तु कन्हैया कुमार के राजनीति में आने के बाद, कांग्रेस ज्वाइन करने के बाद से ही उमर खालिद के विषय में लिबरल बातें करने लगे थे कि कन्हैया कुमार को हिन्दू होने के कारण छोड़ दिया गया है।

अब कन्हैया कुमार ने स्पष्ट कह दिया है कि “कौन उमर खालिद?” एक वीडियो सामने आया है, जिसमें कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार से एक पत्रकार पूछ रहा है कि “क्या उमर खालिद आपके दोस्त हैं?” तो कन्हैया कुमार ने कहा “तुमसे किसने कहा?” इसके बाद कन्हैया कुमार ने आगे पत्रकार से सवाल किया कि तुम्हें किसने बताया कि वह उमर खालिद के दोस्त हैं? इस पर पत्रकार कहता है कि उसने एक वीडियो में देखा था, तो कन्हैया कुमार पूछता है कि किस वीडियो में उसने उमर को अपना दोस्त कहा है!

यह वीडियो सामने आते ही लिब्रल्स और मुसलमानों में गुस्सा फूट पड़ा है। मुसलमान इसे धोखा बता रहे हैं। दरअसल भारत की राजनीति में मुस्लिमों को प्रयोग किया गया है, अपने वोटों के लिए। कांग्रेस और वामपंथ ने यही किया है उन्हें भारतीय जनता पार्टी का हौवा दिखाकर अपना स्वार्थ साधा है। इसमें कई तहें हैं, इसमें अशराफ द्वारा मुसलमानों का मसीहा या ठेकेदार होना शामिल है। परन्तु यह सत्य है कि कोई भी पार्टी हो, फिर चाहे वह कांग्रेस हो, सपा हो, राजद हो या अन्य क्षेत्रीय पार्टी, इन्होनें मुस्लिमों में कट्टरपंथ को बढावा देते हुए उन्हें हिन्दुओं से अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

वामपंथी राजनीति में मुस्लिमों का प्रयोग कैसे करते हैं और उन्हें कैसे और कट्टर बनाते हैं, इसका उल्लेख शर्जिल इमाम ने अपने एक लेख में किया था। शर्जिल इमाम ने लिखा था कि कामरेड भी इस्लाम के प्रति घृणा से भरे हैं और औरतों के मसले पर दोगले हैं। उसने लिखा था कि कैसे वह लोग अपने पदाधिकारियों के प्रति औरतों द्वारा यौन उत्पीड़न के मामले में चुप्पी साध जाते हैं। उसने लिखा था कि वक्त बीतने के साथ ऐसे और भी मामले सामने आए तो साफ हो गया कि आइसा के पदाधिकारियों के खिलाफ यौन-उत्पीड़न के मामलों का एक लंबा इतिहास है और शिकायतकर्ता के खिलाफ मिथ्या दुष्प्रचार करके अपने नेताओं को बचाने की इनकी संस्कृति रही है।

आइसा के बारे में शर्जिल ने लिखा था कि आइसा मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने के मामले में भी बार-बार चूकी है। साल-दर-साल मुसलमानों को जेएनयूएसयू जॉइंट सेक्रेटरी का पद एक टोकन के तौर पर दिया जाता रहा है जिससे यूनियन में उनकी नाममात्र उपस्थिति बनी रहे और मुस्लिम वोट बटोरे जा सकें।

एसएफआई का भी वही हाल है। उसका पितृदल सीपीएम जिसने पश्चिमी बंगाल पर साढ़े तीन दशकों तक राज किया है ने भी मुसलमानों को भयानक रूप से वंचित ही रखा है।

ऐसा एक नहीं कई लोगों ने कहा है कि वामदल और कांग्रेस अधिकतर मुस्लिमों को अपने फायदे के लिए प्रयोग करती हैं, परन्तु प्रश्न यही उभर कर आता है कि आखिर वह क्या चीज़ है जिसके कारण मुस्लिम कथित रूप से प्रयोग हो जाते हैं? और जैसा दावा वह लोग अभी कन्हैया कुमार को लेकर कर रहे हैं!

हिन्दुओं के मामलों को लेकर इतनी घृणा खुद मुस्लिमों में क्यों है कि कोई भी उन्हें मात्र भाजपा और हिन्दू का डर दिखाकर और उनकी घृणा को भड़काकर कुछ भी कार्य निकलवा सकता है? कौम आधारित राजनीति इतनी कडवी क्यों है कि वह हिन्दुओं के अस्तित्व को ही स्वीकारने से इंकार कर देती है?

क्यों इस वीडियो  को मुस्लिमों के लिए सबक बताया जा रहा है?

यहाँ पर यह भी एक प्रश्न उठता है कि राजनीतिक विरोध में अपने मजहब को शामिल करने वाले लोग इसे मुस्लिमों के लिए सबक कैसे बता सकते हैं, जब उन्होंने स्वयं को भारतीय के स्थान पर हमेशा मुस्लिम माना? जो लोग हिन्दुओं का बहिष्कार करते हैं और जिन लोगों में इस्लाम के नाम पर केवल भारतीय जनता पार्टी का विरोध होता है, पसमांदाओं के स्थान पर रोहिंग्या के पक्ष में बात करते हैं, वह कन्हैया कुमार की इस हरकत को पीठ में छुरा घोंपने की हरकत बता रहे हैं। जैसे इरेना अकबर!

लिब्रल्स भडके हुए हैं, मुस्लिम गुस्सा हैं द प्रिंट के लिए लिखने वाली फातिमा खान ने लिखा कि वह समय ध्यान आ रहा है जब मैंने कन्हैया कुमार के संदिग्ध मौन पर बात की थी जो उसने दिल्ली हिंसा में गिरफ्तार हुए छात्रों पर धारण कर लिया था।

जितने भी लोग कन्हैया कुमार पर गुस्सा हो रहे हैं, जितने भी मुस्लिम, उनमें एक बात गौर करने लायक है कि इनमें से अधिकतर लोग हिन्दुओं से घृणा करने वाले हैं, और हिन्दुओं से खुद को अलग करने वाले हैं। अधिकतर लोग इस्लाम में जातिभेद पर कुछ नहीं बोलते हैं। पस्मान्दाओं पर बात करना पसंद नहीं करते हैं, शायद पता ही न हो कि पसमांदा होते क्या हैं?

दिल्ली दंगों में आरोपी उमर खालिद के लिए प्रेम है, परन्तु अपने ही मजहब की कुरीतियों के प्रति पसरा मौन है!

और कन्हैया के विरोध के बहाने यह अपनी हिन्दुओं के प्रति घृणा को ही व्यक्त कर रहे हैं! और जो आज कन्हैया कुमार का विरोध कर रहे हैं, उनसे यही पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने क्यों हिन्दुओं के प्रति नफरत के चलते इस देश तक को तोड़ने की साज़िश रच डाली थी?  कन्हैया कुमार के बहाने आप केवल और केवल हिन्दू घृणा निकाल रहे हैं और यह अफ़सोस व्यक्त कर रहे हैं कि क्यों अलगाववादी मानसिकता में इसका साथ लिया था? अभी भी आपकी प्राथमिकता देश नहीं है, उन हिन्दुओं की असमय मौत नहीं है, जिनके पीछे उमर खालिद का षड्यंत्र था, बल्कि आपका क्रोध इसलिए है कि कन्हैया कुमार ने अलगाववादी विचारधारा वाले उमर खालिद को क्यों नकार दिया?

बात अभी भी आपकी प्राथमिकताओं की है!

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