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Tuesday, June 25, 2024

हिन्दू धर्म के उदार होने का अर्थ क्या हर ओर से अपमान झेलना है? देश एक बार फिर से आहत होकर पूछ रहा है कि ऐसा क्यों मीलोर्ड?

आल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को एक मामले में जमानत देते हुए दिल्ली के एक न्यायालय ने कहा कि हिन्दू धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है। उसके अनुयायी भी सहिष्णु हैं। वह इतने सहिष्णु हैं कि अपने धर्म के भगवान और देवी देवताओं के नाम पर अपने संस्थानों, और स्थानों का नाम रखते हैं।

उसके बाद यह भी कहा कि कई हिन्दू अपने बच्चों का नाम भी देवों के नाम पर रखते हैं और कॉर्पोरेट अफेयर्स के मंत्रालय की वेबसाईट से पता चलता है कि कई कंपनियों ने भी अपने नाम देवी-देवताओं पर रखे हैं।

यह न्यायालय के निर्णय से स्पष्ट नहीं हो पाया है कि क्या सहिष्णु धर्म होने का अर्थ यह है कि हिन्दू धर्म पर बार-बार उन लोगों के द्वारा हमला किया जाए, जो उसे मानता नहीं है तो क्या वह उचित है? इस निर्णय को लेकर सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने अपनी राय दी। लोग भ्रमित हैं कि जमानत तो ठीक है, परन्तु क्या सहिष्णु होने का अर्थ यही है कि अपमान कोई भी करके चला जाए?

कश्मीर फाइल्स बनाने वाले विवेक रंजन अग्निहोत्री ने इस विषय में ट्वीट करते हुए कहा कि

यही कारण है कि दुनिया में सबसे सहिष्णु लोग लगातार जीनोसाइड और तन से जुदा सिर के ही अधिकारी हैं और फिर उन्होंने कई दंगों के नाम लिखे, जैसे मोपला, डायरेक्ट एक्शन डे, कश्मीर, गोधरा, पंजाब, दिल्ली, उदयपुर

आनंद रंगनाथन ने भी कहा कि

“हिन्दू धर्म और उसके अनुयायी सबसे सहिष्णु है”

क्या यह कहने वाले जज ने उस मुस्लिम को जमानत देते हुए कहा है, जिसने हिन्दू भावनाओं पर आक्रमण किया है, तो क्या अब किसी धर्म और उसके अनुयाइयों की सहिष्णुता ही अपराध की गंभीरता का निर्धारण करेगी?

हिन्दू धर्म सहिष्णु है, कहते-कहते साहित्य और फिल्मों ने हिन्दू धर्म को नष्ट करने की ओर कदम बढाए हैं और निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं।

यह बहुत ही आसान है कह देना कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है, उदार है, इसलिए कुछ भी कहा जा सकता है, परन्तु उदार होने का अर्थ यह भी नहीं है कि विकृतियों को उन लोगों के द्वारा कानून से ही कोई दंड न मिले जो हिन्दू धर्म को मानते नहीं हैं, या फिर हिन्दुओं को काफ़िर मानते हैं? क्या अब हिन्दुओं की सहिष्णुता ही यह निर्धारित करेगी कि अपमान करने वालों को क्या दंड मिलना चाहिए? और क्या एक मजहब या पंथ की असहिष्णुता यह निर्धारित करेगी कि कब किसका सिर तन से जुदा होना है?

हिन्दुओं को छोड़कर, ईसाई, मुस्लिम और अब सिख तक अपने आराध्यों के अपमान के प्रति इतने संवेदनशील हैं कि लोग अब डरने लगे हैं, और ऐसे में न्यायालय द्वारा यह कहा जाना कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है, क्या यह सन्देश देता है कि जो सम्प्रदाय जितना सहिष्णु होगा, उसका अपमान कोई भी कर सकता है आकर?

क्या फिल्मों में जानबूझकर हिन्दू धर्म को यह सोचकर निशाना बनाया जा सकता है, विकृत किया जा सकता है और किया ही जा रहा है, कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है!

विज्ञापन तक जैसे कि “कन्यामान” जैसी अवधारणाएं भी हिन्दू धर्म को कोसने के लिए आ जाती हैं और विरोध करने पर यह कह दिया जाता है कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है!

कन्यामान

हिन्दू धर्म का सहिष्णु होना अपराध कहाँ से हो गया, क्यों यह एक गाली बन गयी है, कि जिसमें कोई काली माँ को एलजीबीटी का झंडा पकड़ा कर सिगरेट पकड़ा देता है? क्यों शक्ति की प्रतीक काली माँ “पितृसत्ता” का विरोध करती हुई बता दी जाती है?

क्यों सती द्रौपदी का विरूपण कर्ण की प्रेमिका के रूप में कर दिया जाता है? क्यों महाभारत में एक ऐसा दृश्य डाल दिया जाता है, जिसमें द्रौपदी को हँसते हुए और यह कहते हुए दिखाया जाता है कि “अंधे का पुत्र अंधा”, जो कि महाभारत में नहीं था।

महाभारत-सभापर्व

न जाने कितने खेल होते रहे, और यह कहा जाता रहा कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है! सहिष्णुता के नाम पर ब्राहमणों को फिल्मों में खलनायक घोषित कर दिया गया, हिन्दू समाज की आर्थिक रीढ़ कहे जाने वाले वैश्य समाज को धनलोलुप एवं वीरता के पर्याय ठाकुरों, क्षत्रिय आदि को शक्ति का दुरूपयोग कर बलात्कारी या अत्याचारी के रूप में चित्रित किया जाने लगा, तिलक धारी खलनायक होते गए और हिन्दुओं को मारने वाला जहांगीर “प्यार का मसीहा!”

समाज में विकृतियों को जन्म देने वाले साहित्य को मात्र इस लिए स्थान मिलता रहा क्योंकि हिन्दू धर्म सहिष्णु है, क्या सहिष्णुता इतना बड़ा अपराध है कि कोई भी आमिर खान पीके जैसी अपमानजनक फिल्म बना दे, कोई भी “ओह माई गॉड” जैसी अपमानजनक फिल्म बना दे, कोई भी वामपंथी, जिनके लिए धर्म तो अफीम है, परन्तु मजहब और रिलिजन ऐसी चीजें हैं, जिनके विषय में लिखने से वह डरते हैं, जिनके लिए वह रीढ़ के बल लेट जाते हैं, वह हिन्दुओं पर ही नहीं बल्कि उनके आराध्यों पर अपमानजनक साहित्य लिखते रहें, प्रभु श्री राम की जल समाधि को आत्महत्या ठहराते रहें, जिन्हें हिन्दू धर्म की मूल अवधारणाओं का ज्ञान नहीं, वह धर्म पर उपहासजनक टिप्पणी करते रहें?

काल्पनिक फिल्मों में तिलकधारी खलनायक बना दिया जाए, जैसा शमशेरा में आ रहा है!

कल न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय पर आनंद रंगनाथन ने जो कहा है, वह लगभग सभी लोगों का प्रश्न है कि क्या अब लोगों का अपराध दूसरे पन्थ के अनुयाइयों की सहिष्णुता या असहिष्णुता से निर्धारित होगा? क्या न्यायालय द्वारा सीमाएं निर्धारित की जा रही हैं कि इस धर्म को आप मनचाहे रूप में अपमानित कर सकते हैं, परन्तु आपको उन्हें विरुद्ध नहीं बोलना है जो असहिष्णु है? तो फिर असहिष्णु कौन है?

इस निर्णय को लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर से न्यायालय के प्रति जनता का आक्रोश फूट पड़ा है, लोग प्रतिक्रिया दे रहे हैं:

एक यूजर ने लिखा कि क्या माननीय न्यायालय यह कहना चाहते हैं कि हिन्दुओं को न्याय के लिए असहिष्णु एवं हिंसक होना चाहिए?

इस मामले में भी लोगों ने कहा कि न्यायाधीशों को अपने व्यक्तिगत मतों को बताने से बचना चाहिए

एक यूजर ने लिखा कि क्या इसका अर्थ है कि अन्य मत सहिष्णु नहीं हैं? यदि यह मामला है तो उच्चतम न्यायालय उन हिन्दुओं को क्या राहत देंगे जिन पर सिर तन से जुदा होने का खतरा है?

जुबैर हिन्दू नहीं है, उसका एफबी पेज पूरे तरह से हिन्दू उपहास से भरा है, तो वह कुछ भी कहकर निकल सकता है?

लोगों ने प्रश्न किया कि क्या हिन्दुओं को सहिष्णु होने का दंड मिल रहा है? क्या आप असहिष्णु हैं, तो आपको न्यायालय से भी विशेष व्यवहार मिलेगा?

साहित्य से लेकर फिल्मों, सेक्युलर राजनेताओं एवं कथित हिन्दू विचारकों की ओर से बार-बार यही कहा जाता है कि हिन्दू धर्म सहिष्णु है। परन्तु इसी सहिष्णुता की आड़ में साहित्य में हनुमान जी को प्रथम आतंकवादी कहा जा सकता है, प्रभु श्री राम को हिंसक और न जाने क्या क्या कहा जा सकता है, प्रभु श्री राम को इमाम-ए-हिन्द कहा जा सकता है, हिन्दुओं को साहित्य से लेकर फिल्मों के काफिर कहा जा सकता है, और भी न जाने क्या क्या कहा जा सकता है!

उसके महादेव को फुव्वारा कहा जा सकता है। यहाँ तक कि शिवलिंग को “पुरुष जननांग” के रूप में ही चित्रित किया जा सकता है, शिवलिंग पर कंडोम चढ़ाकर बनाने वाले चित्र को साझा करके राजनीति में प्रवेश पाया जा सकता है?

उसे अपने जीनोसाइड के विषय में बोलने का भी अधिकार नहीं है क्योंकि पीड़ा व्यक्त करते ही यह कहा जाएगा कि “हिन्दू धर्म सहिष्णु है!” हिन्दू धर्म की सहिष्णुता के चलते एमएफ हुसैन हिन्दू देवियों को नंगा चित्रित कर सकता है, और यह कह सकता है कि “खजुराहो में भी भी तो है!”

हिन्दू धर्म सहिष्णु है, इसलिए हिन्दू अपने आराध्यों का अपमान सहन करता रहे, साहित्य में, फिल्मों में, धारावाहिकों में, वास्तविक जीवन में, यह कैसा मजाक बनाया जा रहा है? क्या प्रकारांतर से यह प्रमाणित करने का प्रयास किया जा रहा है कि सहिष्णुता का अर्थ चिर अपमान है? हिन्दू धर्म क्या उनके लिए भी सहिष्णु हो सकता है जो उसे काफिर कहते हैं, जो उसके नष्ट होने की कामना करते हुए कभी गजवा ए हिन्द की कामना करते हैं तो कभी नुपुर शर्मा के एडिटेड वीडियो के बहाने लोगों को मारते हैं?

यह सहिष्णुता का कैसा दंड पा रहा है हिन्दू समाज कि कहीं उसकी कोई बात सुनने वाला ही नहीं है? यहाँ तक कि अब न्यायालय भी क्या “समुदाय की सहिष्णुता और असहिष्णुता के आधार पर दंड निर्धारित करेंगे?” यह कैसा अन्याय है हिन्दू समाज के साथ? प्रश्न आम जनता कर रही है कि न्याय के लिए कहाँ जाएं?  

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1 COMMENT

  1. PM Modi is responsible for all anti-Hindu activities and the woes of Hindus. He loves only himself. He must go. He is a Muslim/Christian appeaser against Hindu interests. He has belied all hopes. From an expected Shivaji, he has turned Aurangzeb. He must be substituted by Yogi or Hemant Sarma. His Hindu supporters in Parliament should resign en masse and force him to leave just as British PM was forced out recently.

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