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Thursday, May 30, 2024

मैं हिन्दू कैसे बना: सीता राम गोयल – अध्याय 3:वह बीज जो अंकुरित होने थे

महाविद्यालय छोड़ने के चार साल बाद ही मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार था, और उसी समय उस पार्टी ने फरवरी 1948 में भारत के नवोदित गणतंत्र पर युद्ध की घोषणा कर दी। मैंने यह फैसला अपने दोस्त रामस्वरूप को सुनाया, जिससे मैं महाविद्यालय छोड़ने के बाद मिला था और जो मेरे इस बौद्धिक निर्णय पर काफी लंबा प्रभाव छोड़ने वाला था। उन्होंने  मुझे तुरंत लिखा – “आप साम्यवादी ना बनने के लिए बहुत बुद्धिमान हैं लेकिन आप इतने भी अधिक बुद्धिमान हैं कि आप उस विचार के साथ बहुत ज्यादा नहीं रह सकते।”

यह  एक भविष्यवाणी थी जो सच हुई। केवल एक वर्ष और कुछ महीने बाद ही मैंने मार्क्सवाद को उसके अधूरे दर्शन के कारण त्याग दिया, और महसूस किया कि भारत की साम्यवादी पार्टी, भारत में रूसी साम्राज्यवाद के अभ्युदय के लिए पांचवा स्तम्भ थी और  स्टालिन के तहत सोवियत संघ की एक विशाल दास साम्राज्य  की कल्पना करती थी’।

इससे पहले कि मैं इस परिवर्तन की कहानी कहूं, मुझे पीछे मुड़कर अपने दिमाग में कुछ बीजों के बोने की बात की तरफ इंगित करना होगा। जैसे ही मार्क्सवाद का मकड़जाल टूटता, वैसे ही ये बीज अंकुरित होने वाले थे और सनातन धर्म में एक आस्था के रूप में विकसित होने वाले थे।

मेरे बौद्धिक विकास पर स्थाई छाप छोड़ने वाले महाविद्यालय के पहले शिक्षक हमारे संस्कृत के प्राध्यापक थे। यह महान भाषा और साहित्य, कला स्नातक में मेरा मुख्य विषय नहीं था। मैं केवल एक पूरक परीक्षा में इसे उत्तीर्ण करने वाला था और फिर इसके बारे में भूल जाता था। निर्धारित पाठ्यक्रम में डांडिन के दसकुमारचरित के पहले चार अध्याय और भारवी के किरातार्जुनीय के कुछ सर्ग थे, जिसमें कुछ व्याकरण और अनुवाद कार्य सहायता के रूप में दिए गए थे। समान्यतः, मेरे जैसे अनियत/अनौपचारिक छात्र को हमारे संस्कृत प्राध्यापक का ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहिए था ना ही उनकी तरफ मेरा ध्यान आकर्षित होना था लेकिन जैसे कि हम दोनों का एक दूसरे की ओर आकर्षित होना लिखा था। इस मुलाकात का परिणाम, न केवल संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रति मेरे स्थायी प्रेम का विकसित होना था, बल्कि हिंदू दर्शन और इतिहास को देखने के मेरे नज़रिये में एक निर्णायक प्रयाण भी था।

इन प्राध्यापक ने अपनी पीएचडी पूरी करने के लिए यूरोप में कई साल बिताए थे। उन्होंने कुछ समय तक शांतिनिकेतन में भी पढ़ाया था। लेकिन यह केवल उनकी बाहरी उपलब्धियां थी जो कई अन्य प्राध्यापकों के पास भी उनके अपने अपने क्षेत्रों में थीं। उनके बारे में जो मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखता था, वह था पारंपरिक भारतीय दर्शन, भारतीय इतिहास और भारतीय भाषाओं और साहित्य के व्यापक क्षेत्रों में उनका अपूर्व ज्ञानविस्तार। निर्धारित ग्रंथों में गद्य कविता की हर एक पंक्ति उनके लिए तुलनात्मक भाषाविज्ञान, तत्वमीमांसा, इतिहास और जाने क्या-क्या सीखने का  एक नया अवसर था। आधुनिक इंडोलॉजिस्टों के लिए उनकी घृणा /अवमानना हमेशा उतनी ही स्पष्ट थी जितनी हर परंपरागत रूप से हिंदू बातों के लिए उनकी प्रशंसा।

उन्होंने एक दिन मुझे चौंका दिया जब उन्होंने श्री एस राधाकृष्णन के विषय में अवमानना करते हुए कहा कि उनके अनुसार श्री एस राधाकृष्णन ने हिन्दू दर्शन को पश्चिमी दर्शन से उधार ली गई एक वैचारिक रूपरेखा की ज़ंजीर में बैठाने की कोशिश की थी। मैंने अब तक किसी भी हिंदू दर्शन का अध्ययन नहीं किया था ना ही मैंने राधाकृष्ण जी का कोई लेख पढ़ा था। लेकिन यह एक प्रसिद्ध नाम था जिस पर  प्रत्येक भारतीय को गर्व था। प्राध्यापक ने यह तर्क दिया कि संस्कृत के ज्ञान के बिना हिंदू दर्शन पर लिखने का उपक्रम करने वाला  आदमी बैंक बैलेंस के बिना चेक लिखने वाले व्यक्ति की तरह है। मुझे बाद में पता चला कि प्राचार्य का यह आरोप सर्वथा सत्य था।

एक दिन वह, दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में भारत पर आर्य आक्रमण के सिद्धांत पर काफी बरस पड़े। मुझे कभी यह संदेह नहीं हुआ था कि यह सिद्धांत पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा जानबूझकर स्थापित किया गया एक पौधा था, और उन्होंने यह इसलिए कहा था जिससे वह यह साबित कर सकें कि भारत केवल एक धर्मशाला था, जिसमें यह साबित करने के लिए कि भारत एक कारवांसराय था जिसके लिए कोई भी नस्लीय, धार्मिक या भाषाई समूह अपने घर के रूप में दावा नहीं कर सकता था। विद्यालयों और महाविद्यालयों में इतिहास के हमारे शिक्षकों ने हमेशा भारतीय इतिहास का पहला पाठ जंगली आर्यों के आगमन के साथ शुरू किया था जिन्होंने सिंधु घाटी में शहरों को नष्ट कर दिया, जिन्होंने द्रविड़ को दक्षिण की ओर खदेड़ दिया और जिनकी युद्ध की गाथाएं ऋग्वेद में संरक्षित थीं। प्राचार्य ने इस सारे इतिहास को एक मनगढ़ंत कहानी के रूप में खारिज कर दिया, जिसका कोई साहित्यिक या पुरातात्विक सबूत नहीं था।

यह हमारे संस्कृत प्राध्यापक का ही प्रबल प्रभाव  था जिसने मुझे प्रतिवाद करने को प्रेरित किया, जब हमारे इतिहास के शिक्षक ने मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन को इस्लाम के प्रभाव से प्रेरित हुआ बताया। पढाते समय जब उन्होंने डॉक्टर ताराचंद का उद्धरण करते हुए अपनी सहमति जताई और ये बताया कि शंकराचार्य सातवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में केरल में बस गए कुछ अरब व्यापारियों के साथ संबंध के कारण एकेश्वरवाद की ओर आकर्षित हुए थे, तो मेरा मन विद्रोह से भर गया। इतिहास के शिक्षक ने मुझे चुनौती दी कि मैं एक प्रतिद्वंदी थीसिस लिख कर  ताराचंद द्वारा स्थापित सिद्धान्त को असत्य प्रमाणित करूँ। मैंने भक्ति आंदोलन पर एक बहुत लंबा लेखापत्र/शोध पत्र लिखा जिसे पूरी कक्षा के सामने पढ़ने में मुझे एक घंटा लगा। इतिहास के शिक्षक ने अपने पक्ष से इस मामले में  अच्छी बहस करने के लिए मेरी प्रशंसा की लेकिन वह इस बात पर अड़े रहे कि ताराचंद जैसा प्रसिद्ध अधिकारिक विद्वान गलत नहीं हो सकता।

मैं अपने संस्कृत के प्राध्यापक का पसंदीदा छात्र था। उन्होंने एक संस्कृत परिषद का गठन किया जिसका उन्होंने मुझे पहला सचिव बनाया। वे संस्कृत भाषा तात्कालिक और अत्यधिक धाराप्रवाह बोल सकते थे। उन्होंने मुझे भी संस्कृत में ही अपने भाषणों को लिखने और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। यह काफी मुश्किल था पर उन्होंने इस कोशिश में मेरी बहुत मदद की। मैं इस कोशिश में सफल हुआ और ऐसे कई लोगों को आश्चर्यचकित किया जो मुझे संस्कृतज्ञ के रूप में नहीं जानते थे। मुझे कुछ प्रसिद्ध विद्वानों को सुनने का अवसर मिला जो हमारे संस्कृत परिषद के दो सफल वार्षिक सत्र को संबोधित करने आए थे।

लेकिन उन्होंने हरिजन कार्य के साथ मेरे जुड़ाव को दृढता से अस्वीकार कर दिया। वास्तव में वह ये मानने के लिए तैयार नहीं थे कि मैं इस तरह की घृणित गतिविधि में संलग्न हो सकता हूं. मेरा एक सहपाठी तो मेरी प्रशंसा करना चाहता था और उसने एफआईआर दर्ज करा दी थी। उन्होंने मुझे तुरंत बुलाया और मुझसे इस बारे में सीधा सवाल किया । मैंने उन्हें सच बता दिया। लेकिन उनकी आंखों या शब्दों में मेरे लिए कोई तिरस्कार या दोषारोपण नहीं था। उन्होंने अनैतिकता के कुछ उदाहरणों के साथ मुझसे कोमल अनुनय की कोशिश की, जो उन्हें लगा था कि लोगों के एक निश्चित वर्ग में अनुवांशिक रूप में होती ही है। मैं उनसे बहस नहीं करना चाहता था क्योंकि मैं उनकी बहुत इज्ज़त करता था। पर मैंने उन्हें बताया कि मैं उनसे सहमत नहीं हूं।

मेरे मार्क्सवाद की ओर बढ़ने से पहले यह महान विद्वान और शिक्षक गंभीर रूप से बीमार हो गए और मेरे कॉलेज छोड़ने से पहले ही वे स्वर्गवासी हो गए। मैं कभी-कभी सोचता हूं कि अगर मैं उनके प्रभाव में रहता तो शायद मार्क्सवाद और अनीश्वरवाद की ओर अग्रसर हो जाता। यह भी सोचता हूं कि क्या हम दोनों कभी अस्पृश्यता की समस्या के बारे में सहमत होते? लेकिन जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो, हिंदू संस्कृति और इतिहास के प्रति गौरव के बीज जो उन्होंने ही सबसे पहले मेरे दिमाग में रोपे थे, उसके लिए मैं उनके प्रति बहुत आभार महसूस करता हूं।

इन संस्कृत सावंत के चरणों में मैंने जो सीखा था उसके प्रबल अंतर्प्रवाह का प्रभाव ही था कि मैं अपने पुराने दिनों के आदर्शों और आराध्य से पूरी तरह संबंध नहीं तोड़ सका। मार्क्सवाद ने मुझे अपने ब्रह्मांड के निर्माता और नियंत्रक के रूप में ईश्वर में विश्वास त्यागने पर मजबूर कर दिया। लेकिन श्री गरीबदास और संतों और सूफियों के प्रति मेरी श्रद्धा अक्षुण्ण ही रही, जिनसे  उन्होंने अपने महान ग्रंथ साहिब के माध्यम से मेरा परिचय करवाया था। मैंने गांधीवाद त्याग दिया लेकिन महात्मा गांधी के प्रति मेरी श्रद्धा रही। उनकी आध्यात्मिक शक्ति और नैतिक कद ने मुझ पर पहले की तरह अपना जादू बनाए रखा। और जब भी श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद के पवित्र नामों का उल्लेख होता तो मेरा सिर स्वतः ही श्रद्धा और सम्मान से झुक जाता।

मेरी बौद्धिक धारणा और भावनात्मक विसंगतियों के बीच यह विभाजन मार्क्सवाद की मेरी अधूरी स्वीकृति के कारण भी था। मैंने मानव इतिहास की प्रतिक्रियाओं की पर्याप्त व्याख्या के रूप में मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद को स्वीकार कर लिया था। मैंने मानव समाज द्वारा संचित सभी पूंजी के स्तोत्र के रूप में उनके श्रम सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था। मैं स्पष्ट रूप से देख सकता था कि राज्य,वर्ग उत्पीड़न का एक साधन था। मैं सामाजिक संस्थाओं,कानून नियम संग्रह और पारंपरिक नैतिकता के लबादे के पीछे छिपे हुए नग्न वर्ग स्वार्थ को देख सकता था और मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वहारा क्रांति की वांछनीयता के साथ-साथ अनिवार्यता पर भी विश्वास हो गया लेकिन मैंने द्वंदात्मक भौतिकवाद को विश्व प्रक्रिया के मान्य दृष्टिकोण के रूप में स्वीकार करना बहुत मुश्किल, लगभग असंभव पाया।

मैंने यह जानने के लिए आधुनिक पश्चिमी दर्शन के बारे में काफी पढ़ा था कि भौतिकवाद निर्धाराणात्मक होने के साथ-साथ द्वंद्ववाद में उद्देश्यवाद का एक स्पष्ट तत्व था। इसलिए भौतिकवाद और द्वंदात्मकता का सामंजस्य नहीं हो सका। मैंने यह मामला अपने राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक के पास निर्दिष्ट किया था जिन्हें मैं बहुत अच्छा मार्क्सवादी समझता था। लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि दर्शनशास्त्र कभी उनका ज्ञान क्षेत्र नहीं था और उन्होंने अभी द्वंदात्मक भौतिकवाद का अध्ययन नहीं किया। इसके बाद मैं इस समस्या को हमारे महाविद्यालय के दर्शनशास्त्र के एक प्राध्यापक के पास ले गया। उन्होंने मेरे संदेह की पुष्टि की कि भौतिकवाद और द्वंद्वत्मकता तार्किक रूप से अपरिवर्तनीय थे। मैंने उसे उस समय छोड़ दिया लेकिन वैचारिक रिक्ति दिमाग में लगातार चलती रही।

इस बीच मैंने अपने निजी शीर्षस्थ संतों और साधुओं के दल में सुकरात और श्री औरबिंदो को भी जोड़ दिया था। उन्होंने आने वाले समय में मेरी बौद्धिक पारी पर काफी प्रभाव डाला।

मुझे सुकरात के चरणों में नतमस्तक करने वाले प्लेटो को ग्रीक राजनीतिक विचार के एक छात्र के रूप में पढ़ना आवश्यक गतिविधि थी। लेकिन मैं रिपब्लिक, द लॉज़ और द स्टेटमेंट पर नहीं रुका, जिन्हें पढ़ लेने से मेरा पाठ्यक्रम पूरा हो जाता। मैंने उनके व्यक्तित्व के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए व्यवहारिक रूप प्लेटो को पूरा पढ़ लिया, जिन्हें किसी ने पश्चिमी दुनिया के द्वारा ज्ञात प्रथम सत्याग्रही (सत्य का पालन करने वाले) के रूप में वर्णित किया था। आखिरकार वह अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने तीन संवादों  “अपौलोजी,” “क्रितो” ,” फेइदो” द्वारा अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा को व्यक्त कर सके। उनके ज्ञान के साथ-साथ उनके चरित्र के बड़प्पन ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया। सुकरात के व्यक्तित्व से आकर्षण ने मुझे बाद में सुकरात के ये तीनों संवादों को हिंदी में अनुवादित और “सत्यकाम सुकरात” शीर्षक के तहत प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया।

वहीं दूसरी तरफ श्री औरबिन्दो से भी मेरी मुलाकात अनजाने में ही हुई। मैंने उनका नाम अपने पिता से सुना था जिन्होंने उनका एक महान योगी के रूप में गुणगान किया था। मेरे पिता का यह मानना था कि श्री औरबिन्दो जमीन से पांच फुट ऊपर उठकर हवा में स्थिर रह सकते हैं।

मैंने कभी भी श्री औरबिन्दो द्वारा लिखित कुछ भी नहीं पढ़ा था और ना ही वे मेरी उस सूची में थे जिन्हें मैं किसी दिन पढ़ने की इच्छा रखता था। कॉलेज के बौद्धिक अभिजात वर्ग स्पेंगलर, बर्गसन, मार्सल प्राउस्ट, बर्नड शौ, और ऐलडस हक्सले के बारे में बहुत बातें करते थे लेकिन मैंने इस विशिष्ट सभा में कभी श्री औरबिन्दो का नाम नहीं सुना था।

शायद आपको ये अजीब लग सकता है कि मनोविश्लेषण के संस्थापक सिगमंड फ्रायड में अपनी रुचि के कारण ही श्री औरबिन्दो की तरफ मेरा ध्यान गया था। कॉलेज में मनोविज्ञान मेरा विषय नहीं था। लेकिन मेरे दार्शनिक मित्र ने पश्चिमी मनोविज्ञान में मेरी रुचि बढ़ाई थी जैसा कि उन्होंने पश्चिमी दर्शन में किया था। मैंने मनोविज्ञान के सभी छह पद्धतियों का अध्ययन किया जो उन दिनों में प्रचलित थे। लेकिन मैं सिर्फ फ्रायड के गहन मनोविज्ञान से बहुत प्रभावित हुआ था।हमारे विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उस समय उनके लगभग सभी प्रकाशित कार्य थे जिनमें उनके विस्तीर्ण व्यक्ति वृत्त भी शामिल थे। पर इनके इन बृहत ग्रंथों को पढ़ने वाले बहुत पाठक नहीं थे। इसलिए मैं उनका आराम से अध्ययन कर सकता था। हालांकि मैं सोचता हूं कि क्या मैंने इनसे कोई बौद्धिक लाभ उठाया? मुझे जो याद है वह यह, कि मैंने अपनी मानसिकता में सभी प्रकार के संघर्षों और जटिलताओं को देखना शुरू कर दिया। यह कुछ ऐसा था जैसे होम्योपैथी के एक अपरिपक्व छात्र के साथ होता है जो मटेरिया मेडिका में वर्णित सभी प्रकार के रोगों के लक्षणों को अपने आप में ही देखना शुरू कर देता है।

मेरे मन में बसे भय ने मुझे हमारे प्राचार्य से संपर्क करने को प्रेरित किया जो एक प्रसिद्ध मनोविश्लेषक थे। उन्होंने मुझे निःशुल्क संसर्ग के कुछ सत्र दिए जो फ्रायड द्वारा निर्धारित चिकित्सा पद्धति थी। मुझे याद नहीं कि इनसे मुझे कुछ फायदा हुआ हो। प्रोफेसर को शायद जल्द ही पता चल गया कि मैं खुद ही जबाव देने का शिकार था। लेकिन जब एक दिन उन्होंने अचानक मुझसे पूछा कि क्या मुझे भगवान पर विश्वास है, तब मैं आश्चर्यचकित रह गया। जब मैंने नकारात्मक उत्तर दिया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं उच्च चेतना में विश्वास करता हूं ? मैं श्री गरीबदास और उन संतों और सूफियों का निराकरण किये बिना इस बात का खंडन नहीं कर सकता था जो हमेशा ज्ञान के आलोक और प्रकाश की अभिव्यक्ति से परिपूर्ण चैतन्य की बात करते थे।

मुझे नहीं पता था कि प्राचार्य श्री औरबिन्दो के भक्त थे। वे अपने आपको मेरे सामने पूरी तरह से प्रकट करने की जल्दी में नहीं थे। उन्होंने बताया कि हालांकि उन्हें मनोविश्लेषण में काफी वर्षों तक बहुत विश्वास था परंतु अब वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि योग मानसिक बीमारियों से निपटने का एक अधिक प्रभावी तरीका था। मुझे योग के बारे में कुछ पता नहीं था। मैं केवल भारतीय दर्शन की प्रणाली के प्रतिपादक के रूप में पतंजलि के नाम से ही अवगत था। मैंने अब तक किसी भी भारतीय दर्शन का अध्ययन नहीं किया था और ना ही मैं ऐसा करने का इच्छुक था। प्रोफेसर ने भी यही कहा कि मुझे योग दर्शन के बारे में इतना सोचने की जरूरत नहीं। श्री औरबिन्दो द्वारा व्यवहारिक योग के कुछ सरल प्रतिपादन से मुझे शुरुआत करने की जरूरत थी।

उन्होंने मुझे कुछ किताबें उधार देने का भी वादा किया अगर मुझे वे किताबें कहीं ना मिलें तो।

श्री औरबिन्दो के लेखन की खोज ने मुझे चांदनी चौक के मेरे पुराने पसंदीदा पुस्तकालय की ओर अग्रसर किया। कॉलेज और विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों ने अब तक उनकी किसी भी रचना का अधिग्रहण नहीं किया था शायद इसलिए कि वे हाल ही में प्रकाशित हुए थे। चांदनी चौक  के पुस्तकालय में  उनकी कुछ किताबें थी। इनमें से एक थी “द लाइफ डिवाइन” । अपने प्रोफेसर के अनुशंसा के विपरीत मैंने वह पुस्तक तुरंत ले ली। यह एक बौद्धिक अनुभव था जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगा। मुझे अभी भी याद है कि कैसे एक दिन मेरी लालटेन में केरोसिन खत्म हो जाने पर मैंने छत पर चांदनी रात में इसको पढ़ने की कोशिश की  थी। उस समय जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह था श्री औरबिन्दो के भौतिकवाद के तत्वज्ञान, उसकी आत्मविषयक और वैज्ञानिक जटिलता और जीवन अभिप्राय का प्रतिपादन। यह मार्क्स की तरह तेज दिमाग था परंतु कुछ और विस्तृत था.

जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि “द लाइफ डिवाइन” में प्रतिपादित श्री औरबिन्दो के विस्तृत विजन का बड़ा हिस्सा उस समय मेरी समझ से परे था।

जिस ऊंचाई पर वह विश्व के सम्मुख आए और मानव प्रारब्ध के घटनाचक्र ने मुझे स्तब्ध कर दिया था। । लेकिन यह बात शुरुआत में ही स्पष्ट हो गई थी कि मनुष्य की उनकी अवधारणा के आयाम लोगों से अलग थे जो मैंने किसी अन्य विचार प्रणाली में नहीं देखा था। वह मनुष्य को एक निर्माता और भौतिक वस्तुओं के उपभोक्ता के रूप में नहीं देखते थे। वह मनुष्य को किसी सामाजिक या राजनीतिक या आर्थिक संगठन के सदस्य के रूप में भी नहीं देखते थे। वह मनुष्य को एक तर्कसंगत पशु या एक नैतिक आकांक्षी के रूप में नहीं देखते। एक मनुष्य उनके अनुसार यह सब कुछ था, साथ में और बहुत कुछ भी। वह अंतर्निहित दिव्यता से परिपूर्ण एक आत्मा थी जो अकेले ही  मानव व्यक्तित्व की बाहरी अभिव्यक्तियों को पोषित कर सकती और अर्थ दे सकती थी।

मानव जाति की जिस चरम नियति के बारे में श्री औरबिन्दो ने दावा और वादा किया था, वह मार्क्स के द्वारा आयोजित की तुलना में कहीं अधिक विलक्षण था। मार्क्स द्वारा अनुमानित और पक्षपोषित अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा क्रांति एक ऐसी अवस्था की ओर ले जाने के लिए की गई थी जिस पर मानव जाति खुद को तर्कसंगत, नैतिक और सौंदर्यविषयक प्रयासों में संलग्न कर सकती है, और जो वर्गीय हितों से जुड़ी विकृतियों से मुक्त हो। लेकिन श्री ऑरबिंदो द्वारा परिकल्पित और अनुशंसित मनुष्य की मानसिक,जीवनीक, और शारीरिक प्रकृति की सर्वोच्चता मानव जाति को एक मानव जीवन के आध्यात्मिक आत्म अस्तित्व और मानव जीवन के लौकिक उथल-पुथल के बीच की खाई को पाटने में सक्षम बनाएगी।

मार्क्स और श्री औरबिन्दो के बीच के अंतर/पार्थक्य को दिखाने के लिए अब मैं जिस वैचारिक भाषा का उपयोग कर रहा हूं वह उन दिनों मेरे लिए सुलभ नहीं थी। मुझे अधिकाँश स्पष्टता पश्चिम दृष्टि से प्राप्त हुई है। लेकिन उस समय मेरी दृष्टि चाहे कितनी ही अस्पष्ट और अपरिपक्व क्यों न रही हो, मैंने यह ज़रूर महसूस किया कि श्री औरबिन्दो ब्रह्मांड और मानव जीवन के विभिन्न तात्विक आयामों के बारे में बात कर रहे थे। मेरे सांसारिक हितों और  श्री औरबिन्दो द्वारा निर्धारित वृहत महत्वाकांक्षाओं के बीच की खाई बहुत व्यापक थी और कदाचित् मैं इसे पार करने की परवाह या हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। लेकिन अपनी आंतरिक विश्रांतियों मैं में ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में, उसमें मानव जीवन के स्थान और मानव जीवन के अर्थपूर्ण लक्ष्य के बारे में उत्सुक हो गया।

मेरी समस्या अब श्री औरबिन्दो और मार्क्स के बीच इसी क्रम में सामंजस्य स्थापित करना था। निस्संदेह क्रम में पहले मार्क्स आए। वह सामाजिक परिदृश्य के सर्वोत्कृष्ट प्रतिपादक थे जिसके साथ मैं मुख्यतः तल्लीन भी था और नितांत असंतुष्ट भी। श्री औरबिन्दो को कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में मार्क्स की व्यवस्था में समायोजित करना था।  कई वर्षों बाद मैंने यह सामंजस्य अपनी परम संतुष्टि के अनुसार हासिल कर लिया। अंततः मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि मार्क्स एक सामंजस्य पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के प्रतीक थे तो श्री औरबिन्दो एक सामंजस्य पूर्ण मानव व्यक्तित्व की कुंजी।इस सामंजस्यता की हास्यास्पद स्थिति मुझे तब तक भी स्पष्ट नहीं हुई जब श्री औरबिन्दो के सुपरिचित प्रतिपादक, जिन्हें मैंने इसे एक बौद्धिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, ने इसे एक शीलवन्त मुस्कान के साथ खारिज कर दिया। मैंने  उन प्रतिपादक को कम समझदार कहकर खारिज कर दिया क्योंकि शायद उन्होंने श्री औरबिन्दो की रचनाओं का अध्ययन किया था लेकिन शायद मार्क्स का अध्ययन नहीं किया था, कम से कम उतना नहीं जितना मैंने किया था।

(रागिनी विवेक कुमार द्वारा अनूदित)


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