लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रही हैं कागजी पार्टियां
लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था, नैतिकता और कानून को दीमक की तरह चाट रही हैं कागजी पार्टियां। कागजी पार्टियों की पूरी संरचना ही रहस्यमयी होती है। कागजी पार्टियां वह हैं, जिनका चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन तो जरूर है और उन्हें राजनीतिक पार्टी के तौर पर मान्यता भी है पर चुनाव आयोग के निर्देशों, परम्पराएं और नियम कानूनों की कसौटी पर खरे नहीं उतरती हैं, उनका अस्तित्व जमीन पर नहीं होता है, उनके पास न संगठन होता है और न ही कार्यकर्ताओं का समूह होता है, समर्थक वर्ग भी नहीं होता है, उनकी राजनीतिक गतिविधियों शून्य होती हैं, उनका संघर्ष शून्य होता है, आम जनता की परेशानियों और समस्याओं से उनका जुड़ाव नहीं होता है, बल्कि कोई लेना देना नहीं होता है, सामाजिक बुराइयों के निराकरण पर भी उनकी कोई सोच नहीं होती है, राष्ट्रीय समस्याओं और राष्ट्रीय संकटों के प्रति उनकी उदासीनता भी नहीं टूटती हैं, अंतरराष्ट्रीय नियम कानूनों से प्रभावित राष्ट्र के हित भी उन्हें सक्रिय होने के लिए प्रेरित नहीं कर पाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि कागजी पार्टियां लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो रही हैं, स्वास्थ्य और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालती हैं, अतिरिक्त भार और चुनौती के तौर पर खड़ी होती हैं, भ्रम फैलाती हैं, चुनावी मुद्दों को भटकाती हैं, पैंतरेबाजी दिखाती हैं और वोटो का ध्रुवीकरण करने के नाम पर बड़े दलों को ब्लैक मेल भी करती हैं, अवैध वसूली इनका धंधा होता है, काले धन को सफेद करने के भी गुनहगार होती हैं। भ्रष्टाचार और कदाचार के साथ ही साथ अनैतिक का घिनोना उदाहरण और प्रतीक भी बन गई हैं। निर्दलीय होने का दंश और निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए कठिन चुनावी अहर्ताएं भी कागजी पार्टियां की तिजोरी और जेब को गर्म करती हैं, इनकी समृद्धि को बढ़ाती हैं। कागजी पार्टियां के भ्रष्टाचार, कदाचार, अनैतिकता को रोकने के लिए वर्तमान चुनावी अहर्ताएं और संहिताएं बहुत ही कमजोर ही नहीं बल्कि बेजान भी हैं। फिर इनके गुनाह को कैसे रोका जा सकता है?
काले धन का शोधन खूब कर रही हैं कागजी पार्टियां। इनकम टैक्स का भी चूना लगा रही हैं, इनकम टैक्स का चूना लगाने का अर्थ राष्ट्र की आय का संहार करना है। इनकम टैक्स राष्ट्र की आय का एक बड़ा माध्यम है। राष्ट्रीय आय पर ही राष्ट्र का विकास और उन्नति निश्चित होता है, राष्टीय आय का संहार करने का सीधा अर्थ देश के विकास और उन्नति को प्रभावित करना और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का संहार करना है, जन कल्याणकारी कार्य और योजनाएं जनता की किश्मत को चमकाती हैं और उनकी समस्याओं को कम करती हैं। यह सिर्फ आरोप नहीं है बल्कि सच्चाई है, तथ्य पक्के और प्रमाणित है। सबसे बड़ी बात यह है कि कागजी पार्टियां के काले धन के शोधन पर और काले धन को सफेद करने के खिलाफ मीडिया की आवाज उठी है, राजनीति की आवाज उठी है, जनता की आवाज भी उठी है। राजनीति की आवाज आरोप और प्रत्यारोप पर शोर मचा रही है तो फिर जनता की आवाज सोशल मीडिया पर शोर मचा रही हैं। विपक्षी राजनीति जहाँ इसके लिए सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रही है और कह रही हैं कि इसके पीछे बीजेपी की धांधली है, बीजेपी ने ही कागजी पार्टियां खड़ी कर लोकतंत्र का गला घोट रही हैं और कालेधन का शोधन कर रही हैं। विपक्षी पार्टीयों के ऐसे आरोपों में दलीय प्रतिबद्धता, सोच और सत्ताधारी पार्टी बीजेपी को बदनाम करने की मानसिकता ही झलकती है। पर जनता की आवाज शक्तिशाली है, प्रहारक है और स्वच्छ , निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर चिंता भी जाहिर करती है। जनता की आवाज सीधे तौर पर कागजी पार्टियों का चुनावी रजिस्ट्रेशन और मान्यता समाप्त करने की मांग करती है। जनता की यह मांग स्वाभाविक है।
आंकड़े देखिये, चंदाखोरों का गुनाह भी देखिये। गुजरात की छह कथित राजनितिक पार्टियों को अरबों का चंदा मिला है। आम जनमत पार्टी का उदाहरण तो लोमहर्षक है, चिंता के प्रतीक है। राहुल गांधी का आरोप है कि 2025 मे गुजरात के अनाम पार्टियो्र को 4300 करोड का चं्रदा मिला है। जबकि गुजरात की ही अन्य छह पार्टियां्र भी कुख्यात रही है। 2023-2024 के दौरान आम जनमत पार्टी को 620 करोड़ रुपए का चंदा मिला है, सत्यवादी रछक पार्टी को 330 करोड, अभिव्यक्ति पार्टी को 219 करोड, न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी को 200 करोड, भारतीय नेशनल जनता दल को 191 करोड और गरीब कल्याण पार्टी को 188 करोड का चदा मिला है। खासकर आम जनमत पार्टी को 620 का चंदा मिलना चकित करने वाला अपराध है। 620 करोड़ की राशि कम नहीं होती है, यह बहुत बड़ी राशि है। इतनी बड़ी राशि तो सक्रिय और अस्तित्व सहित बड़े जनाधार वाली पार्टियों को भी नहीं मिली है। देश में कोई एक नहीं बल्कि अनेको सक्रिय अस्तित्व और जनाधार वाली राजनीतिक पार्टियां है। उदाहरण के लिए राजद, समाजवादी पार्टी, द्रमुक, अकाली दल, टीएमसी, जद यू, झारखंड मुक्ति मोर्चा, कम्युनिस्ट पार्टियां। पर इन सभी राजनीतिक पार्टियों को एक वित्तीय वर्ष में उतनी बड़ी राशि चंदा के रूप में नहीं मिलीं है जितनी बड़ी राशि आम जनमत पार्टी सहित अन्य कागजी पार्टियों को मिली है। रीकांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है, देश के ऊपर सबसे अधिक समय तक शासन करने वाली पार्टी भी कांग्रेस है, कांग्रेस अभी भी देश का विपक्षी पार्टी है और कांग्रेस का जनाधार भी बीजेपी के बाद सबसे अधिक है। फिर भी कांग्रेस के खाते में आम जनमत पार्टी के 620 करोड़ की तुलना में 125 करोड़ रुपए ही आए। कागजी दलों से अधिक चंदा बीजेपी को मिला है। बीजेपी केंद्र में सत्तासीन है और उसकी कई राज्यों में सरकारें हैं, इसलिए बीजेपी को मिलने वाले चंदों का गणित भी समझ में आता है। सबसे बड़ी बात यह है कि कागजी पार्टियों का दफ्तर भी लापता होता है। आम जनमत पार्टी का स्थाई दफ्तर कहा है, किसी को पता नहीं है। एक मीडिया पड़ताल में कागजी पार्टियों के अध्यक्षों का सही पता भी नहीं है, कोषाध्यक्ष अनभिज्ञता जाहिर करता है, कोषाध्यक्ष को यह मालूम नहीं है कि इतने रुपए कहा से आए और इतने रुपए देने वाले कौन लोग हैं, संपर्क नंबर भी गौण होता है, बंद होता है, बदलता रहता है। कार्यकर्ता विहीन, चुनाव में भी कोई दमदार उपस्थिति नहीं, उम्मीदवार भी सीमित। वोट सैकड़ों में सीमित। फिर भी इन्हें करोड़ो अरबों का चंदा मिलना कई प्रश्नों को जन्म देता है।
इतनी बड़ी राशि चंदा के रूप में देने वाले कौन लोग होते हैं, उनका मकसद क्या होता है, क्या ऐसे लोग सही में दानकर्ता होते हैं, क्या उनकी सोच समाजसेवा होती है, क्या वे लोकतंत्र को मजबूत करने और स्वच्छ राजनीतिक पार्टियां खड़ी और सक्रिय करने के लिए दान चंदा देते हैं? टैक्स चोरी का खेल होता है। टैक्स चोर की श्रेणियां अनेक हैं, टैक्स चोर व्यापारी हो सकते हैं, डॉक्टर हो सकते हैं, उद्योगपति हो सकते हैं, कॉरपोरेट घराने के लोग हो सकते हैं, ठेकेदार हो सकते हैं, स्कूल संचालक हो सकते हैं, विभिन्न प्रकार के सेवा प्रदान करने वाली कंपनियां हो सकती हैं। वास्तव में राजनीतिक पार्टियों या फिर टैक्स छूट हासिल करने वाले एनजीओ को दान देने से आयकर में छूट मिलती है, दान की गई राशि को आय की जोड़ से बाहर कर दिया जाता है। देश में कई एनजीओ और कागजी पार्टियां है जो चंदा लेकर 60 प्रतिशत तक राशि ब्लैक मनी के तौर पर दान कर्ता को वापस कर देते हैं, इस प्रकार इस तरह के दानकर्ता को दोहरी लाभ मिलता है, एक टैक्स देने से बच जाते हैं और दूसरा दान का एक बड़ा भाग ब्लैक मनी के रूप में उनके पास वापस आ जाता है। इस तरह से टैक्स चोर दान कर्ता कागजी पार्टियों के पोषक बने हुए हैं। आतंकी संगठनों और हवाला अपराधियों से भी कागजी पार्टियां समृद्ध हो रही हैं।
उंगली अन्य कईयों पर उठनी चाहिए, जिन्होंने कागजी पार्टियों को अराजकता और अनैतिक गुनाह करने की पूरी छूट दे रखी है। इनकम टैक्स, इडी और अन्य जांच एजेंसियों की सक्रियता क्यों नहीं हुई जबकि इन प्रश्नों पर जांच एजेंसियों की सक्रियता अनिवार्य है। केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेना चाहिए। क्योंकि कागजी पार्टियां स्वास्थ्य लोकतंत्र के लिए हानिकारक और बाधा है, टैक्स चोरों की मदद कर कागजी पार्टियां देश की राष्ट्रीय आय को चपत कर रही हैं और राष्ट्रीय आय का संहार भी कर रही हैं।
