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Saturday, May 21, 2022

इतिहास याद रखेगा कि फेमिनिस्ट औरतों का स्वर उदारवादी मुस्लिम महिलाओं का स्वर बनने के स्थान पर उन्हें परदे में धकेलने वालों के साथ खड़ा था

हिजाब आन्दोलन जैसे जैसे आगे बढ़ रहा है, उसकी आंच उदारवादी मुस्लिम महिलाओं पर पड़ रही है परन्तु शाहबानो के मामले के बाद वर्ष 2022 की फरवरी इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि फेमिनिस्ट दीदी लोग मुस्लिम महिलाओं को चीज़ समझने वालों के साथ जाकर खड़ी थीं, और इस बहाने उदारवादी मुस्लिम औरतों को गाली ही नहीं बल्कि धमकी दिलवाने में उनका प्रत्यक्ष योगदान था।

चूंकि फेमिनिस्ट और कथित पिछड़े और कट्टर इस्लामिस्ट उदारवादी हिन्दू “बुद्धिजीवी” उन लोगों के पक्ष में खड़ा हो गया है जो मुस्लिम औरतों को उसी अँधेरे में धकेलने के पक्ष में हैं, जिससे इस समय पूरे मुस्लिम जगत की औरतें बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं, कि वह उदारवादी मुस्लिम लड़कियों को धमका रहे हैं और उन्हें पर्दा न करने पर मारने की धमकी दे रहे हैं।

कश्मीर में जैसे ही कक्षा बारह के परिणाम आए, वैसे ही सबसे अधिक अंक पाने वाली आरूसा परवेज के लिए खुशी से अधिक सिरदर्द पैदा हो गया, क्योंकि फेमिनिस्ट महिलाओं के समर्थन से हौसला पा रहे कट्टरपंथी तत्व उस लड़की पर हावी हो गए और उसकी ऑनलाइन ट्रोलिंग तो करने ही लगे साथ ही उसे धमकी भी दी जाने लगी। कश्मीर ऑब्ज़र्वर से बात करते हुए अरूसा ने कहा कि उनके लिए यह सब कमेन्ट मायने नहीं रखते हैं, परन्तु कट्टरपंथी तत्वों ने उनके अभिभावकों को भी नहीं छोड़ा है।

उनका कहना है “हिजाब पहनना या न पहनना किसी का भी मजहब में यकीन नहीं बता सकता। मैं उनसे (ट्रॉल्स) से अधिक अल्लाह को प्यार करती हूँ। मैं दिल से मुस्लिम हूँ, हिजाब से नहीं!”

जैसे ही पत्रकारों ने अरूसा की तस्वीर पोस्ट की, वैसे ही कश्मीर का वर्चुअल स्पेस उस बच्ची के लिए गालियों से भर गया। उसकी यह कहते हुए ट्रोलिंग होने लगी कि हमारी बहनें हिजाब के लिए कर्नाटक में लड़ रही हैं, और कश्मीर में कथित मुसलमान लडकियां हिजाब नहीं ओढ़ रही हैं।

उस टॉपर लड़की की उपलब्धियों को कम करके आंका जाने लगा कि आपने केवल कक्षा बारह ही पास की है, कुछ ख़ास कमाल नहीं कर लिया है।

वामपंथी फेमिनिज्म खुलकर इन कट्टरपंथी तत्वों के साथ खड़ा है

आज जो अरूसा के साथ हुआ क्या उसमें केवल कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों का हाथ है? नहीं, उसमें कांग्रेस के साथ साथ वामपंथी फेमिनिस्ट दीदी लोगों का भी हाथ है, जो मोदी सरकार से हिसाब बराबर करने के लिए केवल कट्टरपंथी इस्लाम का माउथपीस बनी हुई है। किसने इन फेमिनिस्ट को यह अधिकार दिया कि वह अरूसा जैसी लड़कियों के लिए खतरा बने कट्टरपंथी तत्वों के साथ जाकर खड़ी हो जाए? किसी ने नहीं, पर वह खड़ी हैं!

इतना ही नहीं, जब उदारवादी मुस्लिम स्वर अम्बर जैदी ने मौलाना राशिद का इंटरव्यू लिया तो मौलाना के गंदे विचार सामने आए और उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि “कॉलेज में लडकियां टॉपलेस होकर जाती हैं!”

यह भी हैरानी की बात है कि जब भारत में यह कन्वर्ट हुए मुसलमान खुद को और कट्टर मुसलमान और पाक मुसलमान दिखाने के लिए बुर्के के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, तो वहीं सऊदी की महिला टेनिस खिलाड़ी अपनी एक नई उड़ान उड़ रही है। इस बच्ची का चेहरा उन फेमिनिस्ट के लिए सच्ची मुस्लिम लड़की का चेहरा नहीं है, जो मुस्लिम लड़कियों को बुर्के में धकेल रही हैं

18 वर्षीय यारा पहली ऐसी सऊदी की महिला खिलाड़ी है जिन्होंने पेशेवर टेनिस महिला रैंकिंग में अपनी जगह बनाई है, इस बच्ची की मुस्कान देखिये, मगर भारत की यौन कुंठित फेमिनिस्ट लेखिकाओं के लिए काले बुर्के के पीछे छिपी लडकियां ही मुस्लिम हैं, यह मुस्कान, या फिर अरूसा की मुस्कान नहीं

इन कट्टरपंथियों के हौसले इन फेमिनिस्ट मादाओं के समर्थन से इतने बुलंद हैं कि वह उन्हें आइसक्रीम के रूप में दिखा रहे हैं तो कभी टॉफ़ी तो कभी चीज़, आज बिना हिजाब की लड़कियों को उन्होंने आईसक्रीम के रूप में दिखाया

फेमिनिस्ट लेखिकाएं आज मुस्लिम औरतों को कैंडी, चॉकलेट और चीज़ बनाने वालों के पक्ष में सहर्ष खड़ी हो गयी हैं। और इन फेमिनिस्ट मादाओं के चलते अरूसा जैसी लड़कियों को धमकियां मिलती हैं और इन फेमिनिस्ट मादाओं के चलते ही कट्टरपंथी इस्लामिस्ट के हौसले इतने बुलंद हैं कि वह केवल लड़कियों को धमका ही नहीं रहे हैं, बल्कि जो भी हिन्दू युवक हिजाब का विरोध कर रहे हैं, उन्हें भी मार रहे हैं, उन पर हमला कर रहे हैं।

आखिर यह फेमिनिस्ट कट्टरपंथी मुस्लिमों के पक्ष में क्यों खड़ी हैं और क्यों वह तसलीमा जैसी मुस्लिम महिलाओं के साथ नहीं हैं, जो खुलकर यह कह रही हैं कि हिजाब और बुर्का अंधकार युग की निशानी हैं।

एक और मजे की बात है कि जहाँ एक ओर यह कट्टरपंथी इस्लाम माशूका हिंदी फेमिनिस्ट लेखिकाएँ यह कहती हैं कि मुस्लिम समाज की औरतें अपने लिए संघर्ष कर रही हैं, परन्तु वह यह नहीं कहती कि आखिर वह संघर्ष किससे कर रही हैं? कौन से समाज से?

परन्तु हाँ, इतना निश्चित है कि इतिहास में यह अवश्य लिखा जाएगा कि जब पूरे विश्व में मुस्लिम औरतें रोशनी के लिए लड़ रही थीं, भारत में कट्टपंथी इस्लामी ताकतों के साथ मिलकर फेमिनिस्ट औरतें मुस्लिम महिलाओं को अँधेरे में धकेल रही थीं!

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