आज 90 रुपए के लगभग का एक डॉलर पड़ रहा है। प्रश्न ये है, ये देश के हित में है, या अहित में ? पर ये सत्य है कि इस स्थिति के पीछे डॉलर की बढ़ती मांग है। इसको कहते हैं डॉलर के मूल्य में वृद्धि होना ; या रुपए का अवमूल्यन हो जाना । क्या कारण है , पहले ये देख लें। आयात बढ़ेगा तो डॉलर बाहर निकलेगा, मांग बढ़ेगी। क्योंकि व्यापक रूप से दुनिया में व्यापार की मुद्रा डॉलर ही है।
दूसरा कारण है, एक्विटी मार्केट में उथल-पुथल। एफआईआई जब भारत के इक्विटी-बाजार में आते हैं तो अपने साथ डॉलर ले के आते हैं, फिर उसे रुपए में परिवर्तित करते हैं, और तब शेयर खरीदते हैं। लेकिन जब वो बाहर निकलते हैं तो शेयर बेचते हैं, और मिलते हैं रुपए। और चाहिए उनको डॉलर, अमेरिका आदि देशों में निवेश करने के लिए। तो वो रुपए के बदले डॉलर खरीदते हैं, जिससे फिर डॉलर की मांग बढ़ जाती है।
इस स्थिति में विनिमय-दर को संभालने के लिए आरबीआई क्या कर सकती है, प्रश्न ये है? उसके पास एक विकल्प होता है , अपने पास से डॉलर मार्केट में फ्लोट करके या बेचकर रुपए की मांग बढ़ा देना। इससे बहुत अंतर तो नहीं पड़ता , लेकिन गिरते रुपए को संभाला जा सकता है। और, दूसरी तरफ मार्केट में डॉलर का मूल्य भी थमेगा। लेकिन इस कदम का उपयोग आरबीआई अंतिम विकल्प के रूप में ही करती है।
प्रश्न उठता है, डॉलर की मांग बढ़ने पर आयात और निर्यात किस प्रकार प्रभावित होते है। मान लो पहले 1 डालर, 60 रुपए में मिल रहा था । ऐसी अवस्था में कोई निर्यात होने वाली वस्तु जिसकी अमेरिका में कीमत 1000 डॉलर है , एक निर्यातक को उसके बदले भारत में 60,000 रुपए मिलेंगे। लेकिन वही डॉलर जब 90 रुपए का होगा तो निर्यातक को 90,000 मिलेंगे। इस अवस्था में देश में निर्यात के प्रति अनुकूल वातावरण निर्मित होता है। लेकिन इसके विपरीत आयातक को ये स्थिति हानि की ओर ले जाने वाली हो जाती है।
अमेरिका को भारत कहीं ज्यादा निर्यात करता है । अमेरिका में आज की स्थिति में जबकि भारत पर अमेरिका ने टेरिफ़ बढ़ा दिये हैं। अनुमान है, रुपए के गिरते इस मूल्य को आरबीआई जान-बूझ कर संभालने में इच्छुक नहीं है। जिससे कि बढ़े टेरिफ़ को निष्प्रभावी किया जा सके। कहते हैं रुपए को 5% गिराकर, ये संभव हो सकता है। आईएमएफ़ के विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस स्थिति में कोई भी मुद्रा एक समय बाद स्वयं अपने को समायोजित कर लेती है। दूसरी तरफ करन्सी- ट्रेडर्स भी डॉलर्स के प्रवाह को रोककर , आरबीआई को डॉलर्स मार्केट में डालने को बाध्य करते हैं। और जब मार्केट में डॉलर आता है तो वो फिर गिरे मूल्य में खरीदी बड़ा देते हैं। इस बार आरबीआई ने उनको भी जवाब दिया है। ऊपर से इसके विपरीत आरबीआई ने फोरेक्स-स्वेप किया है , जो कि रुपए को और गिराने की दिशा में ले जाता है। और वही हुआ, रुपए 13 पैसे और गिर गया ।
लेकिन फिर भी फोरेक्स-रिजर्व बढ़कर $686 बिलियन पहुँच गया; और, व्यापार घाटा नवंबर में नीचे गिरकर कीर्तिमान स्तर $ 24.53 बिलियन पर आ गया है; जबकि अक्तूबर में $ 41.68 बिलियन था ! निर्यात में भी पिछले 10 वर्षों के नवंबर माह में इस बार सबसे अधिक वृद्धि हुई। नवंबर-2024 की तुलना में नवंबर-2025 में अमेरिका को निर्यात 22.50% बढ़ा है। खास तौर पर फार्मा और मोबाईल आदि इलेक्ट्रानिक्स उत्पादों को लेकर भारत और अमेरिका की कंपनियों के बीच जो गहरी परस्पर निर्भरता स्थापित हो गया है , उसका ये परिणाम है कि ट्रम्प के सारे प्रयास निर्मूल होते जा रहे हैं।
— राजेश पाठक
