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Tuesday, January 25, 2022

“हिन्दू धर्म की बुराई के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं कर सकते हैं ईसाई धर्म प्रचारक!” मद्रास उच्च न्यायालय

भारत माता और भूमा देवी के विरुद्ध ईसाई धर्म प्रचारक द्वारा अपशब्द बोलने जाने को लेकर दायर की गयी एफआईआर को रद्द करने की याचिका को मद्रास उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया। न्यायालय ने कहा कि उनके विरुद्ध बोले गए शब्दों से हिन्दुओं की धार्मिक आस्थाएं आहत होती हैं क्योंकि वह लोग भारत और उसकी भूमि को देवता मानते हैं। उसके बाद जो न्यायालय ने कहा है वह अत्यंत ध्यान देने योग्य है कि ईसाई धर्म प्रचारकों के पास दूसरे के धार्मिक विश्वास का अपमान करने का अधिकार नहीं है और यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत नहीं आता है।

क्या है मामला?

कन्याकुमारी में पन्नैविलाई के ईसाई प्रीस्ट जॉर्ज पोंनिया ने जुलाई 2021 में अर्बन नक्सल फादर स्टेन स्वामी को श्रद्धांजलि देने वाले एक कार्यक्रम में भारत माता, भूमा देवी, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह के खिलाफ तो अपमानजनक टिप्पणी की ही थीं, साथ ही हिन्दुओं को धमकाते हुए यह भी कहा था कि “हिन्दू एक बाल तक बांका नहीं कर सकते हैं”

उन्होंने उस दिन नागरकोइल के भारतीय जनता पार्टी के विधायक का उपहास उड़ाते हुए कहा था कि “गांधी भारत माता को आदरणीय मानते हैं, इसलिए वह उनकी प्रतिमा के पास चप्पल पहनकर नहीं आते। मगर हम इसलिए चप्पल पहनते हैं, जिससे भारत माता की अशुद्धि हमें गंदा न कर दे। तमिलनाडु सरकार हमें मुफ्त चप्पल इसीलिए देती है जिससे हमें भूमा देवी से कोई संक्रमण न हो जाए। भूमा देवी एक खतरनाक व्यक्ति है। आपको खुजली और सोरायसिस हो जाएगा। इसलिए आपको हमेशा चप्पल पहननी चाहिए”

और उसके बाद उन्होंने नक्सल समर्थक फादर स्टेन स्वामी के पक्ष में बोलते हुए कहा था कि स्टेन स्वामी को तो नोबेल मिलेगा, क्योंकि यह यूएन ने भी देखा है कि कैसे मोदी ने उन्हें कैद किया। फिर उन्होंने हिन्दू समुदाय को ललकारते हुए कहा कि “तुम लोग हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकते हो। हम कुछ ही समय में 70% से अधिक हो जाएंगे और बढ़ते रहेंगे। तुम हमें रोक नहीं सकते हो,”

उन्होंने ब्राह्मणों को भी गाली देते हुए कहा कि पास्टर तुम पुजारी जैसे नहीं होते हैं। हम खाली घंटा ही नहीं बजाते हैं बल्कि हम पढ़े लिखे लोग हैं। और इतना ही नहीं मोदी और शाह के शवों को कुत्ते खाएंगे ऐसी भी कामना उन्होंने की।

जब इस पर शोर मचा और विरोध हुआ तो वह छिप गए थे, परन्तु अंतत: उन्हें मदुरई पुलिस ने हिरासत में ले लिया था।

धार्मिक प्रचारक को एकेडेमिक या कलाकार जैसी स्वतंत्रता नहीं होती है

जॉर्ज पुनिया ने अपने खिलाफ एफआईआर रद्द कराने को लेकर जो मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दायर की उसमें लिखा कि उन्होंने कुछ अलग नहीं लिखा है, उन्होंने तो आंबेडकर को ही कोट किया है। इस पर न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता की आंबेडकर जैसे नेताओं से तुलना हद से अधिक है। और उन्होंने यह कहा कि रिलिजन का प्रचार करने वाले व्यक्ति के पास एक निष्पक्ष कलाकार, या तर्कवादी या एकेडेमिक व्यक्ति जितना अधिकार नहीं होता है। न्यायालय का कहना था कि

“याचिकाकर्ता जैसा एक रिलिजन प्रचारक उन अधिकारों का दावा नहीं कर सकता है। वह दूसरे धर्म का अपमान नहीं कर सकता है और न ही उसके पास यह अधिकार है कि वह दूसरे धर्म के धार्मिक विश्वासों का उपहास करे और उसके बाद वह आईपीसी की धारा 295A/153A/505(2) के अंतर्गत छूट भी चाहे। जिस समुदाय को निशाना बनाया जाएगा, वह प्रतिक्रिया तो करेगा ही क्योंकि उसे उनसे खतरा अनुभव होगा। ऐसे माहौल में न्यूटन के तीसरे सिद्धांत “क्रिया की प्रतिक्रिया” के लागू होने की आशंका रहते हैं। राज्य ऐसी स्थिति में शांत नहीं रह सकता।”

कन्याकुमारी में ईसाई जनसँख्या भी खुद को हिन्दू बताती है

न्यायालय ने यह भी कहा कि यह बहुत दुखद है कि कन्याकुमारी में हिन्दू 1980 से अल्पसंख्यक हो गए हैं। हालांकि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यह प्रभाव जाता है कि हिन्दू 48 प्रतिशत की जनसँख्या के साथ सबसे बड़ा धार्मिक समूह है, परन्तु यह सच्चाई नहीं है। क्योंकि अनुसूचित जाति का एक बड़ा समूह ऐसा है जो हालांकि ईसाई तो बन गया है, परन्तु खुद को केवल इसलिए हिन्दू कहता है जिससे उसे आरक्षण के लाभ मिलते रहें।”

न्यायालय ने धर्म के आधार पर हुए विभाजन पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि “हम तभी संकट का सामना कर सकते हैं, यदि भारतीय समाज का बहुसांस्कृतिक चरित्र ऐसा ही रहेगा। दूसरे शब्दों में धार्मिक जनसांख्यकी में अब कोई बदलाव न हो, यदि ऐसा होता है तो उसके बहुत दुष्परिणाम होंगे।”

यह देखना बहुत ही दुखद है कि कैसे ईसाई और मुस्लिम समुदाय ने धार्मिक स्वतंत्रता को हिन्दू धर्म की बुराई करने का अधिकार मान लिया है। जबकि धर्म प्रचार का अधिकार सभी को है, और धार्मिक आस्था को आहत करने का अधिकार किसी को नहीं है। और एक और बात इस निर्णय से स्पष्ट हुई है कि आलोचना का अधिकार मात्र उसी को है जो प्रवृत्ति से निष्पक्ष है!

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