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Sunday, June 26, 2022

कांग्रेस चिंतन शिविर या वर्ष 2024 से पूर्व राज्यों के मध्य मतभेद उत्पन्न कर देश के संघीय ढांचे को तोड़ने का षड्यंत्र

चुनाव दर चुनाव मिल रही निरंतर पराजय से क्षुब्ध कांग्रेस के नेतृत्व ने उदयपुर में 13-15 मई के बीच चिंतन शिविर का आयोजन किया। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के अतिरिक्त 400 से अधिक पदाधिकारी पार्टी को मजबूत करने के उद्देश्य से एकत्रित हुए। इस शिविर का प्राथमिक उद्देश्य था कांग्रेस को नया नेतृत्व प्रदान करना, क्योंकि शिविर से पहले ही राहुल गांधी को एक बार फिर कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की मांग पार्टी के नेताओं ने उठानी आरम्भ कर दी थी।

चिंतन शिविर में कांग्रेस नेतृत्व ने ‘संगठन में समयबद्ध और जरूरी बदलाव’ करने, ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ समेत अन्य विषयों पर भाजपा का प्रभावी तरीके से सामना करने और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयारी करने पर जोर देने की बात की थी। एक ‘नवसंकल्प’ भी जारी किया था जिसमे उनके भविष्य में उठाने वाले कदमो की प्रस्तावना थी, साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को एक मजबूत विकल्प बनाने की कार्ययोजना बनाई गयी थी।

कांग्रेस नेतृत्व ने सबसे पहले एक परिवार-एक पद-एक टिकट की घोषणा की, लेकिन हमेशा की तरह कांग्रेस के प्रथम ‘गाँधी’ परिवार को इस दायरे में नहीं लाया गया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस भविष्य में भी गाँधी परिवार के नेतृत्व के झंडे तले ही संचालित होगी एवं यह भी एक बार पुन: स्पष्ट हुआ कि कांग्रेस ने पिछले लगभग एक दशक से लगातार मिल रही चुनावी पराजय से कुछ भी सबक नहीं सीखा है।

यह कहने के लिए तो चिंतन शिविर था, परन्तु इसी मध्य हुई चर्चाओं से यह प्रतीत हो रहा है कि जैसे भारत में राज्यों, भाषा, और विचारधारा आदि विषयों पर लोगो को विभाजित करने की एक कार्ययोजना बनाई गयी है।

झूठ बोलो आदिवासियों और व्यवसाइयों में दरार पैदा करो

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कहा कि भाजपा ने देश को दो हिस्सों में तोड़ दिया है, एक अमीरों के लिए और दूसरा गरीबों के लिए। राहुल गाँधी ने कहा कि “कांग्रेस और आदिवासियों का बहुत पुराना और गहरा रिश्ता है। हम आपके इतिहास की रक्षा करते आए हैं। हम आपके इतिहास को मिटाना-दबाना नहीं चाहते हैं। UPA सरकार में हम आपकी जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने के लिए कानून लेकर आए थे। “

हालांकि राहुल गाँधी भूल गए कि इतने दशकों तक उन्ही की पार्टी का शासन था देश में, लेकिन अभी तक आदिवासी इतने पिछड़े क्यों हैं ? राहुल गाँधी ने कहा कि वह आदिवासियों का इतिहास नहीं मिटाना चाहते, यह बोल कर क्या वह आदिवासियों को भड़काना चाहते हैं?

राहुल गाँधी क्या भूल गए हैं कि वर्ष 2004-2014 के बीच उनकी सरकार द्वारा कितने आदिवासी क्षेत्रों को खनन के लिए दे दिया गया था? उन्ही के समर्थन से चल रही झारखंड की सरकार पर ही इन दिनों खनन आवंटन में भ्रस्टाचार के आरोप लग रहे हैं, इस पर उनके क्या विचार हैं?

कांग्रेस ने भाजपा परमुंबई को महाराष्ट्र’ से अलग करने के षड़यंत्र का आरोप लगाया

कांग्रेस ने एक नया प्रचार करना आरम्भ कर दिया है, इसमें उनका वह झूठ भी सम्मिलित है कि भाजपा महाराष्ट्र से मुंबई को अलग करना चाहती है। आपको यह सुन कर अचम्भा हो सकता है, लेकिन कांग्रेसी नेता तहसीन पूनावाला तो यही कह रहे हैं। उनके अनुसार मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश बना कर महाराष्ट्र से अलग करने का प्रयास केंद्र सरकार कर रही है।

देवेंद्र फडणवीस ने पिछले दिनों असद्दुदीन ओवैसी को करारा जवाब देते हुए औरंगजेब के बारे में एक वक्तव्य दिया था। इस पर कुपित हो कर तहसीन पूनावाला ने कहा कि फडणवीस मराठी क्यों नहीं बोल रहे? और फिर उन्होंने कहा कि क्या ये मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का षड्यंत्र तो नहीं। यह हमारे समझ से बाहर है कि औरंगजेब के विरोध में बोलना षड़यंत्र कैसे हो गया? महाराष्ट्र में हिंदी बोलने को षड़यंत्र कैसे कहा जा रहा है? क्या कांग्रेस के चिंतन शिविर में यही समझाया गया है कि किसी भी विषय पर राज्य और भाषा का विवाद उठाओ और लोगो को भड़काओ?

क्षेत्रीय दलों की विचारधारा को बनाया निशाना – कहा भाजपा से लड़ने लायक नहीं

राहुल गांधी ने कहा कि क्षेत्रीय दलों पर आक्रमण करते हुए कहा कि ये दल आरएसएस-भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि यह विचारधाराओं की लड़ाई है। उन्होंने कहा, ‘आपने देखा है कि आरएसएस की विचारधारा कांग्रेस की विचारधारा के खिलाफ लड़ रही है, बीजेपी कांग्रेस, उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं के बारे में बात करेगी लेकिन क्षेत्रीय दलों के बारे में बात नहीं करेगी। क्योंकि वह जानते हैं कि क्षेत्रीय दलों के पास जगह है, लेकिन वे बीजेपी को नहीं हरा सकते, क्योंकि उनकी कोई विचारधारा नहीं है।”

राहुल गाँधी के इस वक्तव्य से कई क्षेत्रीय दल भड़क गए हैं। जनता दल, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल जैसे संगठन जो कांग्रेस का समर्थन करते हैं, उन्होंने राहुल गाँधी के वक्तव्य का विरोध किया है और इसे तनाव बढ़ाने वाला बताया है। यहाँ देखा जा सकता है कैसे राहुल गाँधी विचारधारा का विषय उठा कर क्षेत्रीय दलों में तनाव पैदा कर रहे हैं।

जातिगत जनगणना के पक्ष में कांग्रेस

जातिगत जनगणना का एक ही उद्देश्य माना जाता है, जातिगत आंकड़ों का उपयोग अपनी राजनीति को चमकाने के लिए करना। इसी सिद्धांत पर चलते हुए कांग्रेस खुल कर जातिगत जनगणना के पक्ष में आ गयी है। चिंतन शिविर में इस कार्य के लिए कांग्रेस ने एक सामाजिक न्याय संबंधी समन्वय समिति की बैठक भी आयोजित की गयी जिसमे इस विषय पर गहन चर्चा की गई।

कांग्रेसी प्रवक्ता श्रवण ने कहा कि “देश की कुछ ही जातियां लोकतंत्र के फायदे उठा रही है, इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी से उन्होंने यह प्रार्थना की है कि वे जातिवादी जनगणना का विषय उठाएं और देश भर में इस विषय पर लोगो को एकजुट करें। यह अत्यंत ही आपत्तिजनक वक्तव्य था, और ऐसे किसी जाति को लक्ष्य करके जनगणना की बात करने का एक ही उद्देश्य है, हिन्दुओ के बीच जातिवादी खाई को और गहरा करना।

चुनाव आयोग पर नहीं भरोसा, ईवीएम बंद करेगी कांग्रेस

कांग्रेस की आदत रही है संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण करने की और चिंतन शिविर में उन्होंने इसी का उदाहरण देते हुए बैलेट पेपर से चुनाव करवाने और ईवीएम को बंद करने का निर्णय लिया। कांग्रेस दल की बैठक में सभी एकमत थे कि उनकी सरकार आयी तो ईवीएम से चुनाव नहीं करवाए जाएंगे।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि अगले लोकसभा चुनावों के घोषणापत्र में इस विषय को जनता के बीच ले जाना चाहिए और चुनाव प्रक्रिया में बदलाव प्रस्तावित करने चाहिए। चव्हाण ने कहा कि चुनावों ने बहुत घपलेबाजी हो रही है, और प्रधानमंत्री मोदी इस व्यवस्था को नहीं हटाने वाले है। अगर हमे उन्हें हराना है तो हमे ईवीएम को छोड़ मतपत्रों की तरफ जाना ही होगा।

हालांकि कांग्रेस नेतृत्व यह भूल गया है कि चुनाव प्रक्रिया में बदलाव कर ईवीएम मशीन वही लाये थे। पिछले वर्षो इसी ईवीएम द्वारा आयोजित चुनावों में कांग्रेस ने पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को जीता है, लेकिन आज वही ईवीएम पर प्रश्न उठा रहे हैं। क्या कांग्रेस नेतृत्व दिग्भ्रमित है, या यह जानबूझकर देश की संवैधानिक संस्थाओं के प्रति संशय का वातावरण बनाना चाहते हैं?

कांग्रेस का एक ही विचार – भाषाओ की बने दीवार

चिंतन शिविर समाप्त होते ही कांग्रेस के नेताओं ने भाषाओं पर टिपण्णी करना आरम्भ कर दिया। पिछले ही दिनों महाराष्ट्र में ‘हिंदी भाषी महासंकल्प सभा’ हुई थी, जिसमे मुख्य वक्त पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस थे, जैसा कि नाम से ही विदित है , यह सभा हिंदी भाषा पर आधारित थी, फिर भी फडणवीस ने मराठी भाषा में भी लोगो को सम्बोधित किया था।

लेकिन, कांग्रेसी नेता और राहुल गाँधी के करीबी मित्र तहसीन पूनावाला को इसमें भी आपत्ति लगी। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि इस सभा में मराठी का उपयोग क्यों नहीं किया गया, और क्यों इसे हिंदी भाषी महासंकल्प नाम दिया गया। तहसीन ने जानबूझकर इस विषय को गरमाया, ताकि मराठी और हिंदी भाषी लोगो के बीच तनाव उत्पन्न हो। हालांकि तहसीन भूल गए कि ये उन्होंने स्वयं यह ट्वीट अंग्रेजी में किया था, इससे बड़ा ढोंग क्या हो सकता है?

इन तमाम घटनाओं से यही प्रतीत हो रहा है कि कहीं न कहीं वर्ष 2024 में चुनाव की तैयारी करने के नाम पर कांग्रेस एक षड्यंत्र रच रही है। उसे यह प्रतीत हो गया है कि लोकतान्त्रिक तरीके से चुनाव जीतना कहीं न कहीं उसके लिए असंभव है अत: अब वह येन केन प्रकारेण राज्यों के मध्य परस्पर तनाव उत्पन्न करने का प्रयास कर रही है। कभी उत्तर दक्षिण राज्यों के बीच तनाव उत्पन्न किया जाता है, कभी राहुल गाँधी संसद में कहते हैं कि भाजपा जीवन में कभी तमिलनाडु नहीं जीत पाएगी। कभी कांग्रेस नेता हिंदी भाषा और अन्य भाषाओँ के बीच खाई पैदा करने की कोशिश करते हैं।

ऐसा करके उन्हें राजनीतिक विजय तो नहीं मिल पाएगी, लेकिन देश में राज्य, भाषा, और जातिवादी खाई और बढ़ जायेगी, और धीरे धीरे देश की नींव निर्बल हो जाएगी। क्या कांग्रेस देश में और भी विभाजन चाहती है? यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है तथा चुनाव के समय जनता कांग्रेस के नेताओं से यह प्रश्न कर भी सकती है।

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