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Saturday, June 22, 2024

महामहिम द्रौपदी मुर्मू के बहाने विपक्ष एवं कथित “औपनिवेशिक गुलाम” वर्ग की वास्तविक तस्वीर आई सामने

द्रौपदी मुर्मू के रूप में भारत को अपनी नई राष्ट्रपति मिल गयी हैं। हर कोई जानता है कि द्रौपदी मुर्मू किस वर्ग से आती हैं और उनकी अपनी राजनीतिक यात्रा कितनी लम्बी है। उन्होंने झारखंड के राज्यपाल रहते हुए कितने कार्य किये या फिर उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कितनी उपलब्धियां प्राप्त की थीं। जो भी राजनीतिक समाचारों पर दृष्टि रखता है, उसे यह सब पता था। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी बधाई देते हुए उनके जीवन को प्रेरक बताया

परन्तु एक ऐसा वर्ग भी था, जिसे द्रौपदी मुर्मू जी के नाम पर आपत्ति थी? और यह आपत्ति उनके कार्यों के प्रति जानकारी को न लेकर थी, और साथ ही उनके प्रति अनादर का भाव उस वर्ग में भी था, जिसे लिबरल वर्ग अपने भविष्य के रूप में देखता है। एक नहीं कई लोग ऐसे आए जिन्होनें द्रौपदी मुर्मू जी का उपहास किया,

इनमे सबसे बड़ा नाम है तेजस्वी यादव का! बिहार के युवराज कहे जाने वाले तेजस्वी यादव, जिनमे पूरा का पूरा लिबरल समाज अपना भविष्य देखता है, जिन्हें बिहार के भविष्य के रूप में जाना जाता है, और जो अबकी बार चुनावों में पूरी तरह से मुख्यमंत्री बनने के लिए आश्वस्त हैं, उन्होंने द्रौपदी मुर्मू की के विषय में अत्यंत ही अपमानजनक टिप्पणी की थी कि आपको राष्ट्रपति भवन में एक मूर्ति नहीं चाहिए। आपने विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार को तो बोलते हुए सुना होगा, परन्तु सत्तापक्ष ने जिनका नाम घोषित किया है उन्होंने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है!

इस पर लोगों ने उन्हें उनकी माँ राबरी देवी का स्मरण कराया था।

कांग्रेस के नेता अजोय कुमार ने यहाँ तक कह दिया था कि यशवंत सिन्हा एक अछे प्रत्याशी हैं, द्रौपदी मुर्मू भी शालीन व्यक्ति हैं, परन्तु वह भरत की “ईविल विचारधारा” का प्रतिनिधित्व करती हैं, हमें उन्हें आदिवासियों का प्रतीक नहीं मानना चाहिए।!”

परन्तु सबसे मजेदार तो यही है कि यशवंत सिन्हा की उपलब्धियों के नाम पर विपक्ष के सामने एक ही विशेषता थी और वह था भारतीय जनता पार्टी का विरोध। यदि यशवंत सिन्हा पूर्व की भांति भारतीय जनता पार्टी में ही रहते तो क्या होता? क्या यशवंत सिन्हा भी उसी ईविल फिलोसोफी का भाग नहीं थे?

कांग्रेस पार्टी का बार-बार इसी बात पर जोर था कि द्रौपदी मुर्मू के रूप में भारतीय जनता पार्टी एक डमी प्रेसिडेंट चाहती है? इस बात पर किरन रिजूजू ने पूछा भी कि “डमी से कांग्रेस का क्या अर्थ है? कांग्रेस पार्टी ने डॉ भीमराव अम्बेडकर, पी ए सांगमा आदि कई सम्माननीय एससी/एसटी नेताओं का अपमान किया।”

कांग्रेस को सत्ता पक्ष की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार आदरणीय द्रौपदी मुर्मू के नाम पर असहमति या क्रोध क्यों है? क्या कांग्रेस नहीं चाहती थी कि हिन्दू धर्म को पहचान बताने वाली कोई आदिवासी महिला उस पद तक पहुंचे? और डमी से क्या अर्थ है?

लोगों को अभी तक याद है कि कांग्रेस के शासनकाल में नियुक्तियां कैसे हुआ करती थीं? कौन नहीं जानता है कि सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष लीला सैमसन को बना दिया गया था, जिन्हें लेकर विरोधियों ने बार-बार यह कहा था कि उन्हें यह पद मात्र राजनीतिक प्रभाव के चलते मिला है।

लीला सैमसन को वर्ष 2011 में सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष चुना गया था, और यह उन्हीं का कार्यकाल था, जब हिन्दू आस्थाओं पर चोट पहुँचाने वाली फ़िल्में बहुतायत में बनीं जैसे पीके, ओह माई गॉड, गोलियों की रासलीला – रामलीला आदि!

कांग्रेस यह क्यों भूल जाती है कि कांग्रेस ने तो एनएसी का गठन करके सुपर सरकार का ही गठन कर दिया था।

खैर, राजनीति से इतर आते हैं तो एक कथित औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित वर्ग है, जिसके लिए गोरी चमड़ी ही सभ्यता की निशानी है, और एकमात्र निशानी है। इंडिया टुडे समूह के महाप्रबंधन इन्द्रनील चटर्जी ने तो आगे बढ़कर यह तक लिख दिया था कि वह कुछ पुराने विचारों का है और जैसे वह समलैंगिक विवाह का समर्थन नहीं करता है और तरह वह आदिवासी राष्ट्रपति के पक्ष में नहीं। कुछ पद सबके लिए नहीं होते हैं और हमें उनके साथ डिग्निटी बनाई रखनी चाहिए। क्या हम किसी सफाईकर्मी से दुर्गा पूजा करा सकते हैं? क्या एक हिन्दू मदरसे में पढ़ा सकता है?”

हालांकि यह पोस्ट सरकार के विरोध में थी, क्योंकि बाद वाले पक्ष में वह इस सरकार का विरोधी ही निकल कर आया और लिखा कि इस निर्णय में राजनीति है और कानून को विपक्ष को अपमानित करने पास नहीं कराए जा सकते हैं। आज न केवल रायसीना हिल्स की गद्दी अपमानित हुई है बल्कि साथ ही कुछ महान आत्माएं, जैसे एपीजे अब्दुल कलाम, प्रणब मुखर्जी, एस राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन, डॉ shankar दयाल शर्मा, राजेन्द्र प्रसाद आदि भी अपमानित हुए हैं!”

जैसे ही यह पोस्ट वायरल हुई, हंगामा हो गया और इंडिया टुडे ने इन्द्रनील को नौकरी से बाहर कर दिया।

बात यह बिलकुल भी नहीं है कि कांग्रेस या फिर विपक्ष या फिर भारतीय जनता पार्टी का विरोधी कोई राजनीतिक विरोध करता है, किसी भी लोकतंत्र में राजनीती विरोध ही संजीवनी होता है, परन्तु जब वह राजनीतिक विरोध देश की अस्मिता पर प्रश्न उठाने लगता है, तब वह राजनीतिक विरोध नहीं रह जाता है! आदरणीय द्रौपदी मुर्मू से कांग्रेस एवं विपक्ष के साथ साथ कथित मानसिक औपनिवेशिक गुलामों को समस्या क्या हो सकती है? उन्हें यह समस्या है कि वह ऐसी महिला हैं जो महादेव के मंदिर में जाकर आशीर्वाद लेती हैं, वह यशवंत सिन्हा की तरह सीएए का विरोध नहीं करती हैं, वह टुकड़े टुकड़े गैंग का समर्थन नहीं करती हैं।

द्रौपदी मुर्मू ने अपना राजनीतिक जीवन एक पार्षद के रूप में आरम्भ किया था, इसके बाद वह दो बार भारतीय जनता पार्टी से विधायक बनीं और उन्होंने झारखंड में राज्यपाल के पद को भी सुशोभित किया था, एवं उस कार्यकाल की चर्चा सबसे अधिक होती है।

अत: विपक्ष और औपनिवेशिक मानसिकता वाले गुलामों द्वारा द्रौपदी मुर्मू का उनकी पृष्ठभूमि के आधार पर हैरान करता है क्योंकि वही लोग हैं, जो सामाजिक न्याय का ढिंढोरा सबसे अधिक पीटते हैं!

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