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Sunday, July 3, 2022

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अवसर है हिन्दू इतिहास के विषय में झूठ का जाल काटने का: कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार, महिलाओं की स्थिति और अधिकार

7 मार्च अर्थात अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि हम कुछ पीछे देखें कि भारत में स्त्रियों को क्या वैध रूप से अधिकार प्राप्त थे और कितना बड़ा एजेंडा था यह कथित फेमिनिज्म फैलाने वालों का। कल एक बार फिर से यही कहा जाएगा कि भारत में महिलाओं के मध्य शिक्षा का आगमन सावित्री बाई फुले के आगमन के बाद से हुआ। और साथ ही यह स्थापित किया जाएगा कि हिन्दू स्त्रियों में चेतना का इतिहास था ही नहीं। तो आज आवश्यक है कि हम बहुत अधिक पीछे न जाकर चाणक्य के ही काल में जाते हैं। उनके द्वारा रचित अर्थशास्त्र में देखते हैं कि महिलाओं की स्थिति मौर्यकाल में क्या थी।

सनद रहे कि भारत के कथित बुद्धिजीवी भारत का इतिहास मौर्यवंश से ही मानते हैं क्योंकि इंडिका आदि के विवरण उपलब्ध होते हैं, और उनकी हीनता इतनी है कि वह महाभारत और रामायण को इतिहास मानने से कतराते हैं। इस आत्महीनता पर हम बाद में बात करेंगे, परन्तु यह देखते हैं कि आखिर चाणक्य के अर्थशास्त्र में स्त्रियों के अधिकार क्या थे? क्या वास्तव में लड़की के यौन अधिकार नहीं थे? जैसा यह फेमिनिस्ट दावा करती हैं? या फिर ऐसा कुछ नहीं था?

वस्त्रउद्योग में महिलाएं कार्यकरती थीं:

penguin से प्रकाशित kautilya The Arthashastra (कौटिल्य अर्थशास्त्र), जिसका अनुवाद किया है एल एन रंगराजन ने, में मौर्यकालीन स्त्रियों के विषय में विस्तार से लिखा है। इसमें लिखा है कि महिलाएं पुनर्विवाह कर सकती थीं, विधवाएं पुनर्विवाह कर सकती थीं और इतना ही नहीं यदि विवाह के उपरान्त स्त्री और पुरुष का निबाह नहीं हो पा रहा है, तो वह परस्पर आपसी सहमति से विवाह विच्छेद भी कर सकते थे।

चाणक्य के अर्थशास्त्र में वस्त्र उद्योग का उल्लेख प्राप्त होता है। हालांकि अंग्रेजों ने और वामपंथी इतिहासकारों ने ऐसा वर्णन किया है जैसे अंग्रेजों और मुस्लिमों के आने से पूर्व भारत में कोई तकनीक उपलब्ध नहीं थी आदि आदि! जबकि आप पीछे की ओर झांकते हैं तो पाते हैं कि स्त्रियाँ महाभारत या रामायण काल को छोड़ ही दें, बल्कि चाणक्य काल तक कार्यरत थीं। वह परिचारिका का कार्य करती थीं और वस्त्र उद्योग में कार्य करती थीं।

लिखा है कि

कताई महिलाओं द्वारा की जाएगी [विशेषकर वे जो जीवन यापन के लिए इस पर निर्भर हैं] जैसे विधवाएं, अपंग, [अविवाहित] लड़कियां, [असंबद्ध] स्वतंत्र रूप से रहने वाली महिलाएं, वह महिलाएं जिन पर जुर्माना लगा हुआ है,  वेश्याओं की मां, बूढ़ी महिला नौकर राजा और मंदिर की नर्तकियां, जिनकी एक मंदिर में सेवाएं बंद हो गई हैं। {2।23।2}

उन महिलाओं को रोजगार दिया जा सकता है जो अपने घरों से बाहर नहीं निकलती हैं [उदा। , जिन महिलाओं के पति दूर हैं, विधवाएं, विकलांग महिलाएं या अविवाहित लड़कियां] मुख्य आयुक्त द्वारा अपनी महिला नौकरों को कताई के लिए कच्चे माल के साथ उनके पास भेज दिया। या, ऐसी महिलाएं कच्चे माल को इकट्ठा करने के लिए सुबह सूत कातने के लिए आ सकती हैं और अपने पारिश्रमिक को ले सकती हैं।

और देखते हैं कि क्या लिखा है? यदि कामकाजी स्त्रियों के साथ कोई दुर्व्यवहार करता था तो क्या दंड दिया जाता था? इसमें लिखा है कि वस्त्रायुक्त उन महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं करेगा, जिनके साथ वह कार्य कर रहा है, यह दंडनीय अपराध है।

यदि जो महिलाएं अपने घर से बाहर नहीं निकलती हैं, और वह भी कार्य करने के लिए आती हैं तो कपास की निगरानी के लिए केवल एक ही दिया रहेगा।

और महिलाओं के चेहरे पर देखने पर या फिर कार्य के अतिरिक्त कोई भी बात करने पर प्रतिबन्ध था, एवं यह दंडनीय अपराध था।

गर्भवती महिलाओं से नाविक भी शुल्क नहीं लेता था

गर्भवती महिलाओं का समाज में विशेष स्थान था। यहाँ तक कि नाविक भी गर्भवती महिलाओं से शुल्क नहीं लेते थे।  गर्भवती महिलाओं पर किसी भी प्रकार का कोई भी दुर्व्यवहार नहीं किया जा सकता था।

विवाहित महिलाओं के अधिकार

एक महिला की संपत्ति होती थी उसके सहयोग के लिए एक राशि तथा उसके आभूषण। तथा सहयोग 2000 पण से अधिक के रूप में होता था एवं आभूषण की कोई सीमा नहीं होती थी।

यदि किसी स्त्री का देहांत अपने पति से पूर्व हो जाता है तो उसकी संपत्ति को

पुत्र एवं पुत्री दोनों में समान रूप से विभाजित किया जाएगा,

यदि कोई पुत्र नहीं है तो पुत्रियों में समान रूप से विभाजित किया जाएगा।

विधवा पुनर्विवाह कर सकती थीं:

विधवा पुनर्विवाह कर सकती थीं, यदि कोई विधवा पुनर्विवाह नहीं करती थी, तो उनके पास जीवन यापन राशि, उसके आभूषण, शेष दहेज़ और जो भी उसे उसके पति ने अपने जीवनकाल में उसे दिए जा रहे थे, वह सभी मिलेंगे।

स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उसकी संपत्ति उसके पुत्रों के पास जाती थी। यदि किसी विधवा स्त्री के पुत्र नहीं होता था तो उसके जीवनकाल में वह संपत्ति उसके पास रहती थी और उसकी मृत्यु के उपरान्त वह उत्तराधिकार क़ानून के अनुसार संपत्तियों में विभाजित हो जाती थी।

यदि स्त्री पुनर्विवाह करती थी तो उसे यह संपत्ति अपने ससुराल वालों को वापस करना होता था।

स्त्रियों के पास पति को छोड़ने का भी अधिकार था:

एक पत्नी अपने पति को निम्नलिखित स्थितियों में त्याग सकती थी:

  1. यदि वह दुश्चरित्र है
  2. यदि वह किसी विदेशी देश में काफी लम्बे समय से है
  3. राजा का द्रोही है
  4. अपनी पत्नी के जीवन के लिए खतरा है
  5. नपुंसक है

अत: बार बार फेमिनिस्ट का यह कहना कि हिन्दू भारत में महिलाओं के पास अधिकार नहीं थे, या उनकी स्थिति त्याज्य थी। जब स्त्री के पास यह अधिकार था कि वह अपने अनुकूल पति को त्याग सके तो यह धारणा कहाँ से उपजी कि “डोली जाएगी और अर्थी आएगी?” यह झूठ कहाँ से आया?

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