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Friday, March 1, 2024

बालिका दिवस पर कहानी एक विस्मृत नायिका की: बीना दास

आज भारत “बालिका दिवस” मना रहा है, ऐसे में आवश्यकता है कुछ ऐसी बालिकाओं की वीरता को स्मरण करने की, जिनकी उपलब्धियों के विषय में जानते बूझते हुए उपेक्षा का अंधकार स्थापित किया गया। क्यों किया, किसलिए किया, इन सबसे परे, जाकर यह जानने की आवश्यकता है कि क्या हमने भी कभी यह जानने की आवश्यकता नहीं की कि अंतत: हमारी पहचान क्या है? हमारी चेतना क्या वास्तव में उस आयातित विमर्श के कारण थी, जो हम पर थोपा गया? नहीं, हमारी रगों में ही स्वतंत्रता थी। आज ऐसी ही दो कहानियां,

बीनादास, जिन्होनें चला दी थी कॉलेज के समारोह में गवर्नर पर गोली

जरा कल्पना करें, कि गवर्नर बैठे हैं और आपके मन में यह क्रोध है कि उनके कारण ही आपके देश को विपदाओं के दौर से होकर गुजरना पड़ रहा है। एक जीवंत देश आहत है, कराह रहा है, और आप कुछ नहीं कर सकते। परन्तु आप अपना क्रोध, अपना आक्रोश तो व्यक्त कर सकते हैं। ऐसा ही 6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय में हुआ जब गवर्नर स्टेनले जैक्सन विश्वविद्यालय में डिग्री देने के लिए आए थे।

वहीं बैठी थीं, बीना दास, जो अपने स्नातक की डिग्री लेने आई थीं। पर उनके दिल में आक्रोश इतना भरा था कि वह गवर्नर स्टेनले के हाथों से डिग्री नहीं लेना चाहती थीं। वह धीरे से अपनी सीट से उठी और फिर तेजी से जाकर स्टेनले के सामने जाकर गोली चला दी थी। गवर्नर डर के मारे कांप गए, इस कारण निशाना चूक जाने से वह बच गए।

गूगल समाचारपत्र

बीना को पकड़ने के लिए वहां पर अफरातफरी मच गयी। बीना अपना सारा क्रोध और आक्रोश गोली चलाकर निकालती रही। हाँ, उससे कोई भी घायल नहीं हुआ और न ही मारा गया। जैसे ही अंतिम गोली चले, वैसे ही उसे पकड़ लिया गया, और फिर पुलिस ने उस पर साथियों के नाम आदि बताने के लिए बहुत दबाव डाला। परन्तु बीना ने हर अत्याचार सहकर भी अपने साथियों के बारे में कुछ भी नहीं कहा।

जब उनका मुकदमा चल रहा था तो उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा था

“मैं इसे स्वीकार करती हूँ कि मैंने सीनेट हाउस में गवर्नर पर गोली चलाई थी। मेरा उद्देश्य मरना था, और चूंकि हम सभी को एक न एक दिन मरना ही है, तो मैं गौरव पूर्ण तरीके से मरना चाहती थी। मैं उस अत्याचारी सरकार का विरोध करके मरना चाहती थी, जिसने मेरे देश को शर्मिंदा किया है और असंख्य अत्याचार किए हैं।”

बीना का जन्म 24 अगस्त 1911 को कृष्ण नगर में हुआ था। उनके पिता श्री बेनीमाधव दास नेताजी सुभाषचंद्र बोस के शिक्षक थे। और अपने देशभक्त पिता के माध्यम से ही बीना के भीतर देश प्रेम के संस्कार आते गए। बीना ने साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए पहली बार कदम रखा। उसके बाद वह क्रांतिदल की महिला शाखा में शामिल हो गईं थीं।

1930 में जब चटगाँव शास्त्रागार काण्ड हुआ था, उसके बाद बंगाल में क्रांतिकारियों की गतिविधि तेज हो गयी थीं। उसके बाद ही जोश में बीना ने यह कारनामा किया था। फिर उस काण्ड के बाद बीना ने अपने लिए लम्बी सजा स्वीकार की, परन्तु झुकना स्वीकार नहीं किया। वर्ष 1937 में जब प्रांतीय सरकारें बनीं तो उन्हें और लड़कियों के साथ रिहा कर दिया गया। परन्तु वह शांत बैठने वाली नहीं थीं, और उन्होंने 1942 में आन्दोलन के दौरान फिर से क्रांतिकारियों की सहायता की जिसके कारण फिर से वह अंग्रेज अधिकारियोंके हत्थे चढ़ गईं, और फिर जेल गईं और वर्ष 1946 में छूटी। नोआखाली में हुए दंगों में उन्होंने राहत का कार्य किया।

उन्होंने विवाह भी देश के स्वतंत्र होने के उपरांत किया। उसके उपरान्त भी वह निरंतर कार्य करती रहीं।

वह 1951 तक पश्चिम बंगाल की विधानसभा की सदस्य भी रही थीं। पति के देहांत के बाद वह ऋषिकेश चली गयी थीं। एवं वर्ष 1986 में उनकी गुमनामी मृत्यु हुई।

देश के लिए इतना कार्य करने के उपरान्त भी उनका अंत अत्यंत दीनहीन स्थिति में हुआ। महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रोफेसर सत्यव्रत घोष ने अपने एक लेख, “फ्लैश बैक: बीना दास – रीबोर्न” में उनकी मार्मिक मृत्यु के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा कि

“सड़क के किनारे उनके जीवन का अंत हुआ। उनका मृत शरीर क्षत विक्षत था। जो लोग वहां से होकर गुजर रहे थे, उन्हें उनका शव मिला। पुलिस को सूचित किया गया और कई महीनों की तलाश के बाद पता चला कि इस शव की पहचान क्या है।

वह पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि

“यह सब उसी आज़ाद भारत में हुआ, जिस देश की स्वतंत्रता के लिए इस अग्नि-कन्या ने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था। अब उनकी देह के साथ उनकी कहानी भी अनकही, अनसुनी रह गयी है। देश को इस कहानी को स्मरण करना चाहिए और देर से ही सही इस महान स्त्री को आदर देना चाहिए।”

https://www.bhavans.info/heritage/binadas_reborn.asp

आज बालिका दिवस पर बीना दास को स्मरण करना इसलिए भी आवश्यक है ताकि यह बताया जा सके कि भारत में बालिकाएं सदा से ही अत्याचार का विरोध करने वाली थीं, उनकी चेतना कहीं बाहर से थोपी हुई नहीं थी और सबसे बढ़कर यह किसी भी अब्राह्मिक रिलिजन की देन नहीं है।

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