हिमालय क्षेत्र में चीन की कारस्तानियों को कौन रोकेगा ?

एक बार फिर हिमालय क्षेत्र में चीन की कारस्तानियों का संहारक शिकार भारत, नेपाल और भूटान हुआ है। नेपाल में आयी बाढ़ पर चीन का अमानवीय, गैर जिम्मेदार और खूंखार चेहरा दुनियां के सामने आया है। चीन की संहारक नीतियों और कारस्तानियों के खिलाफ दुनियां बोलती नहीं है, उसकी आलोचना करने से भी परहेज करती है, डरती है, उदासीनता बरतती है। चीन बार बार अपनी संहारक नीतियों और कारस्तानियों से दुनियां की पारिस्थितिक और जीवन आधार स्तंभ को तहस नहस किया, जीवन हानि को अंजाम दिया है। मानवीय और प्राकृतिक समस्या, संकट को खड़ा किया है, पर्यावरण को नष्ट किया है, परमाणु हथियार का अराजक भंडारण किया है। आप कोरोना काल की त्रासदी और संकट, संहार को याद कर सकते हैं, चीन की कारस्तानी का दुष्परिणाम था कोरोना वायरस है, चीन के प्रयोगशाला से निकल कर कोरोना वायरस दुनियां भर में फैला था और लाखों लोगों की जान लिया था, दुनियां की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया था। पाकिस्तान को संरक्षण प्रदान कर चीन दुनियां में आतंकवाद की आउटसोर्सिंग कराता है और दुनियां की शांति को भंग करता है, अपने पड़ोसी देशो की संप्रभुता को रौंदता है, उसने कभी भारत, वियतनाम, तिब्बत, भूटान की संप्रभुता को रौंदा है, समुद्री द्वीपों को लेकर चीन फिलीपींस और जापान को धमकाता है और युद्ध का डर दिखाता है। चीन ऐसा इसलिए कर पाता है कि उसके पास वीटो का अधिकार है, इसलिये संयुक्त राष्ट्र संघ जैसा दुनियां का शक्तिशाली संगठन भी खामोश रहता है, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे वीटो धारी देश भी अपने अपने हितों के लिए चीन की इन कारस्तानियों पर खामोशी ही धारण करते हैं।

चीन से आयीं बाढ़ ने नेपाल को आसान शिकार बना डाला, हजारों नेपाली जिंदगियों का संहार कर दिया, जीवन के लिए अनिवार्य प्राकृतिक परिस्थितियों को चौपट कर दिया, नेपाल की अर्थव्यवस्था को मौत की नींद सुला दिया। अभी अभी नेपाल में जो बाढ़ आई है, बाढ़ ने जो तबाही मचाई है, भयंकर त्रास्दी दिखाई है, उसके पीछे चीन की कारस्तानी बताई जा रही है। क्योंकि नेपाल में आई बाढ़ कोई वर्षा से नहीं आई थी, किसी बड़े बांध के टूटने से नहीं आई थी। नेपाल में आई बाढ़ का केंद्र भी नेपाल नहीं था। नेपाल में आई बाढ़ का केंद्र तिब्बत था। तिब्बत पर चीन का कब्जा है, चीन ने लाखों तिब्बतियों का संहार कर तिब्बत पर कब्जा कर लिया और दलाई लामा को निर्वासित जिंदगी जीने के लिए विवश कर दिया। चीन ने तिब्बत पर कब्जा करने के बाद तिब्बत की पारिस्थितिकी बदल डाली। अपनी सिंचाई की समस्या को दूर करने के लिए उसने तिब्बत में बड़े बड़े बांध बना डाले, अपनी बाढ़ की समस्या को दूर करने के लिए उसने अपने बड़े बाँधो का मुंह नेपाल और भारत की ओर कर दिया। तिब्बत स्थित ग्लेशियरों के साथ अनावश्यक छेड़खानी हुई। अनावश्यक छेड़खानी के कारण ग्लेशियरों की पारिस्थितिकी बिगड़ी और ग्लेशियरों के टूटने और बिखरने की संहारक घटना घटी है।

चीन पर आरोप है कि तिब्बत स्थित ग्लेशियरों की पारिस्थितिकी को लेकर उसने अनिवार्य सूचना को छुपाई। ग्लेशियरों मे होने वाली हरकतों के बारे में चीन ने नेपाल, भारत और भूटान के साथ कोई भी विचार विमर्श नहीं किया जबकि इस विषय पर विचार विमर्श अनिवार्य था। एक जिम्मेदार देश का कर्तव्य बनता है कि इतनी बड़ी त्रासदी और अनहोनी पर नियंत्रण की साझा कोशिश करें। पर चीन जिम्मेदार देश तो है नहीं, वह तो अराजक और हिंसक देश है, उसकी मानसिकता भी बड़े देश होने के आधार पर ग्रसित है। उसकी मानसिकता यह है कि हम बड़े देश हैं, हम वीटो धारी देश हैं फिर भारत, नेपाल और भूटान से चर्चा क्यों करे? नेपाल ने सीधे तौर पर कहा है कि उसे बचाव का कोई अवसर नहीं मिला, चीन स्थित ग्लेशियरों के फटने की सूचना समय पर नहीं मिली, अगर सूचना समय पर मिली होती तो हम जान मॉल की क्षति को रोक सकते थे।

सिर्फ नेपाल ही नहीं बल्कि तबाही और मानव संहार का मंजर भारत और भूटान ने भी झेला है, भूटान के कई गांवों का नामोनिशान मिट गए, लाखों जंगली जानवरों की जिंदगी बाढ़ ने समाप्त कर दिया। भूटान एक गरीब देश है और उसकी अर्थव्यवस्था भी सीमित है, उनकी जिंदगी जंगल की अर्थव्यवस्था पर आधारित और निर्भर है, जंगल की पारिस्थितिकी पूरी तरह से तहस नहस होने से जंगल की अर्थव्यवस्था भी डगमगा गई है। भूटान को अब बाढ़ से हुई तबाही और समस्या के समाधान में वित्तीय सहायता की आवश्यकता होगी, वित्तीय सहायता कौन देगा? भारत में भी नेपाल की बाढ़ ने जमकर तबाही मचाई है, भयंकर संहार किया है, पर्यावरण को तहस नहस किया है, नेपाल की नदियां भारत में प्रवेश करती हैं, नेपाल की नदियों में आई बाढ़ का पानी भारत में प्रवेश किया, इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि बिहार और उत्तर प्रदेश की कई नदियों में बाढ़ का पानी भर गया, नदियां अपना रौद्र रुप दिखाने लगी, नदियां संहारक बन गई, बिहार की कोसी बांध खतरे के निशान को छू गई, जिस कारण कोसी बांध का गेट खोलना पड़ा, कोसी नदी ने भयंकर त्रास्दी और तबाही मचाई, सैकड़ों गांव डूब गए, हजारों घरों का नामोनिशान मिटा दिया, लाखों लोग बेघर हो गए, सिर्फ कोसी नदी बल्कि गंडक नदी सहित सभी गंगा की सहायक नदियों ने भी तबाही मचाई है। भारत के पास समय था, इसलिए बिहार में नेपाल में आई बाढ़ से बिहार में होने वाली तबाही का अलर्ट दिया गया, नदियों के किनारे बसे गांवों और आबादी को खाली कर सुरक्षित स्थान पर भेजा गया। अब बिहार और उत्तर प्रदेश में बाढ़ से हुई क्षति की पूर्ति के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की आवश्यकता होगी, भारत को बिहार और उत्तर प्रदेश में अरबो रुपये खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

भारत के असम राज्य सहित पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी हर साल भयंकर बाढ़ आती है, भयंकर जानमाल की हानि होती है , कभी कभी तो बिना बारिश की भी बाढ़ आ जाती है। चीन अपने बड़े बाँधो का पानी अचानक छोड़ देता है, और अपनी बाढ़ की समस्या का समाधान कर लेता है, लेकिन इसका दुष्परिणाम भारत को भुगतना पड़ता है, ब्रम्हपुत्र सहित कई सहायक नदियों की प्राकृतिक बहाव को प्रभावित किया है, जिसके कारण भारत के हितों का अतिक्रमण हुआ है।

नेपाल में चीन की कारस्तानी से आई बाढ़ और तबाही एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा होना चाहिए और इसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जनमत तैयार होना चाहिए। नेपाल में भी चीन के खिलाफ जन आक्रोश का न होना बहुत कुछ सोचने के लिए विवश करता है। आखिर नेपाल की सरकार और राजनीतिक पार्टियां खामोश क्यों है, चीन से इतना डरते क्यों है? वास्तव में चीन की अराजक सामरिक शक्ति के सामने नेपाल की औकात ही क्या है? कभी नेपाल के महाराजा महेंद्र ने चीन का विरोध किया था, चीन के फरमान को मानने से इंकार कर दिया था, दुष्परिणाम यह हुआ कि चीन ने नेपाल में माओ वाद खड़ा कर दिया, माओ वाद ने नेपाल में कैसी हिंसा फैलाई थी, यह भी सर्वविदित है। नेपाल के महाराजा महेंद्र और उनके परिवार की निर्मम हत्या के कारण राजशाही कमजोर पड़ती है और समाप्त हो जाती है। फिर नेपाल पर माओवाद और अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों का राज स्थापित हो जाता है, माओवाद और कम्युनिस्ट पार्टियों हमेशा भारत विरोधी और चीन की पक्षधर रहती हैं। नेपाल की सभी सरकारे चीन से डरती रही है। इस घोर और संहारक संकट के समय चीन नेपाल की समुचित मदद के लिए आगे नहीं आया जबकि भारत हर संभव मदद के लिए खड़ा है। अंतरराष्ट्रीय नियामकों को दो काम करने की अनिवार्य आवश्यकता है, एक नेपाल के पुनर्निर्माण में हाथ खोलकर मदद करना और दूसरा हिमालय क्षेत्र में चीनी कारस्तानी को रोकना।

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