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Tuesday, March 31, 2026

नक्सलवाद पर विजय: लाल गलियारे में उजाला

साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से जन्मे नक्सली आंदोलन ने दूर-दराज़ के जनजाति इलाक़ों में पैर पसारे और हिंसक सशस्त्र विद्रोह की कहानी लिखी।

इन वामपंथी उग्रवादियों ने गरीब, असहाय समुदाय को लुभाकर हथियार थमाए और सरकारी व्यवस्था को चुनौती दी। शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास परियोजनाओं को बम धमाकों और आतंक का निशाना बनाया गया।

झूठे वादों से बहकाए गए भोले-भाले जनजातियों को भड़काकर उनके हाथों में बंदूक थमाई गई, जबकि योजनाबद्ध भेदभाव की बात कहकर उन्हें नक्सली विचारधारा में बांधा गया। इसने जनजाति समाज में डर फ़ैलाया और दशकों तक उनका विकास रोका।

नक्सलियों की इस हिंसक विरासत के कारण बीते वर्षों में हजारों निर्दोष लोगों की जान गई। साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल (SATP) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2000 से अब तक नक्सली हमलों में 2,723 सुरक्षाकर्मी और 4,138 आम नागरिक मारे गए।

Source: SATP

नक्सलियों ने पुलिस चौकियों पर हमले किए, ताबड़तोड़ बम विस्फोट किए और महिलाओं, बच्चों सहित राहगीरों को निशाना बनाया। खासकर जनजातीय जिलों में ‘रेड कॉरिडोर’ कहे जाने वाले क्षेत्रों में 2010 में हुई 1005 मौतें इस अंधकार का उच्चतम प्रमाण थीं; वहीं आज यह गिरकर सिर्फ “शून्य” रह गई हैं। इन मुठभेड़ों में कई विकासकर्मी, शिक्षक और ग्रामीण नेतृत्व भी बलिदान हुए।

सरकार ने 2014 के बाद वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ रणनीति बदली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय कार्य योजना लागू की और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कड़ी कार्रवाई की।

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बताया कि 2014 के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति, सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं ने नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने का मार्ग प्रशस्त किया।

केंद्रीय और राज्य सुरक्षा बलों ने मिलकर “ऑल एजेंसी अप्रोच” अपनाया, इसमें CAPF, स्टेट पुलिस और खुफिया एजेंसियों को साथ लेकर काम किया गया।

साथ ही सरकार ने सरेंडर पॉलिसी भी प्रभावी ढंग से लागू की, जिससे इस दशक में हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की।

इन कठोर अभियानों के परिणाम स्वरूप नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या तेजी से कम हुई। गृह मंत्रालय के बयानों के अनुसार, 2014 में 126 सामान्य नक्सल प्रभावित जिले थे, जो अब घटकर सिर्फ दो रह गए हैं। पहले 35 सबसे प्रभावित जिले हुआ करते थे, अब एक भी नहीं बचा।

2024 में सरकार ने 58 नई सुरक्षा चौकियां बनाईं और 2025 में 88 और चौकियों का निर्माण किया, जिससे हर 3-4 किलोमीटर में सुरक्षा का ग्रिड बन गया।

स्थानीय प्रशासन की पहुंच बढ़ी, मुफ्त राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और सड़कों जैसी सुविधाएं ग्रामीणों तक पहुंचाने लगीं। इन प्रयासों की ताकत से नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास का माहौल लौट आया है।

सुरक्षा बलों की चुनौतियों के बावजूद तीन साल के भीतर जबरदस्त कामयाबी मिली। अगस्त 2024 में केंद्र ने ऐलान किया था कि 31 मार्च 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद को समाप्त कर दिया जाएगा।

इसके तहत 2024 से 2026 के तीन साल में कुल 706 नक्सलियों को मुठभेड़ों में ढेर किया गया, 2,218 गिरफ्तार किए गए और 4.839 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर लिया।

कई नक्सल-विरोधी ऑपरेशन चलाए गए, जिनमें भारी मात्रा में हथियार, IED निर्माण फैक्ट्रियां और बारूद बरामद हुआ। इनमें छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के बड़े इलाके भी नक्सल प्रभाव से मुक्त हो गए।

नक्सलियों के छोटे से बड़े ठिकानो को निशाना बनाया गया; गृह मंत्रालय के अनुसार अब केंद्रीय कमेटी और पोलित ब्यूरो के सभी 21 नेता या तो मारे जा चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं।

विकास की योजनाओं ने लाल गलियारे की तस्वीर बदल दी है। गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि अब नक्सलवाद मुक्त इलाकों में 15,000 किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं और 9,233 मोबाइल टावर लगाए गए हैं।

46 ITI और 179 इकलव्य मॉडल स्कूल खुले हैं, जिससे ग्रामीण युवाओं को शिक्षा के नए अवसर मिल रहे हैं। साथ ही अब इन इलाकों में 6,025 डाकघर, 1,804 बैंक शाखाएं और 1,321 ATM भी खुल चुके हैं।

पहले जहां नक्सलियों ने विकास को रोका था, अब वहीं के लोग राष्ट्रीय योजनाओं के लाभ ले रहे हैं। बस्तर ओलंपिक जैसे खेल कार्यक्रमों में लाखों युवा जुड़ने लगे हैं, जिससे नक्सल विचारधारा का खात्मा हुआ है।

केंद्र सरकार की राष्ट्रीय कार्य योजना और कड़ी कार्रवाई ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य हासिल किया। नक्सल आतंक की खौफनाक विरासत को सुरक्षा बलों की बहादुरी और सतत विकास के कदमों ने मिटा दिया।

अब लाल गलियारे में विकास की रोशनी फैली है और जनजाति इलाकों में लोकतंत्र की अनवरत मशाल जल उठी है।

बीते दशकों की त्रासदी यह स्पष्ट करती है कि जब शासन सक्रिय रहता है और विकास योजनाएं समय पर लागू होती हैं, तो नक्सली हिंसा के नाम पर फैलाए गए अंधेरे का अंत होना तय होता है।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra is a writer and columnist who contributes articles and opinion pieces to various media organisations. He previously served as the Editor of News4Fact and is currently pursuing a postgraduate degree in Journalism and Mass Communication.

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