“ ‘हिंदू राष्ट्र नहीं, सनातन राष्ट्र की अवधारणा है भारत के भविष्य का मार्गदर्शन,उत्तराखंड में बोले करौली शंकर महादेव”, नवभारत टाइम्स, फरवरी 07, 2026
“भारत की राष्ट्रीय पहचान को लेकर चल रही वैचारिक बहस के बीच पूर्ण गुरु करौली शंकर महादेव ने हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से आगे बढ़कर सनातन राष्ट्र का स्पष्ट, सैद्धांतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार भारत को केवल पहचान या बहुसंख्यकता के आधार पर नहीं, बल्कि शाश्वत जीवन-मूल्यों और कर्तव्य-प्रधान चेतना के आधार पर समझा जाना चाहिए। उन्होंने ये बातें उत्तराखंड के हरिद्वार में कही।
हरिद्वार में आयोजित हुए एक कार्यक्रम में करौली शंकर महादेव ने कहा कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान तक सीमित रह जाती है, जबकि सनातन राष्ट्र एक व्यापक, सार्वकालिक और समावेशी जीवन व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। वे स्पष्ट करते हैं कि भारत का इतिहास कभी भी किसी एक पंथ-आधारित राष्ट्र के रूप में नहीं रहा, बल्कि यह सनातन परंपरा से पोषित एक सभ्यता-राष्ट्र रहा है।
सनातन कोई संप्रदाय या संस्कृति विशेष नहीं है, बल्कि यह पंचतत्त्व, प्रकृति, पृथ्वी और जीवन के संतुलन पर आधारित शाश्वत नियमों की सनातन व्यवस्था है। यह वह प्राकृतिक धर्म की नैसर्गिक , धार्मिक व्यवस्था है जो सदा से थी , है और सदा रहेगी । सनातन राष्ट्र का आधार बहिष्कार नहीं, बल्कि समावेशन है, जहां केवल यह अपेक्षा की जाती है कि व्यक्ति इस शाश्वत चेतना और राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता को स्वीकार करे……”
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