तियानमेन चौक नरसंहार: लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग पर गोलियां, टैंक और दमन की कहानी

बीजिंग के तियानमेन चौक में 3-4 जून 1989 की रात चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक सुधार की मांग कर रहे लाखों प्रदर्शनकारियों पर सेना उतारकर आंदोलन को रक्तरंजित तरीके से कुचल दिया।

आज इस घटना को 37 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन तियानमेन चौक नरसंहार दुनिया के इतिहास में राज्य शक्ति द्वारा अपने ही नागरिकों पर किए गए सबसे चर्चित दमनकारी अभियानों में गिना जाता है। उस रात चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने संवाद का रास्ता छोड़कर गोलियों और टैंकों का सहारा लिया। परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक सुधारों की उम्मीदें टूट गईं और चीन में एकदलीय शासन और अधिक मजबूत हो गया।

शोक सभा से शुरू हुआ आंदोलन

1989 के वसंत में बीजिंग का तियानमेन चौक एक बड़े जनआंदोलन का केंद्र बन गया। आंदोलन की शुरुआत पूर्व कम्युनिस्ट नेता हू याओबांग के निधन के बाद हुई। हू को अपेक्षाकृत उदार और सुधारवादी नेता माना जाता था। उनके निधन पर शोक व्यक्त करने के लिए जुटे छात्रों ने जल्द ही भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे उठाने शुरू कर दिए।

हू याओबांग की मौत के बाद तियानमेन चौक पर उमड़ा छात्रों का जनसैलाब।
हू याओबांग की मौत के बाद तियानमेन चौक पर उमड़ा छात्रों का जनसैलाब।

कुछ ही सप्ताह में यह आंदोलन बीजिंग से निकलकर पूरे चीन में फैल गया। विश्वविद्यालयों के छात्र, शिक्षक, मजदूर और यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ निचले स्तर के सदस्य भी प्रदर्शनकारियों के समर्थन में आ गए।

लाखों लोगों ने उठाई लोकतंत्र की मांग

तियानमेन चौक चीन के राजनीतिक प्रतीकों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल और मॉन्यूमेंट टू द पीपल्स हीरोज से घिरा यह क्षेत्र चीन के जनवादी गणराज्य का औपचारिक केंद्र माना जाता है।

यहीं हजारों से लेकर कुछ दिनों में लगभग दस लाख तक लोग एकत्र हुए। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार समाप्त करने, प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और सार्थक राजनीतिक सुधार लागू करने की मांग रखी।

छात्रों ने भूख हड़ताल की, बैनर लगाए और सरकार को खुले पत्र लिखे। आंदोलनकारियों ने भाषणों के लिए मंच बनाए और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी। उन्होंने अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से प्रेरित “गॉडेस ऑफ डेमोक्रेसी” नामक प्रतिमा भी स्थापित की, जो लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों का प्रतीक बनी।

कम्युनिस्ट शासन की विफलताओं को उजागर करता आंदोलन

अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने निहत्थे छात्रों और सैनिकों के आमने-सामने खड़े होने की तस्वीरें पूरी दुनिया तक पहुंचाईं। इस आंदोलन ने चीनी कम्युनिस्ट व्यवस्था के भीतर मौजूद विरोधाभासों और कमजोरियों को सामने लाकर रख दिया।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा खुद को जनता का प्रतिनिधि और लोकतंत्र का समर्थक बताती रही, लेकिन तियानमेन की घटनाओं ने अलग ही तस्वीर पेश की। जब नागरिकों ने बुनियादी अधिकारों की मांग की, तब सरकार ने बातचीत की जगह बल प्रयोग चुना।

माओ के बाद बदलती अर्थव्यवस्था, लेकिन नहीं बदली राजनीति

तियानमेन की कहानी को समझने के लिए चीन के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। 1976 में माओ त्से तुंग की मृत्यु के बाद देश सांस्कृतिक क्रांति और ग्रेट लीप फॉरवर्ड जैसी नीतियों से उबरने की कोशिश कर रहा था। इन अभियानों ने करोड़ों लोगों को प्रभावित किया और समाज को गहरे घाव दिए।

इसके बाद देंग शियाओपिंग ने आर्थिक सुधार शुरू किए। उन्होंने विदेशी निवेश और बाजार आधारित नीतियों को बढ़ावा दिया। इससे अर्थव्यवस्था में तेजी आई, लेकिन राजनीतिक व्यवस्था जस की तस बनी रही।

आर्थिक विकास के साथ भ्रष्टाचार, महंगाई और सामाजिक असमानता भी बढ़ी। युवाओं ने महसूस किया कि आर्थिक अवसर पर्याप्त नहीं हैं। वे शासन व्यवस्था में भागीदारी और अपनी आवाज सुनाने का अधिकार भी चाहते थे।

जब सरकार ने सेना उतारने का फैसला किया

कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी आंदोलन को लेकर मतभेद थे। कुछ वरिष्ठ नेता छात्रों से बातचीत करना चाहते थे, जबकि कठोर रुख अपनाने वाले नेताओं ने आंदोलन को शासन के लिए खतरा बताया।

आखिरकार कट्टरपंथी गुट की जीत हुई। 3 जून 1989 की शाम सरकार ने मार्शल लॉ लागू करने की घोषणा की और सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया।

टैंक और बख्तरबंद वाहन बीजिंग की सड़कों पर उतर आए। नागरिकों ने रास्ते रोके, सैनिकों से विनती की और मानव श्रृंखलाएं बनाईं, लेकिन सेना नहीं रुकी।

गोलियों और टैंकों से कुचला गया विरोध

4 जून की सुबह से पहले सैनिक तियानमेन चौक और आसपास की सड़कों में पहुंच गए। उन्होंने भीड़ पर ज़ोरदार गोलियां चलाईं। हजारों लोग मौके पर ही मारे गए। प्रत्यक्षदर्शियों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, कई लोगों को सैन्य वाहनों ने कुचल तक दिया।

अगले कुछ दिनों में सुरक्षा बलों ने हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इसी दौरान दुनिया ने एक ऐसी तस्वीर देखी जो साहस का प्रतीक बन गई। एक अज्ञात व्यक्ति टैंकों की कतार के सामने अकेला खड़ा हो गया। उसके हाथों में एक बैग था, लेकिन उसने रास्ता छोड़ने से इनकार कर दिया।

यह व्यक्ति बाद में “टैंक मैन” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी उसकी पहचान और उसके भविष्य के बारे में कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है।

मौतों की संख्या आज भी विवाद का विषय

चीनी सरकार ने लगभग 200 नागरिकों और कुछ सैनिकों की मौत का दावा किया। दूसरी ओर पत्रकारों, मानवाधिकार संगठनों और विदेशी अधिकारियों ने मृतकों की संख्या हजारों में बताई।

वास्तविक आंकड़ा आज भी सार्वजनिक नहीं हुआ। यही कारण है कि तियानमेन नरसंहार को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।

इतिहास मिटाने की कोशिश

नरसंहार के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने इस घटना की स्मृति को मिटाने का अभियान शुरू किया। सरकार ने तस्वीरें हटाईं, रिपोर्टिंग सीमित की और 4 जून के उल्लेख को पाठ्यपुस्तकों, मीडिया और इंटरनेट से लगभग गायब कर दिया।

लोकतांत्रिक सुधारों का समर्थन करने वाले नेताओं को पदों से हटाया गया। अनेक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। चीन के भीतर आज भी इस घटना पर खुली चर्चा करना बेहद कठिन माना जाता है।

“पिलर ऑफ शेम” और दबाई गई यादें

हांगकांग विश्वविद्यालय में 1997 में स्थापित आठ मीटर ऊंची “पिलर ऑफ शेम” प्रतिमा तियानमेन के पीड़ितों की स्मृति में बनाई गई थी। हर वर्ष हजारों लोग मोमबत्तियां जलाकर मृतकों को श्रद्धांजलि देते थे।

हालांकि, हाल के वर्षों में बीजिंग के बढ़ते प्रभाव के बीच हांगकांग प्रशासन ने इन आयोजनों पर रोक लगा दी और प्रतिमा को भी हटा दिया।

तियानमेन की विरासत

तियानमेन चौक नरसंहार ने चीन के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय कर दी। कम्युनिस्ट पार्टी लोकतांत्रिक सुधार और पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण के बीच खड़ी थी। उसने नियंत्रण को चुना।

इसके बाद चीन ने सेंसरशिप, निगरानी और राजनीतिक प्रतिबंधों को और मजबूत किया। इस नरसंहार ने लोकतांत्रिक बदलाव की संभावनाओं को ना के बराबर कर दिया और एकदलीय शासन को स्थायी आधार प्रदान किया।

आज भी तियानमेन चौक की घटना दुनिया को यह याद दिलाती है कि जब नागरिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की मांग करते हैं, तब सत्तावादी व्यवस्थाएं किस हद तक जाकर विरोध को दबाने का प्रयास कर सकती हैं। 3-4 जून 1989 की वह रात इसलिए इतिहास के पन्नों में लोकतंत्र की अधूरी लड़ाई और कम्युनिस्ट दमन के प्रतीक के रूप में दर्ज है।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra contributes articles to select media organisations. He is the founding editor of The Tilda Times and holds a postgraduate degree in journalism and mass communication.

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