नेपाल जलते आग और राख में, ओली ने छोड़ी कुर्सी – क्या पीछे है अमेरिकी डीपस्टेट का हाथ?

काठमांडू की सड़कों पर 8 सितंबर को जो नजारा दिखा, उसने पूरे दक्षिण एशिया को चौंका दिया। हजारों युवाओं का प्रदर्शन हिंसा में बदल गया, संसद भवन जल उठा, नेताओं के घरों पर हमला हुआ और 19 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। 400 से अधिक घायल हुए। हालात बिगड़ते देख नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने 9 सितंबर को इस्तीफा दे दिया।

चिंगारी बनी सोशल मीडिया बैन

सरकार ने 4 सितंबर को फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स समेत 26 बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया। वजह बताई गई कि कंपनियों ने नेपाल में पंजीकरण कराने और शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करने जैसी शर्तें पूरी नहीं कीं। यह फैसला युवाओं को रास नहीं आया। शुरुआत में विरोध शांतिपूर्ण था, लेकिन जल्द ही काठमांडू की गलियां हिंसा से भर गईं।

जेन-जेड का गुस्सा

इन प्रदर्शनों को अब “Gen Z प्रोटेस्ट” कहा जा रहा है। ज्यादातर 30 साल से कम उम्र के युवा स्कूल और कॉलेज की ड्रेस पहनकर सड़क पर उतरे। यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं था, बल्कि 2015 में बनी संस्था ‘हामी नेपाल’ के जरिए युवाओं ने इसे आगे बढ़ाया।

काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह ने भी युवाओं का खुलकर समर्थन किया। प्रदर्शन सिर्फ सोशल मीडिया बैन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और नेताओं की जवाबदेही की कमी पर भी सवाल उठने लगे।

क्या अमेरिका की छाया?

नेपाल की राजनीति में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या इन प्रदर्शनों के पीछे अमेरिकी डीपस्टेट की भूमिका है। यह शक इसलिए भी गहराता है क्योंकि 2022 में अमेरिका की 500 मिलियन डॉलर की MCC ग्रांट पर भी नेपाल में जमकर बवाल हुआ था। तब भी आरोप लगे थे कि यह मदद दरअसल नेपाल की संप्रभुता को कमजोर करने और इंडो-पैसिफिक रणनीति में उसे अमेरिकी खेमे में खींचने का जरिया है।

हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने इसे सिर्फ सड़कों और बिजली परियोजनाओं के लिए बताया था, लेकिन नेपाल की जनता और वामपंथी दलों ने इसे “नई औपनिवेशिक साजिश” कहा।

श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल

दक्षिण एशिया में पिछले कुछ सालों में एक पैटर्न दिख रहा है। श्रीलंका में राजपक्षे को हटाने वाली सड़कों की आग, बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता से विदाई और पाकिस्तान में इमरान खान का पतन – हर जगह पहले युवाओं का आक्रोश, फिर सरकार का पतन। अब वही स्क्रिप्ट नेपाल में चल रही है।

प्रदर्शनकारियों ने “केपी चोर, देश छोड़” जैसे नारे लगाए और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल व ओली के घरों को निशाना बनाया। यहां तक कि काठमांडू का हिल्टन होटल, जो सत्ताधारी दल के नेता का है, आग के हवाले कर दिया गया।

लोकतंत्र पर संकट या बाहर की चाल?

नेपाल की संसद को जलते देखना सिर्फ आंतरिक गुस्से का परिणाम नहीं लगता। घटनाओं की टाइमिंग और टारगेट चुनने का तरीका यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं बाहरी ताकतें नेपाल के लोकतंत्र को अस्थिर करने में लगी हैं।

नेपाल जैसे छोटे और भौगोलिक रूप से संवेदनशील देश में अगर बार-बार ऐसी हलचलें होती रहीं तो यह सिर्फ आंतरिक संकट नहीं, बल्कि बड़ी ताकतों की भू-रणनीतिक चाल भी हो सकती है।

नेपाल आज मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह है कि क्या यह देश अपने हालात खुद संभालेगा या दक्षिण एशिया की नई “कलर रिवॉल्यूशन” का अगला शिकार बनेगा।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra contributes articles to select media organisations. He is the founding editor of The Tilda Times and holds a postgraduate degree in journalism and mass communication.

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