1980 के मुरादाबाद दंगे: द टेलीग्राफ और द हिन्दू के स्तंभकार असीम अली के दावे, और हिंदुओं की घटती जनसंख्या की सच्चाई

सारांश: मुरादाबाद में सांप्रदायिक दंगों, मंदिरों पर लगे तालों और हिंदू व्यापारियों से छिनते व्यापार की पड़ताल करता यह लेख आसिम अली जैसे इस्लामिस्ट विश्लेषकों के उन दावों का खंडन करता है, जो 1980 के मुरादाबाद दंगों को केवल मुस्लिम पीड़ा के रूप में पेश करते हैं। लेख बताता है कि जिले की जनसंख्या में हिंदुओं का हिस्सा 1951 के 61.41% से घटकर 2012 तक 50% से नीचे आ गया। यह 1980 में मुरादाबाद में हुई घटनाओं और सांसद ज्योतिर्मय बसु द्वारा लोकसभा में रखे गए आंकड़ों का भी हवाला देता है।

क्यों अहम है: दशकों से अशरफ मुसलमानों का एक वर्चस्ववादी वर्ग, जो अपने विदेशी वंश के आधार पर स्वयं को आम भारतीय से श्रेष्ठ मानता है, अपनी कट्टरपंथी सोच छिपाने और हिंदुओं में ग्लानि उत्पन्न करने के लिए मुस्लिम उत्पीड़न का एकतरफा नैरेटिव गढ़ता है, जिसे लेफ्ट-लिबरल मीडिया भी एकतरफा ढंग से प्रस्तुत करता है। 1980 के मुरादाबाद दंगों की वास्तविकता यह है कि उन्हें इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेताओं डॉ. शमीम अहमद और डॉ. हामिद हुसैन ने भड़काया था।

“कभी ईद पर तो कभी होली के बाद दंगे, मंदिरों पर पड़ा ताला और छीन लिए गए बिजनेस: जानें कैसे मुरादाबाद में विक्टिम मुस्लिम नहीं, हिंदुओं ने खोई पहचान” — OpIndia Hindi, 1 नवंबर 2026

क्या देश के किसी हिस्से में मुस्लिम 70 साल तक प्रताड़ित हुए हों तो वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या में हिस्सा 12% कम होना चाहिए? क्या मुस्लिम व्यापारियों से अगर धंधा छीना जाए तो किसी बनवारी लाल गुप्ता के परिवार को अपना दशकों में बनाया हुआ बिजनेस और घरबार छोड़ कर भागना पड़ेगा?

क्या आम मुस्लिम पीड़ित होगा तो किसी गौरीशंकर मंदिर पर 44 साल तक ताला पड़ा रहेगा? आपका जवाब होना चाहिए कि यह कैसे संभव है कि पीड़ित मुस्लिम बताया जा रहा है जबकि जनसंख्या हिंदुओं की घट रही है, बिजनेस छोड़ कर हिंदू भाग रहे हैं और मंदिर हिंदुओं के ही बंद हो रहे हैं।

ये सबकुछ आसिम अली नाम का एक व्यक्ति कह रहा है जो एक कॉलमनिस्ट हैं, पोलिटिकल रिसर्चर हैं और टेलीग्राफ से लेकर न्यूजलॉंड्री तक सब कहीं लिखते रहते हैं। एक ट्वीट में आसिम अली ने अगस्त 1980 में मुरादाबाद में UP PAC द्वारा मुस्लिम नमाजियों के नरसंहार को जलियांवाला बाग शैली के नरसंहार से तुलना करते हुए लिखा, “यहाँ मारे गए लोगों की संख्या 1903 के किशिनव यहूदी नरसंहार से भी अधिक थी, जिसके बारे में अधिकांश शिक्षित यूरोपीय जानते हैं। यहाँ न तो कोई स्मारक बनाया गया, न ही किसी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया। दंगे के बाद दंगे।”…

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