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Friday, September 30, 2022

सावरकर पर पुस्तक लिखने वाले विक्रम संपत से बौखलाया वामपंथी समूह और उतरा झूठे आरोपों पर, विक्रम संपत ने किया रुख दिल्ली उच्च न्यायालय का

वामपंथी लेखकों का इकोसिस्टम इतना मजबूत है कि वह शोध आधारित दूसरे मत के लेखकों को स्वीकार ही नहीं कर सकता है और जो भी लेखक उनके द्वारा फैलाए गए इतने वर्षों के श्रमसाध्य झूठ का पर्दाफाश करता है, वह उसके विरुद्ध हर प्रकार का षड्यंत्र रचने के लिए तैयार हो जाते हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम को मात्र नेहरू और गांधी तक ही सीमित करने वाला वामपंथी और कांग्रेसी लेखक समूह इन दिनों बहुत ही बुरी तरह से बौखलाया हुआ है, क्योंकि इतने वर्षों की उसके श्रम के बावजूद लोग अब लिख रहे हैं, वह उन नायकों के विषय में बात कर रहे हैं, जिन्हें नेपथ्य में भेज दिया गया था, जो स्मृति में तो थे, परन्तु विमर्श से बाहर थे।

ऐसे ही एक नायक हैं, वीर सावरकर! वीर सावरकर के जीवन पर लेखक विक्रम संपत ने पुस्तक लिखी है और इस इस पुस्तक से पूरे वामपंथी लेखन जगत में हलचल और बौखलाहट मची हुई है। हालांकि उनकी पुस्तक से पूरी तरह से हिले हुए वामपंथी उनकी पुस्तक पर तो कोई भी आरोप नहीं लगा पाए तो उन्होंने विक्रम संपत पर वर्ष 2017 में दिए गए एक भाषण पर चोरी का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने इंडिया फाउंडेशन में वर्ष 2017 में एक भाषण दिया था, जिसमें विनायक चतुर्वेदी और जानकी बाखले के कार्य की चोरी की।

और प्रोपोगैंडा वेब पोर्टल द वायर में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गयी कि इतिहासकारों ने आरोप लगाया कि विक्रम संपत ने दूसरे इतिहासकारों के कार्यों को अपने भाषण में सही से नहीं बताया। अमेरिकी विश्वविद्यालयों के तीन प्रोफ़ेसर जिनमें अनन्या चतुर्वेदी, रोहित चोपड़ा और ऑड्रे ट्रशकी शामिल हैं, उन्होंने रॉयल हिस्टोरिकल सोसाइटी को एक पत्र भेजा, जिसमें विक्रम संपत भी सदस्य हैं और यह आरोप लगाया कि विक्रम संपत पर कार्यवाही की जाए। हालांकि बाद में यह प्रमाणित हुआ कि विक्रम संपत ने साइटेशन में हर आवश्यक विवरण दिया है।

लेखक संजीव सान्याल ने ट्वीट करके इस पूरे षड्यंत्र को परत दर परत दिखाया

उन्होंने लिखा कि सभी जानते हैं कि कैसे विक्रम संपत पर वामपंथी लेखकों द्वारा सावरकर पर पुस्तक लिखने के कारण हमले किए जा रहे हैं। और अब हाल ही में उन्होंने नया आरोप लगाया है कि उन्होंने चोरी की है। और यह सारे आरोप बहुत ही कमजोर हैं।

उन्होंने आगे लिखा कि सबसे पहले यह प्रमाण संपत के किसी भी मुख्य कार्य या बड़ी किताब से सम्बंधित न होकर एक भाषण की पांडुलिपि से सम्बन्धित है, जो उन्होंने वर्ष 2017 में इंडिया फ़ौंडेशन में दिया था और वह खुद वहां पर उपस्थित थे।

फिर उन्होंने लिखा कि जिन दो इतिहासकारों के कार्यों को चोरी करने का आरोप लग रहा है, उन दोनों के ही नाम सन्दर्भों में दिए हुए हैं, ऐसी कैसी चोरी जिसमें सन्दर्भ दिए गए हैं:

वायर की रिपोर्ट में भी विक्रम संपत ने कहा कि यह सब निराधार और झूठ है। यह बात इकोसिस्टम की बहुत हास्यास्पद है कि जो व्यक्ति इतनी बड़ी पुस्तक और बड़े कार्य करेगा क्या वह लेख या भाषण के लिए चोरी करेगा? परन्तु वामपंथी इतिहासकार बहुत शतिर होते हैं, वह विश्वसनीयता समाप्त करने पर बल देते हैं। उन्होंने इस कार्य के बहाने से विक्रम संपत की विश्वसनीयता पर प्रहार किया है, और यह विवाद बढाकर वह इसे दर्ज कराना काहहते हैं। यही कारण है कि विक्रम संपत ने दिल्ली उच्च न्यायालय में इस झूठे आरोप और अपमानजनक भाषा को लेकर याचिका दायर की है:

वामपंथी इतिहासकार और लेखक अपनी पंक्ति से इतर किसी को लेखक और इतिहासकार नहीं मानते हैं

दरअसल वामपंथी लेखक और इतिहासकारों की यही विशेषता है कि वह अपने अलावा किसी और को न ही लेखक मानते हैं और न ही इतिहासकार। वह अपनी विचारधारा से इतर ज्ञान ही नहीं मानते हैं। वह अपने एजेंडा और प्रोपोगैंडा को ही ज्ञान मानते हैं और जो भी व्यक्ति तथ्यों के आधार पर उन्हें काटता है, वह उसकी विश्वसनीयता समाप्त करने के कार्य में लग जाते हैं, चूंकि उनका इकोसिस्टम बहुत ही मजबूत है तो वह लेखकों के कार्यों पर प्रश्न उठाकर उनका चरित्र हनन करने लग जाते हैं।

विक्रम संपत ने वर्षों से बनाई गयी सावरकर की छवि को तोड़कर एक सच्ची तस्वीर प्रस्तुत की, जिसने इनके उस झूठ को पानी की तरह जनता के सामने ला दिया, जो वह इतने वर्षों से लोगों से छिपाए थे। यह लोग वीर सावरकर को माफीवीर आदि आदि कहते थे, जबकि विक्रम संपत ने उनके वास्तविक जीवन को एक बार फिर से विमर्श में ला दिया। और वामपंथ मात्र विमर्श से भयभीत होता है।

उसे शोर मचाना आता है। वह इस शोर को बौद्धिकता का एकमात्र ठेकेदार मानता है और वह इसी शोर के माध्यम से यह तय करता है कि भारत का लोक क्या पढ़ेगा? वह लोक के विमर्श को अपने एजेंडे के अनुसार निर्धारित करता है, जबकि लोक स्मृति के आधार पर अपना विमर्श स्वयं तय करता है। जैसे भारत का वामपंथी इकोसिस्टम औरंगजेब को नायक बनाने के लिए ऑड्री का सहारा ले रहा है, वहीं लोक शिवाजी को बसाए हुए है।

कांग्रेसी इकोसिस्टम नेहरू और गांधी को भारत की स्वतंत्रता संग्राम के चेहरे बनाता रहा है तो लोक सुभाषचन्द्र बोस और सावरकर को भी याद रखे हुए है, वामपंथ के इस झूठ पर जब विक्रम संपत ने हमला किया और उसे पूरी तरह से तहस नहस कर दिया तो बौखलाहट में वह विक्रम संपत की विश्वसनीयता पर हमला करके चेतावनी दे रहा है कि कोई भी उसके झूठ के रास्ते में ना आए!

यही झूठ ही वामपंथ का सत्य है, यही बौखलाहट ही वामपंथ का सत्य है!

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