कर्नाटक में मुस्लिम व्यापारियों के बंद से आहत होकर कुछ हिन्दू मंदिर समितियों ने किया मुस्लिम व्यापारियों का विरोध, नहीं दी दुकानें!

कर्नाटक में जिस प्रकार से मुस्लिम संगठनों ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय का विरोध किया है और जिस प्रकार से वह उच्च न्यायालय के निर्णय में सड़क तक उतरे और बाजार बंद रखा, उससे समाज का एक बड़ा वर्ग उनके विरोध में है।

दिनांक 17 मार्च 2022 को मुस्लिम व्यापारियों ने कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब के विरोध में आए हुए निर्णय का विरोध करते हुए अपनी दुकाने बंद रखी थीं।

इससे मंदिर समिति को बहुत ठेस पहुँची। मीडिया के अनुसार मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रमेश हेगड़े ने कहा कि मंदिर में एक समिति ने यह निर्णय लिया कि केवल हिन्दू ही दुकानों/स्टाल की नीलामी में भाग लेंगे।

दरअसल, मंदिर में 22 और 23 मार्च को सालाना पूजा समारोह होता है, जिसके लिए दुकानों की बोली लगाई जाती है और जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही भाग लेते थे। परन्तु मन्दिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्री रमेश हेगड़े ने कहा कि जिस प्रकार से मुस्लिम व्यापारियों ने उच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान नहीं किया है, उससे वह बहुत आहत हैं। और वह नहीं चाहते कि किसी भी प्रकार से क़ानून व्यवस्था में समस्या आए!

मंदिर में पूजा सामग्री की कई दुकानें इस सालाना पूजा के अवसर पर लगाई जाती हैं और उनकी बोली लगती है। रमेश हेगड़े के अनुसार उनके पास कई हिन्दू संगठनों के पत्र आए कि किसी भी प्रकार की क़ानून और व्यवस्था की समस्या से बचने के लिए, यह जरूरी है कि मंदिर में दुकानें केवल हिन्दुओं को ही दी जाएं क्योंकि मुस्लिमों ने हिजाब के मामले पर देश के क़ानून और न्यायालय के निर्णय का आदर नहीं किया।

इस विषय में हिन्दू जागरण वैदिक के मंग्लुरु विभाग के महासचिव प्रकाश कुक्केहाली ने कहा कि उन्होंने पहले कॉप नगर पालिका के मुख्य अधिकारी को इस आग्रह का पत्र दिया था कि मंदिर की दुकानों की बोली में केवल हिन्दुओं को ही भाग लेने का अवसर दिया जाए, और फिर उसके बाद मंदिर से संपर्क किया।

मीडिया के अनुसार उनका दावा है कि “यहाँ तक कि मंदिर के स्थानीय भक्त भी इस बात को लेकर बहुत आहत हैं कि मुस्लिमों ने 17 मार्च को कर्नाटक बंद के दौरान अपनी दुकानें बंद रखीं। मंदिर द्वारा लिए गए निर्णय में सभी हितधारकों की अनुमति है!”

कांग्रेस के सिद्धारमैया ने जताया विरोध

इस निर्णय पर कांग्रेस के सिद्धारमैया ने अपना विरोध व्यक्त किया है, हालांकि वह किसी भी संगठन के विरुद्ध कुछ भी बोलने से बचे हैं। उन्होंने किसी भी हिन्दू संगठन का नाम लिए बिना केवल मंदिर को ही दोषी ठहराते हुए कहा कि ऐसे किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। सरकार को इस पर निर्णय लेना चाहिए।

वहीं ऐसे और भी कदम कई और मन्दिरों ने उठाए हैं, जैसे शिवमोगा में मरिकम्बा जात्रा में मुस्लिमों को स्टाल नहीं दिए गए हैं।

हालांकि इसे लेकर भी वायर जैसे पोर्टल्स का रोना और एजेंडा शुरू हो गया है, परन्तु इस बात पर यह पूरा गैंग विचार नहीं कर रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों हिन्दुओं द्वारा विरोध किया जा रहा है? पहले मंदिरों की दुकानों में मुस्लिम भी स्टाल लगाते थे, परन्तु जिस प्रकार से हिजाब के मामले को लेकर हिन्दुओं पर लगातार हमले किए हैं एवं न्यायालय का विरोध किया है, उससे लोगों में बहुत अधिक क्रोध है, आक्रोश है। उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है, कि मुस्लिम समुदाय न ही उनका और न ही इस देश के क़ानून का आदर करता है। इसलिए वह विरोध कर रहे हैं

मुस्लिमों ने जो हिजाब के मामले में बंद बुलाया था, उसका असर उन क्षेत्रो में व्यापक रूप से दिखाई दिया जहाँ पर मुस्लिम जनसँख्या बहुतायत में थी:

दरअसल लोगों के भीतर इस मामले को लेकर गुस्सा है। यह बात न्यायालय के निर्णय में भी आई थी कि हिजाब के इस मुद्दे को लेकर कुछ अदृश्य हाथ हैं, जो समाज में सामंजस्यता को समाप्त करना चाहते हैं।

और हमने देखा था कि कैसे स्कूलों और कॉलेज में हिजाब का विरोध करने मात्र से ही बजरंग दल के कार्यकर्ता की हत्या कर दी गयी थी। इन सभी घटनाओं को लेकर और सबसे अधिक न्यायालय के निर्णय का सम्मान न करने को लेकर लोगों का विरोध है।

वहीं यह भी बात सत्य है कि जहाँ आज तक हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों के विरोध में जो भी निर्णय दिए गए, कभी भी किसी भी न्यायाधीश को कोई भी सुरक्षा नहीं देनी पड़ी, हिन्दू समाज ने यदि सहज स्वीकार नहीं भी किया, तो याचिकाएं लगाईं। परन्तु हिजाब को लेकर दिए गए निर्णय के आधार पर न्यायाधीशों को धमकियां मिल रही हैं:

कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने इस सम्बन्ध में निर्णय देने वाले तीनों ही न्यायाधीशों को वाई श्रेणी की सुरक्षा देने का निर्णय लिया है
परन्तु वायर जैसे पोर्टल इन सब धमकियों पर कुछ नहीं बोलते हैं, जहाँ खतरा है, वहां सभी मौन है! वैसे भी यह मंदिर समिति का अधिकार होना चाहिए कि वह मात्र उन्हीं को मंदिर में प्रवेश करने दें, जिनकी आस्था उस मंदिर में है, उस मत में है!

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