जब न्याय के प्रहरी ही सार्वजनिक बहस में उतरें: जस्टिस भुयान की SIR टिप्पणी पर प्रश्न

न्यायपालिका लोकतंत्र का वह स्तंभ है, जिसकी सबसे बड़ी शक्ति उसके पास मौजूद दंड देने की शक्ति नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। न्यायालय का आदेश तभी प्रभावी और सम्मानित होता है, जब समाज को यह विश्वास हो कि न्यायाधीश ने मामले को सुनते समय अपने मन को पूर्वाग्रह, बाहरी दबाव और सार्वजनिक धारणा से पूरी तरह मुक्त रखा है।

इसीलिए न्यायिक मर्यादा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है—जो मामला न्यायालय के समक्ष लंबित है, अथवा भविष्य में न्यायिक निर्धारण के लिए उसके समक्ष आ सकता है, उसके गुण-दोष पर न्यायाधीश को सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। यही कारण है कि नालसार यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के एक कार्यक्रम में जस्टिस उज्ज्वल भुयान द्वारा SIR से संबंधित हाल की टिप्पणियों ने गंभीर संवैधानिक और न्यायिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि जस्टिस भुयान की व्यक्तिगत राय क्या है। प्रश्न इससे कहीं बड़ा है—क्या किसी न्यायाधीश को ऐसे विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी करनी चाहिए, जिससे संबंधित कार्यवाही उसी समय सुप्रीम कोर्ट में चल रही हो? और यदि न्यायपालिका स्वयं इस सिद्धांत को स्वीकार करती है कि किसी लंबित मामले पर बाहरी टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, तो फिर यह कसौटी केवल नागरिकों पर ही क्यों लागू हो, न्यायाधीशों पर क्यों नहीं?

यह कोई नई या भारत तक सीमित अवधारणा नहीं है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक और न्यायिक तंत्रों ने लंबे समय से यह सिद्धांत विकसित किया है कि लंबित न्यायिक कार्यवाही के संबंध में ऐसी सार्वजनिक टिप्पणियाँ, जो उसके परिणाम को प्रभावित कर सकती हों अथवा न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़ा कर सकती हों, स्वीकार्य नहीं हैं।

ब्रिटेन में रोच बनाम गारवन (1742) और किंग बनाम क्लेमेंट (1821) जैसे मामलों में न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने वाली प्रकाशित सामग्री के संबंध में अवमानना की कार्रवाई की गई थी। प्रिवी काउंसिल ने बाद में इंडिपेंडेंट पब्लिशिंग कंपनी लिमिटेड बनाम अटॉर्नी-जनरल ऑफ़ त्रिनिदाद एंड टोबैगो, [2004] UKPC 26 में इसी व्यापक सिद्धांत को पुनः स्पष्ट किया।

अर्थात् न्याय की स्वतंत्रता का अर्थ केवल यह नहीं है कि सरकार न्यायाधीश को निर्देश न दे। न्यायिक स्वतंत्रता का दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण पहलू है—न्यायिक प्रक्रिया को स्वयं भी बाहरी प्रभाव और पूर्वनिर्धारित सार्वजनिक धारणा से मुक्त रखना।

अमेरिका में टोलेडो न्यूज़पेपर कंपनी बनाम संयुक्त राज्य अमेरिका, 247 U.S. 402 (1918) में लंबित न्यायिक कार्यवाही के संबंध में पूर्वाग्रहपूर्ण प्रकाशन (prejudicial publication) को अवमानना (contempt) के संदर्भ में देखा गया।

ऑस्ट्रेलिया में पैकर बनाम पीकॉक, [1912] HCA 8 में न्यायिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग की निष्पक्षता की सीमा पर विचार हुआ और प्रकाशकों को अवमानना के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।

कनाडा के ओंटारियो हाई कोर्ट ने आर बनाम ब्रायन, [1954] O.R. 255 में चल रहे हत्या के मुकदमे से संबंधित साक्ष्य सामग्री को अनुचित ढंग से सार्वजनिक किए जाने को गंभीरता से लिया।

सिंगापुर हाई कोर्ट का अटॉर्नी जनरल बनाम पैंग चेंग लियान, [1974] SGHC 17 भी इस सिद्धांत की ओर संकेत करता है कि लंबित मामले पर पूर्वाग्रहपूर्ण सार्वजनिक टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है।

लेकिन भारत में स्थिति और भी स्पष्ट है। हमारे सुप्रीम कोर्ट ने पी.सी. सेन, (1969) 2 SCR 649 में न्याय प्रशासन को प्रभावित करने वाली सार्वजनिक टिप्पणियों को गंभीरता से लिया। उस मामले में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा लंबित कार्यवाही के संबंध में की गई टिप्पणियों को न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप के संदर्भ में देखा गया था।

यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है। यदि कोई सामान्य नागरिक, राजनीतिक नेता, पत्रकार अथवा प्रकाशक लंबित मामले के संबंध में ऐसी टिप्पणी करता है, जो न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, तो उसके विरुद्ध अवमानना की कार्रवाई संभव है। तो फिर प्रश्न उठता है—क्या न्यायाधीश स्वयं उस नैतिक और संस्थागत कसौटी से ऊपर हैं, जिसे दूसरों पर लागू करने का अधिकार न्यायालय के पास है?

इसका उत्तर हमारी अपनी न्यायिक परंपरा में मौजूद है। 7 मई 1997 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण सभा में न्यायाधीशों के आचरण के संबंध में सर्वसम्मति से एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किया गया था। उसके पैराग्राफ ‘एच’ में कहा गया: “कोई जज राजनीतिक मामलों में या ऐसे मामलों पर, जो अभी विचाराधीन हैं या जिन पर न्यायिक निर्णय की आवश्यकता हो सकती है, सार्वजनिक बहस में शामिल नहीं होगा और न ही उन पर सार्वजनिक रूप से अपने विचार व्यक्त करेगा।”

इस एक वाक्य में न्यायिक संयम का पूरा दर्शन समाहित है। न्यायाधीश के पास बोलने की स्वतंत्रता है, लेकिन न्यायाधीश का पद सामान्य नागरिक के पद से अलग है। एक सामान्य नागरिक की सार्वजनिक टिप्पणी केवल उसकी व्यक्तिगत राय हो सकती है। लेकिन न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणी—विशेषकर जब वह किसी संवेदनशील और लंबित न्यायिक विवाद से संबंधित हो—उसके पद, उसके संस्थागत अधिकार और उसकी न्यायिक पहचान का भार लेकर समाज तक पहुँचती है। इसीलिए न्यायाधीश से अपेक्षा सामान्य नागरिक से अधिक होती है।

और यही कारण है कि न्यायिक आचरण के बैंगलोर सिद्धांत, 2002 का पैराग्राफ 2.4 अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न्यायाधीश को ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए, जो किसी लंबित अथवा संभावित न्यायिक कार्यवाही के परिणाम को प्रभावित कर सकती हो या प्रक्रिया की प्रत्यक्ष निष्पक्षता (manifest fairness) को प्रभावित कर सकती हो।

यह केवल एक आदर्श वाक्य नहीं है। यह उस मूल सिद्धांत की अभिव्यक्ति है, जिसके बिना निष्पक्ष न्याय संभव ही नहीं है—न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि न्याय की प्रक्रिया भी स्पष्ट रूप से निष्पक्ष दिखनी चाहिए! और यहाँ एक और गंभीर प्रश्न सामने आता है। मान लीजिए किसी न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणी किसी लंबित मामले के परिणाम को सीधे प्रभावित नहीं भी करती, तब भी क्या वह उस मामले की सामाजिक धारणा को प्रभावित कर सकती है?

उत्तर है—निश्चित रूप से कर सकती है।

आज न्यायालय के फैसले केवल कोर्ट रूम तक सीमित नहीं रहते। वे टेलीविज़न डिबेट, यूट्यूब, समाचार-पत्रों और सोशल मीडिया के साथ-साथ राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे वातावरण में यदि कोई सिटिंग जज किसी ऐसे विषय पर सार्वजनिक टिप्पणी करता है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है, तो उसकी टिप्पणी का प्रभाव सामान्य व्यक्ति की टिप्पणी से कई गुना अधिक होता है। यहाँ तक कि यदि वह टिप्पणी सद्भावना से की गई हो, तब भी वह निष्पक्षता की धारणा को प्रभावित कर सकती है। और न्यायपालिका के निर्णयों के लिए धारणा कोई छोटी चीज़ नहीं है।

न्यायपालिका की वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास से आती है। इसीलिए न्यायिक संयम कोई कमज़ोरी नहीं है, वह एक न्यायाधीश की शक्ति का सबसे ऊँचा रूप है। एक न्यायाधीश को बहुत कुछ कहने का अधिकार हो सकता है, लेकिन हर वह बात कहना आवश्यक नहीं है, जिसे वह कहना चाहता है। क्योंकि जिस क्षण न्यायाधीश अदालत के बाहर किसी लंबित विवाद पर अपनी धारणा सार्वजनिक कर देता है, उस क्षण भविष्य में उसी विषय पर न्यायिक निर्णय आने पर एक स्वाभाविक प्रश्न खड़ा हो सकता है—क्या निर्णय केवल रिकॉर्ड और कानून के आधार पर हुआ, या सार्वजनिक रूप से व्यक्त पूर्वधारणा का भी उसमें कोई प्रभाव था?

भले ही वास्तविकता कुछ और हो, लेकिन न्यायपालिका को ऐसी स्थिति उत्पन्न होने से भी बचना चाहिए। यही न्यायिक औचित्य है, यही न्यायिक अनुशासन है और यही न्यायिक संयम है। विदेशों में केवल सामान्य नागरिकों और मीडिया की टिप्पणियों को ही नियंत्रित करने की बात नहीं हुई है, न्यायाधीशों के सार्वजनिक आचरण पर भी कठोर दृष्टि रखी गई है।

कैलिफ़ोर्निया सुप्रीम कोर्ट ने हॉवर्ड आर. ब्रॉडमैन बनाम कमीशन ऑन ज्यूडिशियल परफॉर्मेंस, 18 Cal. 4th 1079 में न्यायिक आचरण और लंबित मामलों पर नागरिकों की टिप्पणियों के प्रश्न को गंभीरता से लिया।

मिसिसिपी में मिसिसिपी कमीशन ऑन ज्यूडिशियल परफॉर्मेंस बनाम कार्लोस ई. मूर में न्यायाधीश की टिप्पणियों को न्यायिक अनुशासन के संदर्भ में देखा गया।

मेन सुप्रीम ज्यूडिशियल कोर्ट का बेनोइट का मामला, 523 A.2d 1381 भी यह बताता है कि न्यायाधीश न्यायिक पद पर होने के कारण जवाबदेही से मुक्त नहीं हो जाते।

अर्थात् दुनिया के लोकतांत्रिक न्यायिक तंत्रों में एक व्यापक सिद्धांत दिखाई देता है—न्यायिक पद अधिकार तो देता है, लेकिन साथ ही संयम बरतने को भी कहता है। भारत में भी इस सिद्धांत को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट की अपनी पूर्ण कोर्ट सभा में पारित प्रस्ताव इसका प्रमाण है।

और यही वह बिंदु है, जहाँ जस्टिस फेलिक्स फ्रैंकफर्टर का प्रसिद्ध कथन प्रासंगिक हो जाता है। विटारेली बनाम सीटन, 359 U.S. 535 (1959) में उन्होंने कहा था कि जिस संस्था ने अपने लिए कोई मानक निर्धारित किया है, उसे अपने ही निर्धारित मानकों के अनुरूप कठोरता से आंका जाना चाहिए। यह सिद्धांत न्यायपालिका पर तो और अधिक लागू होता है, क्योंकि न्यायपालिका दूसरों से कानून और आचरण की कसौटी पर खरे उतरने की अपेक्षा करती है। तो फिर न्यायपालिका स्वयं अपनी निर्धारित कसौटियों से ऊपर कैसे हो सकती है?

यहाँ मैं एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। SIR उचित है या अनुचित, मतदाता सूची का पुनरीक्षण आवश्यक है या नहीं, कितने मतदाताओं के नाम हटे या जुड़े, अथवा किसी नागरिक के मताधिकार पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है—ये सभी स्वतंत्र और गंभीर संवैधानिक प्रश्न हैं। इन प्रश्नों पर लोकतांत्रिक बहस होनी ही चाहिए। लेकिन इन प्रश्नों का उत्तर न्यायालय के बाहर किसी न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणी से नहीं, बल्कि न्यायालय में प्रस्तुत दलीलों, साक्ष्यों, संवैधानिक प्रावधानों और प्रचलित कानूनों के आधार पर दिया जाना चाहिए।

यही न्यायिक प्रक्रिया की खूबसूरती है। न्यायालय में प्रश्न पूछे जाते हैं। दोनों पक्षों को सुना जाता है। रिकॉर्ड देखा जाता है। कानून की व्याख्या होती है। और अंततः तर्कसंगत निर्णय आता है। यदि निर्णय से पहले ही न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति की सार्वजनिक टिप्पणी किसी एक धारणा को मज़बूत करने लगे, तो न्यायालय के अंतिम निर्णय की सामाजिक स्वीकार्यता पर अनावश्यक प्रश्नचिह्न लग सकता है।

और यही वह खतरा है, जिसे न्यायिक संयम रोकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे द्वारा इस विषय पर व्यक्त की गई चिंता इसी व्यापक सिद्धांत की ओर संकेत करती है। उनकी आलोचना को किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अभियान के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत औचित्य पर उठाए गए प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि सवाल केवल जस्टिस भुयान का नहीं है। सवाल यह है कि—क्या भारत में न्यायिक पद की गरिमा इतनी ऊँची है कि स्वयं उस पद पर बैठे व्यक्ति को भी अपने सार्वजनिक शब्दों के प्रभाव के प्रति अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए?

मेरा उत्तर है—हाँ। और शायद इससे भी आगे जाकर हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए—यदि न्यायाधीशों द्वारा निर्धारित आचार-संहिता और स्वयं सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण न्यायिक सभा का प्रस्ताव न्यायाधीशों को लंबित या संभावित न्यायिक मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से रोकते हैं, तो इन मानकों के उल्लंघन का संस्थागत परिणाम क्या होना चाहिए?

केवल आलोचना? केवल संपादकीय लेख? केवल सोशल मीडिया डिबेट?

या फिर कोई ऐसी संस्थागत व्यवस्था भी होनी चाहिए, जो न्यायिक औचित्य के उल्लंघन को गंभीरता से देख सके? क्योंकि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि न्यायाधीशों को मर्यादा का पालन करना चाहिए। लोकतंत्र में हर शक्ति के साथ ज़िम्मेदारी भी जुड़ी होती है। न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से छूट नहीं है।

न्यायाधीश को सरकार से स्वतंत्र होना चाहिए। राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र होना चाहिए। मीडिया के दबाव से स्वतंत्र होना चाहिए। जनमत के दबाव से स्वतंत्र होना चाहिए। लेकिन उसी के साथ न्यायाधीश को अपने पद की मर्यादा और संस्था के उन मानदंडों के प्रति भी जवाबदेह होना चाहिए, जिन्हें न्यायपालिका ने स्वयं स्वीकार किया है। अंततः यह बात जस्टिस उज्ज्वल भुयान की टिप्पणी से कहीं ज़्यादा बड़ी है। बात उस विश्वास की है, जिसके आधार पर एक सामान्य नागरिक अदालत के दरवाज़े पर जाकर कहता है—”मुझे विश्वास है कि यहाँ मेरे साथ निष्पक्ष न्याय होगा।”

उस विश्वास को बनाने में वर्षों लगते हैं। उसे कमज़ोर करने के लिए कभी-कभी केवल कुछ शब्द ही पर्याप्त होते हैं। इसीलिए न्यायाधीश के लिए मौन हमेशा कमज़ोरी नहीं होता। कभी-कभी मौन ही न्याय की सबसे शक्तिशाली भाषा होता है। और लंबित मामले पर न्यायाधीश का संयमित मौन केवल व्यक्तिगत संयम नहीं—न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा की रक्षा है।

SIR पर बहस जारी रहे। सरकार से प्रश्न पूछे जाएँ। चुनाव आयोग से प्रश्न पूछे जाएँ। याचिकाकर्ताओं के तर्कों की जाँच हो। मतदाता के अधिकारों पर चर्चा हो। और यदि आवश्यक हो, तो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की कठोर आलोचना भी हो। लेकिन अंतिम निर्णय से पहले न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति की सार्वजनिक टिप्पणी से यदि समाज में यह धारणा बनने लगे कि निर्णय की दिशा पहले से तय है, तो यह लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।

क्योंकि न्याय केवल किया जाना पर्याप्त नहीं है—न्याय होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।

और शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—जब न्याय के प्रहरी स्वयं सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनने लगें, तो न्याय की निष्पक्षता की रक्षा कौन करेगा?

आलोक तिवारी

Subscribe to our channels on WhatsApp, Telegram &  YouTube. Follow us on Twitter and Facebook

Related Articles

Aalok Tewari
Aalok Tewari
सेवानिवृत्त प्रबंधक (विजिलेंस), भारतीय स्टेट बैंक पूर्व जाँच अधिकारी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) लेखक एवं विधिक जागरूकता के लिए प्रयासरत Legal & Lawgical Vision

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox
Select list(s):

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.