spot_img

HinduPost is the voice of Hindus. Support us. Protect Dharma

Will you help us hit our goal?

spot_img
Hindu Post is the voice of Hindus. Support us. Protect Dharma
25.6 C
Sringeri
Thursday, May 30, 2024

“गृहशोभा” हो या “स्त्रीकाल”, हिन्दू द्वेष में वैचारिकी के स्तर पर एक समान प्रतीत होती हैं; क्या हिन्दू धर्म के प्रति घृणा भरना ही अंतिम उद्देश्य है?

कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है, परन्तु भारत में जो पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं, उनमें वह कौन से समाज का दर्पण होती है, यह नहीं पता! क्योंकि हमने बार बार यह बात उठाई है कि कथित वैचारिकी पर वाम का कब्जा है और वह कब्जा कोई साधारण कब्जा न होकर ऐसा है जिसमें हिन्दुओं के प्रति समर्पित विचारों के लिए सांस लेने की भी जगह नहीं है।

आज हम बात करेंगे कथित रूप से “औरतों” की मनपंसद पत्रिका गृहशोभा, जो दिल्ली प्रेस से प्रकाशित होती है और कथित वैचारिक पत्रिका “स्त्रीकाल” को लेकर! और यह समझने का प्रयास करेंगे कि क्या बाजार और वैचारिकी अलग अलग हैं या जो बाजार को संचालित कर रहा है, वही कथित वैचारिकी को भी नियंत्रित कर रहा है। कथित वैचारिकी की दुनिया में गृहशोभा आदि को स्तरीय नहीं माना जाता है और एक दूरी बनाकर रखी जाती है। कहा जाता है कि यह सब निचले दर्जे का है। परन्तु जब आप कंटेंट अर्थात विषयवस्तु देखते हैं तो पाते हैं कि कथित बाजारू पत्रिकाएँ गृहशोभा हो या फिर स्त्रीकाल, दोनों की वैचारिकी और अश्लीलता एक ही स्तर की हैं।

कथित बाजार की पत्रिकाएँ और वामपंथी विचार दोनों ही हद दर्जे के अश्लील होने के साथ साथ हिन्दू विरोधी भी हैं। और बार बार उनका एक ही प्रयास है कि किसी भी प्रकार से हिन्दू धर्म को नष्ट किया जाए, और विवाह जैसी संस्था को नष्ट किया जाए। और वह लोग इसे स्त्री स्वत्नत्रता की आड़ में करते हैं। पहले गृहशोभा पर नजर डालते हैं।

लेखिका ज्योति तिवारी के एक ट्वीट पर नजर गयी तो पाया कि गृहशोभा इन दिनों यह बता रही है कि अगर शादी के बाद भी प्रेमी से गर्भ ठहर जाए तो क्या करना चाहिए?

इसमें एबोर्शन अर्थात गर्भपात कराया जा सकता है तो क्या नुकसान हो सकते हैं? कैसे गर्भपात कराएं, पति से कैसे छिपाएं, सास से कैसे छुपाएँ, आदि आदि!

यह हैरान करने वाला हो सकता है, परन्तु जब आप गृहशोभा, सरिता, सरस सलिल या यहाँ तक कि चम्पक पर एक दृष्टि डालते हैं तो आपको अजीब नहीं लगेगा। हमने पिछले दिनों चम्पक कैसे हमारे बच्चों के मस्तिष्क को प्रदूषित कर रही है, यह दिखाया था। कैसे बच्चों के दिल में अपने देश, अपने धर्म आदि के विषय में विष घोला जा रहा है, हमने उस पर चर्चा की थी। इस विषय में यह भी ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली प्रेस के सम्पादक विश्वनाथ, एक माने हुए वामपंथी हैं और उन्होंने दिल्ली प्रेस संस्थान बनाया ही इसलिए जिससे वह “औरतों” को इस छुआछूत, अंधविश्वासों से मुक्त कराने के लिए कदम बढ़ा सकें।

सरस सलिल ने तो अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी हैं, और मजे की बात यही है कि यही सब पढ़ी भी जाती रही हैं। और जिस राम को लेकर दिल्ली प्रेस ने अपनी घृणा की सीमा पार कर दी थी, उसी सरस सलिल का विज्ञापन कथित रूप से अयोध्यापर्व में पाया गया!

परन्तु अब लोगों के भीतर जागरूकता आ रही है। और लोग प्रश्न करते हैं! गृहशोभा के यदि आप सम्पादकीय देखेंगे तो आपको लगेगा जैसे हिन्दू धर्म से बुरा धर्म और कोई है ही नहीं। उस सम्पादकीय में जहर के अतिरिक्त कुछ नहीं होता और विशेषकर हिन्दू धर्म के प्रति! तो ऐसी कौन सी औरतें हैं, जो इस विष को पढ़ती हैं? क्या उनकी आत्मा इतनी मरी हुई है कि वह अपने धर्म के विषय में विष घोलने वाली पत्रिकाओं में महज कुछ हजार रूपए के लालच में लिखती रहती हैं?

15 अप्रेल 2022 के सम्पादकीय में हमारे धर्मशास्त्रों पर हमला बोला गया है। महाभारत के बहाने बार बार यह स्थापित करने का प्रयास होता है कि यह युद्ध दरअसल भाइयों के मध्य वर्चस्व का युद्ध था, इसमें आम जनता को क्या लाभ? परन्तु क्या शासक के रूप में दुर्योधन और शासक के रूप में युधिष्ठिर एक ही थे? क्या दुर्योधन के शासनकाल में जो अधर्म होते थे उनका प्रभाव जनता पर नहीं पड़ता था? पर इस सम्पादकीय में यह प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है कि इस युद्ध में धर्म की स्थापना के लिए जिस प्रकार से भीम के पुत्र घटोत्कच की आहुति दी गयी वह गलत है!

अब क्या ऐसे लोग जो धर्म को नहीं मानते हैं, उन्हें हिन्दू धर्म पर टिप्पणी करने का भी अधिकार होना चाहिए? क्योंकि जब आप किसी चीज़ को मानते ही नहीं है, फिर आप उसके विषय में कह ही क्या सकते हैं? परन्तु ऐसे लोग बोलेंगे? बैलेंस करने के लिए यह कह देते हैं कि हर धर्म में अनैतिक स्थिति होती है, परन्तु अन्य धर्मों का नाम नहीं लेते क्योंकि इनकी गर्दन धड से अलग होने का डर रहता है!

खैर, पर यदि आप यह सोचते हैं कि कथित रूप से स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाली स्त्रियों की पत्रिकाओं में कुछ अलग होगा, तो आप एक बहुत बड़े धोखे में हैं, आप भ्रम में हैं! हमने समय समय पर साहित्य जिहाद पर अपना मत प्रकट किया है। साहित्य के माध्यम से जिस प्रकार से हिन्दू महिलाओं के भीतर हीनभावना भरी जाती है हमने बार बार इसे प्रमाणित करने का प्रयास किया है।

तो अभी हमने कथित बाजार की पत्रिका “गृहशोभा” के दो उदाहरण देखे, अब आइये देखते हैं, स्त्रियों की यौनिकता पर बात करने वाली पत्रिका स्त्रीकाल पर! जहाँ पर यह दावा किया जाता है कि स्त्रियों की हर प्रकार की आजादी की वह बात करती है। परन्तु यह कैसी पत्रिका है, कि जिसका पोस्टर उस द्रौपदी का चरित्र हनन करता है, जिस द्रौपदी को हिन्दू धार्मिक समाज पंच कन्याओं में मानता है! हमारे यहाँ मन्त्र पढ़ा जाता है:

अहिल्या द्रोपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा

पंचकन्या स्वरानित्यम महापातका नाशका

अर्थात इन पंचकन्याओं के नाम भर से पाप का नाश हो जाता है, परन्तु जब स्त्रीकाल पर औरतों की यौनिकता को लेकर बहस होती है तो उसमें द्रौपदी को भी घसीटा जाता है और उन फेमिनिस्ट औरतों द्वारा घसीटा जाता है, जो औरतों की यौनिक आजादी को लेकर अभियान छेड़े हुए हैं।

स्त्रीकाल की ओर से एक पोस्टर रिलीज किया गया, जिसमें कहा गया कि

“द्रौपदी का पांच पति हो तो वह गाली बन जाता है और कृष्ण की 16 हजार रानियाँ हों तो वह गाली नहीं होती है!”

अब जब यह लोग हिन्दू धर्म को नहीं मानते, यह लोग जब हिन्दू ग्रंथों को मिथक मानते हैं, उन ग्रंथों को जिसे एक बहुत बड़ा वर्ग अपना आराध्य और सत्य मानता है तो क्या ऐसे में उन्हें इस प्रकार की अपमानजनक बात करने का अधिकार है? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में झूठ बोलना सम्मिलित है? इस बात का क्या प्रमाण है कि द्रौपदी के पांच पति को हिन्दू समाज में गाली माना जाता है? ऐसा कोई भी प्रमाण न ही लेखिका के पास है और न ही पत्रिका के पास तो झूठ को फैलाने की बात आती है तो क्या गृहशोभा और क्या स्त्रीकाल, दोनों ही एक ही भूमि पर हैं, एक ही जमीन पर है!

परन्तु इस बात को लेकर लोगों में गुस्सा बढ़ गया और यह गुस्सा इस बात को लेकर था कि कथित औरतों का या औरतों की पत्रिकाओं का सारा फेमिनिज्म हिन्दू धर्म को लेकर ही क्यों होता है? यदि बाबा साहेब का संविधान उन्हें कथित रूप से अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देता है तो वह यह स्वतंत्रता हर उस हिन्दू को भी प्रदान करता है कि वह अपने धर्म पर अपमानजनक टिप्पणी करने वालों के विरुद्ध संवैधानिक कदम उठा सके? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यह झूठ और अपमान बार बार सहन किया जा सकता है जो यह पत्रिकाएँ कर रही हैं?

क्या बाबा साहेब ने ऐसा कहा था कि कोई भी झूठ बोल कर किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है? यदि ऐसा नहीं है तो बाबा साहेब के संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार कथित विचारक उन हिन्दुओं को क्यों नहीं देना चाहते हैं, जिनकी भावनाएं उनके झूठ से आहत होती हैं?

खैर, इस मामले पर पर जब लोगों का विरोध बढ़ा और जब यह पता चला कि हिन्दू धर्म के प्रति ऐसी घटिया सोच रखने वाली लेखिका जीमीडिया में काम करती है तो लोगों का गुस्सा और बढ़ा और लोगों ने सोशल मीडिया पर अपना आक्रोश और क्षोभ व्यक्त किया कि बार बार हिन्दू धर्म ही क्यों क्रांति करने के लिए है?

इस पर एक शिकायत भी दर्ज हुई है

भाजपा बंगाल के मीडिया पेनलिस्ट ने एक शिकायत दर्ज कराते हुए ट्वीट किया कि

छद्म नारीवाद के नाम पर, हिन्दू विद्वेष की मानसिकता से भरे लोग हमारे पूज्य आराध्य देवी-देवताओं के विरुद्ध टिप्पणियां कर सस्ती पब्लिसिटी पाने के प्रयास में लगी रहती है।

ऐसे घृणित मानसिकता वाले गैंग के विरुद्ध आज कोलकाता पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर त्वरित कारवाई का आग्रह किया।

हालांकि यह मुद्दा किसी दल का नहीं था और यह लोगों का स्वत: स्फूर्त क्षोभ था, और यह क्षोभ इस कारण से और बढ़ जाता है कि हिन्दी साहित्य का अर्थ ही हिन्दू देवी देवताओं और हिन्दू लोक पर अश्लील टिप्पणी करना रह गया है और यही कारण है कि लोगों ने zee मीडिया से भी पूछा कि आखिर क्यों उन्होंने हिन्दुओं के प्रति ऐसी सोच रखने वाली को अपने यहाँ नौकरी पर रख हुआ है?

लोगों ने कहा कि आपको राम में आस्था नहीं है तो न रहे, परन्तु लेखक होने का यह अर्थ नहीं है कि आप उपहास उडाएं:

हिन्दू समुदाय इस लगातार हो रहे बौद्धिक हमले से आहत है, और वह बस एक ही प्रश्न कर रहा है कि आखिर क्रान्ति का अड्डा हिन्दू द्वेष ही क्यों? और मजे की बात यही है कि यह लेखिकाएं और पत्रिकाएँ हिन्दुओं के ही पैसे से चल रही हैं?

तो क्या हम यह कह सकते हैं कि “गृहशोभा” और “स्त्रीकाल” दोनों में कोई भी अंतर नहीं है, दोनों में ही समाज को तोड़ने की अचूक क्षमता है और दोनों ही तलाक की, विवाहेतर सम्बन्धों की और दोनों ही औरतों की यौनिक आजादी के बहाने विवाह सम्बन्धों को तोड़ने के साथ साथ हिन्दू देवी देवताओं को अपशब्द कहना ही क्रान्ति मानती हैं!

परन्तु संविधान में बार बार यह कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है, काश कि कथित बौद्धित वर्ग इस बात को समझे!

Subscribe to our channels on Telegram &  YouTube. Follow us on Twitter and Facebook

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox
Select list(s):

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.

Thanks for Visiting Hindupost

Dear valued reader,
HinduPost.in has been your reliable source for news and perspectives vital to the Hindu community. We strive to amplify diverse voices and broaden understanding, but we can't do it alone. Keeping our platform free and high-quality requires resources. As a non-profit, we rely on reader contributions. Please consider donating to HinduPost.in. Any amount you give can make a real difference. It's simple - click on this button:
By supporting us, you invest in a platform dedicated to truth, understanding, and the voices of the Hindu community. Thank you for standing with us.