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Thursday, July 16, 2026

चीन का डिजिटल शिकंजा: विदेशी नागरिकों, पत्रकारों और छात्रों पर रखी जा रही पल-पल की नजर

चीन में लीक हुए एक सरकारी निगरानी प्लेटफॉर्म ने खुलासा किया कि सरकार विदेशी नागरिकों, पत्रकारों, छात्रों और संदिग्ध लोगों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखती है। ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ ने यह रिपोर्ट प्रकाशित की।

चीन लंबे समय से दुनिया के सामने खुद को आधुनिक और तकनीकी महाशक्ति के रूप में पेश करता रहा है। हालांकि, अब सामने आए इस खुलासे ने दिखा दिया कि बीजिंग तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षा से ज्यादा निगरानी और नियंत्रण के लिए कर रहा है। लीक हुए प्लेटफॉर्म ने यह साबित कर दिया कि चीन विदेशी नागरिकों की निजी जिंदगी तक में दखल दे रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म का नाम “डायनामिक कंट्रोल प्लेटफॉर्म फॉर फॉरेनर्स” है। चीन की सुरक्षा एजेंसियां इस सिस्टम के जरिए अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे देशों के नागरिकों की लोकेशन तुरंत पता कर सकती हैं। इतना ही नहीं, अधिकारी यह भी देख सकते हैं कि कोई व्यक्ति किन लोगों से मिला, कहां गया और उसका नियमित संपर्क किन लोगों से रहता है।

स्वतंत्र साइबर सुरक्षा शोधकर्ता नेटअस्कारी ने सबसे पहले इस प्लेटफॉर्म का पता लगाया। जांच में सामने आया कि सिस्टम पर सरकारी सुरक्षा एजेंसियों के चिन्ह मौजूद हैं। इसके अलावा यह प्लेटफॉर्म कैमरों, वीजा रिकॉर्ड, यात्रा बुकिंग डेटा, फेस रिकग्निशन सिस्टम और पहचान पत्र स्कैन जैसी कई जानकारियों को एक साथ जोड़ता है।

Chinese surveillance program tracking people with eye icon and human silhouette.

रिपोर्ट बताती है कि अधिकारी इस प्लेटफॉर्म में किसी भी विदेशी नागरिक को उसकी राष्ट्रीयता, पेशे, यात्रा इतिहास और सामाजिक संबंधों के आधार पर खोज सकते हैं। सिस्टम यह भी दिखाता है कि कौन किसका सहकर्मी, पड़ोसी या सहपाठी है। यहां तक कि कौन लोग एक साथ कैमरे में दिखाई दिए, इसकी भी जानकारी मिल जाती है।

उदाहरण के तौर पर अधिकारी किसी जिले में रहने वाले अमेरिकी नागरिकों की सूची निकाल सकते हैं और यह देख सकते हैं कि वे किन लोगों के साथ बार-बार दिखाई दिए। रिपोर्ट में बताया गया कि सिस्टम ने एक व्यक्ति को किराना दुकान पर नौ बार और एक चौराहे पर 78 बार रिकॉर्ड किया।

चीन की इस निगरानी व्यवस्था में विदेशी पत्रकारों को भी अलग श्रेणी में रखा गया। प्लेटफॉर्म में “फॉरेन जर्नलिस्ट”, “फ्यूजिटिव”, हांगकांग, मकाऊ और ताइवान से जुड़े लोगों के लिए अलग फिल्टर मौजूद हैं। इतना ही नहीं, फाइव आइज देशों यानी अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड के नागरिकों पर भी विशेष नजर रखी जाती है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि द टेलीग्राफ के संवाददाता की प्रोफाइल पर “ट्रैक करने योग्य” का टैग लगा था।

दरअसल, चीन ने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा निगरानी नेटवर्क तैयार किया है। रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 70 करोड़ से ज्यादा कैमरे लगे हैं। “स्काईनेट” और “शार्प आइज” जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए सरकार सार्वजनिक जगहों को पूरी तरह निगरानी में रखना चाहती है।

फेस रिकग्निशन तकनीक, डिजिटल भुगतान, मोबाइल ऐप आधारित यात्रा रिकॉर्ड और सार्वजनिक स्थलों पर आईडी स्कैन जैसी व्यवस्थाओं ने चीन को लोगों की हर गतिविधि का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करने में मदद दी। विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रता को लगातार कमजोर कर रहा है।

कोविड महामारी के दौरान चीन ने इस निगरानी ढांचे को और मजबूत किया। सरकार ने ट्रैकिंग ऐप, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग सिस्टम और कई इलाकों में घरों के आसपास कैमरे तथा मोशन सेंसर तक लगा दिए। मानवाधिकार संगठनों ने उस समय भी चीन पर नागरिकों की निजता खत्म करने का आरोप लगाया था।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि इस प्लेटफॉर्म को बीजिंग के उत्तर में स्थित हेबेई प्रांत के पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो ने विकसित किया। कॉपीराइट रिकॉर्ड बताते हैं कि सिस्टम पर 2021 से काम चल रहा था, जबकि ज्यादातर ट्रैकिंग डेटा 2023 का दिखाई देता है। नेटअस्कारी के मुताबिक, अप्रैल 2026 तक भी इसमें नए फीचर जोड़े जा रहे थे।

इस खुलासे ने एक बार फिर चीन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों ने पहले भी चीन पर डिजिटल जासूसी और डेटा निगरानी के आरोप लगाए हैं। अब लीक हुए इस प्लेटफॉर्म ने साफ कर दिया कि चीन केवल अपने नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि देश में मौजूद विदेशियों पर भी चौबीसों घंटे नजर रख रहा है।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra is a writer and columnist who contributes articles and opinion pieces to various media organisations. He previously served as the Editor of News4Fact and holds a postgraduate degree in Journalism and Mass Communication.

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